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ब्लॉग

अभी नतमस्तक नहीं हुआ है मीडिया

जिस दिन मीडिया जन्मा, उसकी आजादी की लड़ाई भी उसी दिन शुरू हो गई थी. लेकिन भारत में मीडिया अभी हारा नहीं है. चुनौतियां हैं, मुश्किलें भी हैं लेकिन मीडिया लड़ रहा है. हरसंभव तरीके से, हरसंभव जगह.

बड़े शौक से मेरा घर जला तुझे आंच भी न आएगी,

ये जुबां किसी ने खरीद ली, ये कलम किसी की गुलाम है!

एक आजाद मीडिया की ताकत क्या होती है और उसकी आजादी पर संकट समाज के लिए कितना बड़ा संकट साबित हो सकता है, ये बात महज इस शेर की इन दो पंक्तियों से समझी जा सकती है. यही वजह है कि भारत में मीडिया के प्रादुर्भाव के साथ ही उसपर अंकुश की कोशिशें और उसे आजाद रखने की पत्रकारों की लड़ाई शुरू हो गई थी, जो आज भी जारी है और शायद अनवरत जारी रहने वाली है. समय बदलता रहा और उसके अनुरूप अभिव्यक्ति की आजादी पर खतरे भी नए-नए रूप में सामने आए लेकिन अगर कुछ अपवादों को छोड़ दिया जाए तो मुख्य धारा का भारतीय मीडिया अपनी स्वतंत्रता को बचाने में सफल रहा है.

90 के दशक की शुरुआत में भारत ने उन्मुक्त अर्थव्यवस्था का जो रास्ता चुना उसने जल्द ही पूरे देश को एक बड़े बाजार में तब्दील कर दिया. जीवन के तकरीबन हर क्षेत्र और हर पेशे पर इसका असर देखने को मिला. मीडिया और मीडिया संस्थान भी इससे अछूते नहीं रहे। पैसा आया तो अखबारों का वर्टिकल और हॉरीजेंटल विकास हुआ. जो अखबार महज दिल्ली तक सीमित थे और खुद के राष्ट्रीय मीडिया होने के एक अलग अहसास से भरे होते थे, उनके संस्करण देश के अलग-अलग शहरों से शुरू हुए तो वहीं तमाम क्षेत्रीय अखबारों ने अपने कंटेंट, प्रजेंटेशन और प्रिंटिग की क्वॉलिटी से अंतरराष्ट्रीय मानकों की बराबरी कर ली. उसके बाद टीवी मीडिया का प्रादुर्भाव हुआ. 24 घंटे के इन समाचार चैनलों ने खबरों को लेकर एक आम भारतीय की सोच को पूरी तरह बदलकर रख दिया. पत्रकारों की फौज में भर्ती होने के लिए जब ट्रेंड वर्करों की डिमांड पैदा हुई तो उसकी पूर्ति के लिए हर शहर में पत्रकारिता के प्रशिक्षण संस्थान खुल गए. टीवी मीडिया परिपक्वता की ओर कदम बढ़ा रहा था, उसी समय इंटरनेट क्रांति ने डिजिटल मीडिया को जन्म दिया और पिछले कुछ सालों में एक बड़ी ताकत बनकर उभरे सोशल मीडिया को भी इसमें जोड़ लिया जाए तो मौजूदा परिदृश्य में प्रिंट, टीवी, डिजिटल और सोशल मीडिया के रूप में भारतीय पत्रकारिता अपने सबसे ताकतवर दौर में है.

जब हम ताकतवर भारतीय मीडिया की बात करते हैं तो ये सवाल अक्सर उठता है कि मीडिया की इस ताकत का उपभोग कौन करता है? आम जनता या समाज, पत्रकार अथवा अधिकतर मीडिया संस्थानों पर काबिज कॉरपोरेट समूह. पैसे के प्रवाह ने हालांकि भारतीय पत्रकारों की सैलरी और उनकी वर्किंग कंडिशंस में काफी सुधार किए हैं. मीडिया के दफ्तर आज किसी भी दूसरे कॉरपोरेट दफ्तरों से कम नहीं हैं. नई-नई तकनीकों से काम आसान हुआ है लेकिन इससे मीडिया पर लागत भी बेतहाशा बढ़ी है. रेवेन्यू मॉडल में जो बदलाव आया है उसमें संस्थानों के मार्केटिंग और मैनेजमेंट डिपार्टमेंट को भी संपादकीय डिपार्टमेंट के साथ लाकर बैठा दिया है. इसे अगर मीडिया की आजादी पर बड़ा खतरा माना जा रहा है तो ऐसी सोच को यूं ही खारिज नहीं किया जा सकता.

दरअसल मौजूदा दौर में भारत में मीडिया या अभिव्यक्ति की आजादी को लेकर दो बड़े खतरों की आशंका जबसे ज्यादा जताई जाती है. पहला मीडिया पर काबिज कॉरपोरेट्स का अपने बिजनेस हितों की पूर्ति के लिए उसका इस्तेमाल और दूसरा आगे निकलने की होड़ में मीडिया का जनता से जुड़े मुद्दों से विमुख होकर ‘बिकने वाले' विषयों यानी टीआरपी केंद्रित हो जाना. जहां तक पहली आशंका का सवाल है तो यहां वरिष्ठ पत्रकार और भारत में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का प्रतिनिधित्व करने वाली संस्था ब्रॉडकास्ट एडिटर्स एसोशिएशन (BEA) के महासचिव एनके सिंह के तर्क मौजूं हैं. विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस पर यूनेस्को द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम में सिंह ने कहा था कि जिस देश में 273 टीवी चैनल्स और दो लाख से अधिक अखबार मौजूद है, वहां कितने उद्योगपतियों की हैसियत है, जो पूरी मीडिया को खरीद सकें, ये संभव ही नहीं है.

भारत में पत्रकारों और मीडिया संस्थानों पर किसी पार्टी या विचारधारा से नजदीकी के आरोप लगते रहे हैं लेकिन ऐसे मामले हमेशा से रहे हैं और ये महज कुछ पत्रकारों-मीडिया प्रतिष्ठानों की सच्चाई हो सकती है, इसे पूरे मीडिया की सच्चाई नहीं माना जा सकता. केंद्र का एक कद्दावर मंत्री मीडिया के लिए प्रेस्टीट्यूट शब्द का इस्तेमाल करता है तो दिल्ली के मुख्यमंत्री पत्रकारों के नाम लेकर उनके खिलाफ ट्वीट करने से गुरेज नहीं करते. कैराना मुद्दे पर यूपी के मुख्यमंत्री मीडिया को खुलेआम मुंह काला होने की बद्दुआ देते हैं तो बसपा सुप्रीमो मायावती तो पूरे मीडिया को मनुवादी करार देकर अपने समर्थकों से उसकी बात पर भरोसा न करने की सार्वजनिक अपील करती रही हैं। यहां तक कि गुजरात का मुख्यमंत्री रहते हुए नरेंद्र मोदी अक्सर अपने भाषणों में मीडिया के लिए न्यूज ट्रेडर्स शब्द का इस्तेमाल करते थे. देश के शीर्ष पदों पर काबिज अलग-अलग राजनीतिक विचारधारा के लोगों की ओर से मीडिया पर अगर ये हमले हुए और हो रहे हैं तो ये इस बात का परिचायक हैं कि मुख्य तौर पर मीडिया सत्ता के सामने नतमस्तक नहीं हुआ है.

भारत की चर्चित हिंदी पत्रिका आउटलुक के प्रधान संपादक आलोक मेहता के शब्दों में 'हमारे पास कई देशों से ज्यादा प्रेस फ्रीडम है. बस हमारे संपादकों को उस फ्रीडम को बनाए रखना है. राजनैतिक पार्टियां हमेशा प्रेस का प्रतिरोध करेगी, पर मीडिया को अपना काम जिम्मेदारी के साथ करना ही है'.

जहां तक टीआरपी या ज्यादा से ज्यादा पेज व्यू बटोरने की होड़ में मुख्य मुद्दों से मीडिया के भटकने की आशंका का सवाल है तो सोशल मीडिया के दौर में इसपर भी काफी हद तक अंकुश लगा है. आज ऐसे कई मुद्दे हैं जो पहले सोशल मीडिया की सुर्खियां बने और बाद में मुख्य धारा के मीडिया को भी उनपर कवरेज को मजबूर होना पड़ा. हाल ही में कैराना का मुद्दा इसका उदाहरण है. बीजेपी सांसद की ‘लिस्ट' के बाद ये मामला एक सांप्रदायिक रंग लेता उससे पहले ही पलायन में पेच की कहानियां सोशल मीडिया पर वायरल होने लगीं. जब मीडिया के रिपोर्टर मौके पर पहुंचे तो उन्होंने भी दावों और हकीकत में बड़ा अंतर पाया जिसके बाद सांसद को भी अपनी लिस्ट में संशोधन की बात कहनी पड़ी. अगर यह कहा जाए कि सोशल मीडिया आज मुख्य धारा के मीडिया के लिए वॉचडॉग की स्थिति में आ गया है तो ये पूरी तरह गलत नहीं होगा.

मीडिया के सामने अभिव्यक्ति की आजादी को बनाए रखने की चुनौतियां हमेशा से रही हैं और आगे भी रहने वाली हैं. पत्रकारों का ही दायित्व है कि इनसे निपटने के रास्ते खोजे ताकि समाज के प्रति अपने कर्तव्य का पालन करने की राह में किसी को भी रोड़ा बनने से रोका जा सके.

अभिषेक मेहरोत्रा

संपादकीय प्रमुख, samachar4media.com

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