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ब्लॉग

ये गाना है या पीएम पर निशाना?

बॉलीवुड फिल्म मदारी का एक गीत काफी राजनीतिक टोन लिए हुए है. क्या इसके जरिए सरकार पर निशना है? गीत के बोल बेहद प्रतीकात्मक और मजेदार हैं.

प्रश्नः आने वाली फिल्म मदारी के गीत डमा डमा डम डम डम डम डू की सप्रसंग व्याख्या कीजिए. भावार्थ भी समझाइए.

उत्तरः

प्रसंगः प्रस्तुत पंक्तियां निशिकांत कामत निर्देशित और इरफान खान अभिनीत फिल्म मदारी के गीत से ली गई हैं. इन पंक्तियों को गाया है विशाल डडलानी ने जो मूलतः संगीतकार हैं लेकिन इस फिल्म में संगीत विशाल भारद्वाज दे रहे थे जो डडलानी से ज्यादा बड़ा नाम माना जाता है, इसलिए हो सकता है कि उन्हें संगीत देने का मौका न मिला हो. लेकिन डडलानी ने ये पंक्तियां गाकर सबकी आनी-जानी कर दी है. यहां इस बात का जिक्र प्रसंगवश जरूरी है कि फिल्म की कहानी शैलजा केजरीवाल ने लिखी है. केजरीवाल ने.

मूलभावः गीत की शुरुआत कवि डमा डमा डम डम डम डम डू से करते हैं. गायक एक नहीं कई बार डमा डमा डम डम डम डम बोलता है. मैंने गिनननननने की कोशिश की लेकिन यह एक कठिन कार्य है. और फिर डमा डमा डम डम डम डम डू का अर्थ सिर्फ भाव से ही समझा जा सकता है. और भाव तो हर किसी के अपने हो सकते हैं. मसलन यह भी हो सकता है डडलानी ने अपने नाम का ड अक्षर गाने में डालने के लिए ही डमा डमा किया हो. लेकिन मूलतः यह एक क्रांतिकारी कविता है जिसमें सत्ता का एक-आध दांत खट्टा करने की कोशिश की गई है.

पेश है, पैरावाइज व्याख्याः

दिल की बातें दिल ही जाणे, उलझ गए हैं ताणे बाणे, चल अब ठेके या फिर थाणे तू

सच सड़कों पर नंगा नाचे, झूठ कहे दिल्ली के खांचे, सुनले ओ महबूबा के चाचू

व्याख्याः इन पंक्तियों में महबूबा के चाचू को संबोधित करने के पीछे कवि की मंशा काफी गहरी है. आशिकों से पंगा लेने, उनके साथ मारधाड़ करने और जेल आदि जाने की जिम्मेदारी भारतीय प्रेम-

विरोधी परंपरा में महबूबा के भाई निभाते हैं लेकिन लड़कियों के चाचे की बेहद अहम भूमिका होती है. वे अक्सर उकसाने यानी आग में घी डालने का काम करते हैं. हरियाणा में तो कई मामलों में ऐसा देखा गया है कि लड़की के चाचे ने ही जहर, रस्सी या बंदूक लाकर दी थी. लेकिन उनकी भूमिका को अब तक नजरअंदाज किया गया है, कवि ने पहली बार इस अहम किरदार की भूमिका को सामने लाने की सफल कोशिश की है. बाकी सच तो नंगा ही नाचता है, उसकी व्याख्या की ज्यादा जरूरत नहीं है. लेकिन यहां दिलचस्प बात यह है कि कवि एक राजनीतिक कविता की शुरुआत प्रेम-विरोधियों पर हमले से करता है. हो सकता इसका मकसद यह रहा हो कि जो भक्तजन हैं वे इतना सुनकर ही चैनल बदल लें और असली बात तक ना पहुंच पाएं. क्योंकि असली बात यहां है.

अनपढ़ बैठा शिक्षा बांटे, धर्म दिलों में बोए कांटे, रोटी मांगो मिलते चांटे रे

बैठ बैठ संतों की गोदी, बिना तेल के जनता धो दी, दिल्ली बैठा बड़ा विरोधी रे

जनता के संग वही झोल है, पिछवाड़े में वही पोल है, बहुमत झूठा नापतोल है रे

आण बाणी जाणी राणी, इन सबने है मिलकर ठाणी, बेच के भारत मां खा जाणी रे

व्याख्याः क्या इन पंक्तियों में कवि ने भारत की शिक्षा मंत्री स्मृति ईरानी की ओर इशारा किया है? इस बात का जवाब हां में देते हुए मुझे भी डर लग रहा है क्योंकि ईरानी जी तो डियर तक सुनकर बीयर की तरह बौखला जाती हैं, यहां तो उन्हें अनपढ़ कहने की कोशिश की गई है. बैठ-बैठ संतों की गोदी, बिना तेल के जनता धो दी जैसी पंक्तियों का इशारा भारत की दक्षिणपंथी, धर्मपंथी सरकार की ओर है या नहीं, कवि इस बात को बड़े प्यार से आणी-जाणी कर देता है लेकिन असली बात कह देता है कि जनता के संग वही झोल है. यहां 'वही' शब्द काफी कुछ कहता है. वही से भावार्थ है कि पहले जैसा रहा, अब भी वैसा ही है. अब यानी कब? नई सरकार के आने के बाद से? जिस तरह कवि बेच के भारत मां खा जाणी रे कहता है, उससे तो यही लगता है कि वह भारत की नई सरकार और उसके पीछे खड़ी भक्तों की फौज की बात कर रहा है क्योंकि भारत मां का ठेका उन्हीं के पास है.

जैसे पहले लगी पड़ी थी, वैसे अब भी लगी पड़ी है, ये राजा भी निरा लोमड़ी है

लाल किले का हाल वही है, पैजामा कोई पहन खड़ा था, कोई साड़ी पहन खड़ी है रे

जैसे पहले लगी पड़ी थी, वैसे अब भी लगी पड़ी है, ये राजा भी निरा लोमड़ी है

फटाफटाफट गुस्सा करके, मिला मिलावट मन में भरके, बना बनावट करके बैरी तू

औसत बंदा भूखा मर गया, तेरा चमचा चंदा चर गया, संसद बैठा खावे चेरी तू

व्याख्याः यहां, ये राजा तो निरा लोमड़ी है, पंक्ति बेहद अहम है. कवि किस राजा को निरा लोमड़ी कह रहा है? कहीं वह अपने माननीय... राम-राम-राम-राम. अगर कवि ने वाकई ऐसी कोशिश की है तो यह बहुत क्रांतिकारी कोशिश साबित हो सकती है क्योंकि विरोधियों का कहना है कि लाल किले का हाल अब भी वही है जैसा साठ साल से रहा है. यानी कुछ बदला नहीं है. बस बातें हो रही हैं. बड़ी बड़ी बातें हो रही हैं और लोग भूखे मर रहे हैं. फिर कवि तेरा चमचा चंदा चर गया कह के काफी कुछ साफ कर देता है. क्योंकि खुद को चमचा घोषित करने की परंपरा हाल में काफी नजर आई है. और ये चमचे किसके हैं, उसी के. लिहाजा यह गाना पीएम पर निशाना लगता है. दूल्हे का सेहरा सुहाना लगता है. दुल्हन का तो दिल दीवाना लगता है.

इति.

विवेक कुमार

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