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दुनिया

कविताओं से अमेरिका को बदलेंगी ये मुस्लिम लड़कियां

चार मुसलिम ल​ड़कियों का ग्रुप अपनी कविताओं के जरिये अमेरिका में मुसलमानों के बारे में आम राय को चुनौती दे रहा है. यह ग्रुप उतर रहा है स्लैम पोएट्री की अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता 'ब्रेव न्यू वॉइसेज' में.

अमेरिका में मुसलमानों के बारे में स्टीरियोटाइप सोच और अपने दूसरे मसलों को लेकर चार ल​ड़कियां कविता, अपनी आवाज और मजबूत प्रदर्शन के ​जरिये अपना संदेश दे रही हैं. ये चारों लडकियां अमेरिका के वरमॉन्ट राज्य की हैं. 'मुस्लिम गर्ल्स मेकिंग चेंज' नाम से 5 महीने पहले इन मु​सलमान लड़कियों का बनाया गया यह स्लैम पोएट्री ग्रुप इस हफ्ते वॉशिंगटन डीसी में होने वाले ब्रेव न्यू वॉइसेज नाम की अंतरराष्ट्रीय स्लैम पोएट्री प्रतियोगिता में भाग लेने वाला है.

इसी ग्रुप से जुड़ी 16 साल की किरिन वकार कहती हैं, ''हम उन मसलों पर कविताएं लिखते हैं जिन्हें हम खुद से बिल्कुल भी जुदा नहीं कर सकते, तो उन चीजों पर जिनका हम बहुत ख्याल रखते हैं.'' किरिन ​दक्षिणी बर्लिंग्टन में रहती हैं और उनके माता पिता पाकिस्तानी मूल के हैं. 'अमेरिकन ड्रीम', 'वेलकम' और 'कमीलियन' नाम की अपनी कविताओं में ​इन ल​ड़कियों ने अपने अभिवावकों की अमेरिका आने की ख्वाहिशों और अपेक्षाओं, सीरियाई शरणार्थियों और अपने परिवार के मूल देश और अपनी अमेरिकी पहचान के साथ सामंजस्य बिठाने की चुनौतियों पर बात की है.

"कौन हैं हम?"

'कमीलियन' कविता में वे कहती हैं, ''हम कभी गोरे नहीं होगें, बस अभिनय करेंगे. हम विशाल आइनों के पीछे छिपेंगे और झूठ ओढ़े रहेंगे कि हम कौन हैं. अफ्रीकी अमेरिकी या और कोई? पहले पाकिस्तानी या अमेरिकी?'' वे आगे कहती हैं, ''आंसू हमारे हमारी आंखों में उभरते हैं. बूंदों की धुंधलाहट में एक दुरुस्त इंद्रधनुष आकार लेता है. लाल, नारंगी, पीला, हरा, नीला, बैगनी. इनमें मैं कौन हूं? कौन हैं हम? शायद हम घुले हुए हैं. या शायद हम कई हैं. रंगों का मेल.. या शायद हम एक हैं.''

15 साल की लेना जिनावी के पिता मिस्र से हैं और मां यमन से. अपनी कविता के जरिये वे लोगों को बताना चाहती हैं, ''जब भी आप आतंकवाद शब्द सुनें, मैं नहीं चाहती कि आप इस्लाम के बारे में सोचें. मेरे लिए इस्लाम का मतलब है शांति. आतंकी जो करते हैं, इस्लाम से उसका कुछ लेना देना नहीं.''

अपने तजुर्बे और सोच

लड़कियों का यह ग्रुप इससे पहले वरमॉन्ट में ब्रेव न्यू वॉइस फेस्टिवल के लिए हुए ट्राइआउट में जीत दर्ज कर चुका है. यंग राइटर्स प्रोजेक्ट ने इस ग्रुप के वॉशिंगटन आ सकने के लिए फंड जुटाया है. इसी प्रोजेक्ट की सैरा ग्लीच कहती हैं कि इन लड़कियों के पास महज ​इनकी कविताओं में ही यह मजबूत संदेश नहीं है, बल्कि वे इन मसलों पर बहस करने को भी तैयार हैं.

वकार कहती हैं कि मिडल स्कूल के दौरान वे अमेरीकी कपड़े पहना करती थी. लेकिन जब वे 15 साल की हुई, तो उन्होंने हिजाब पहनने का फैसला किया जो कि उनके मजहब के मुताबिक था. लेकिन अचानक उनकी पोशाक को लेकर कई सवाल उठने लगे, "हम उन स्टीरियोटाइप्स पर बात करना चाहते हैं, जैसे कि मुस्लिम देश बनाम धर्म, इन जैसे सारे ही मसलों पर बात करना चाहते हैं.''

इस ग्रुप की शुरुआत करने वाली हवा एडम कहती हैं कि उनकी पढ़ाई दक्षिणी बर्लिंग्टन के एक ऐसे स्कूल में हुई जहां उन्हें छोड़कर सभी लोग गोरे थे. इसे लेकर दूसरे छात्र अक्सर उनका मजाक बनाया करते थे. वे ही ऐसी अकेली थीं जो हिजाब पहना करती थी. हालांकि वे अब भी बर्लिंगटन हाईस्कूल में पढ़ती हैं लेकिन उन्हें अब भी लगता है कि वे अलग थलग हैं क्योंकि उनके दोस्त या तो केवल मुसलमान हैं या एफ्रो अमेरिकन.

जब एडम पांच साल की थीं तो उनके मां-बाप युद्धग्रस्त सोमालिया से भागकर वरमॉन्ट आए थे. वे कहती हैं कि 'मुस्लिम गर्ल्स मेकिंग चेंज' उनके अपने तजुर्बों और सोच को व्य​क्त करने का जरिया है.

आरजे/आईबी (एपी)

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