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मंथन

वैज्ञानिक अब तक नहीं सुलझा पाए हैं स्काई डिस्क का रहस्य

जर्मनी के हाले शहर के म्यूजियम में एक डिस्क रखी है जिसका पता ही नहीं चल पाया है कि वह कहां से आई, क्यों बनाई गई और कब व किसने बनाई.

जर्मन शहर हाले के स्टेट म्यूजियम ऑफ प्रीहिस्ट्री में जर्मनी का सबसे महत्वपूर्ण आर्कियोलॉजिकल खजाना संभाल कर रखा गया है. इस संग्रह में 3600 साल पुरानी एक स्काई डिस्क है जिसके इर्द-गिर्द रहस्य का एक वातावरण है. यह डिस्क कहां से आई, किसने बनाई और क्यों बनाई? इन सवालों के जवाब वैज्ञानिक अब तक नहीं खोज पाए हैं.

हाले म्यूजियम में रखीं पुरानी कलाकृतियों को प्रदर्शित करने से पहले उनका गहन परीक्षण किया जाता है और उन्हें प्रदर्शन के तैयार किया जाता है. अपने हुनर से म्यूजियम के वर्कशॉप के कारीगर प्राचीन खोजों को सहेजना जानते हैं. और सहेजने के दौरान जब चीजों के सिरे जुड़ते हैं तो कई कहानियां बनती चली जाती हैं. जैसे कि कांच के जार के कुछ टुकड़ों का ढेर मिला. यह ढेर 500 साल पुराने एक घर के सेलर में मिला था. और जब उन्हें कुशलता से एक दूसरे से जोड़ा गया तो वे एक रसायन प्रयोगशाला का सामान निकले. उन्होंने हाइनरिष वुंडरलिष के सपनों को हवा दी. रसायनविज्ञानी वुंडरलिष बताते हैं, "हमें कुछ चीजों के बाकी बचे अंश मिले, खासकर ग्लास वाले एंटीमनी कंपाउंड के रूप में. यह कंपाउंड 16वीं सदी में रसायनशास्त्रियों के बीच अत्यंत लोकप्रिय हुआ करता था. इसकी वजह यह थी कि लोगों को पता चल गया था कि एंटीमनी सलफाइज से सोने की सफाई की जा सकती है."

किसने सोचा था कि कांच के सदियों पुराने टुकड़े यह बता सकते हैं कि आधुनिक चिकित्सा के जनक के रूप में अलकेमिस्ट और डॉक्टर पारासेलसुस ने किस तरह जहरीले नुस्खों से उपचार विकसित किए. वुंडरलिष बताते हैं, "पारासेलसुस की राय थी, कि इतनी कम दवा लो कि वह जहरीली न रहे, फिर वह इलाज करता है. और वह विख्यात उक्ति जो आज भी आधुनिक फार्मेसी का मूलमंत्र है, डोसिस फिएट वेनेनुम, यानि खुराक ही जहर का कारण होता है. यह उक्ति पारासेलसुस की है, जो दरअसल हेवी मेटल एंटीमनी से इलाज करने में विफलता के अनुभवों से आई."

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लेकिन एक कहानी है जिसके रहस्य सुलझ नहीं रहे. यह कहानी है कांसे और सोने से बनी डिस्क की जो कम से कम 3600 साल पुरानी है. हाले म्यूजियम के डाइरेक्टर प्रो. हाराल्ड मेलर कहते हैं कि यह स्काई डिस्क दुनिया की सबसे महत्वपूर्ण खोजों में एक है. स्काई डिस्क की खोज की कहानी भी बहुत दिलचस्प है. कब्रगाहों में चोरी करने वाले लुटेरों ने इसे मेटल डिटेक्टर की मदद से खोजा.

वे इसकी असली कीमत का अंदाजा नहीं लगा पाए और इसे ब्लैक मार्केट में बेच दिया. चोर 2002 में स्विट्जरलैंड के बाजेल में पकड़े गए और उसके बाद स्काई डिस्क हाले के म्यूजियम के पास पहुंची.

स्काई डिस्क कहां से आई, किसने और कब बनाई, इस पर उभरे चांद और तारों के क्या मायने हैं, इन तमाम सवालों का जवाब तलाशने में दुनिया भर के वैज्ञानिकों की दिलचस्पी थी. जर्मन शहर मनहाइम में इस धातु की उम्र का पता लगा लिया गया और फिर शुरू हुई बाकी अनुत्तरित सवालों के जवाबों की खोज.

लुटेरों का कहना था कि उन्हें नेबरा डिस्क जंगल में मिली थी. वैज्ञानिक उस जंगल में पहुंचे और वहां की मिट्टी का परीक्षण किया तो पता चला कि लुटेरे सच बोल रहे थे. कुछ और परीक्षणों से इस बात की पुष्टि हो गई कि डिस्क बहुत पुरानी है.

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मेटल के विश्लेषण से यह भी पता चला कि डिस्क में इस्तेमाल तांबा किस जगह का है. यह पूर्वी आल्प्स पहाड़ी क्षेत्र की हजारों साल पुरानी एक खान से आया था. डिस्क की प्रामाणिकता का पता चल जाने के बाद जांच किया जाने वाला दूसरा पहलू था इसका डिजायन. यह 32 सितारों, एक हंसिया जैसे चांद और सुनहरे सर्किल से बना है. सात तारों का समूह जरूर सात बहनें हैं जिन्हे प्लाइडिस के नाम से जाना जाता है. खगोलविज्ञानी माथियू ओसेनड्राइवर ने चौंकाने वाली खोज की. ओसोनड्राइवर बताते हैं, "चांद और प्लाइडीस का मेल हमें बेबीलोन काल के टेक्स्ट मुलापिन की याद दिलाता है. इसमें भी चांद और प्लाइडीस का जिक्र है ताकि साल में एक कैलेंडर महीना अतिरिक्त रूप से जोड़ा जा सके. कहते हैं कि मेसोपोटेमिया में भी खगोलविज्ञानी पंडित अपने मंदिरों से स्वर्ग की ओर निहारा करते थे. वे स्वर्गिक घटनाओं के बारे में जो भी देखते उसे मिट्टी के स्लेट पर लिख दिया करते. वे साल के शुरू में पहले चांद की जगह को देखते. और वह जहां कहीं भी स्थित होता, प्लाइडीस के साथ तुलना कर वे फैसला करते कि इस साल हम साल में एक महीना और जोड़ देंगे, तेरहवां महीना."

इस्लामी दुनिया का धार्मिक कैलेंडर भी चांद के आकलन पर निर्भर है. चांद देखकर ही ईद का दिन तय होता है. तो क्या ईद मनाने से इस डिस्क का कुछ रिश्ता होगा? इतनी गहराई तक अभी वैज्ञानिक नहीं पहुंच पाए हैं.

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