चीन को भी दुश्मन बना लेगा उत्तर कोरिया? | दुनिया | DW | 11.09.2017
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दुनिया

चीन को भी दुश्मन बना लेगा उत्तर कोरिया?

चीन शायद अकेला ऐसा देश है जिसका उत्तर कोरिया पर कुछ हद तक असर माना जा सकता है. लेकिन तेजी से परमाणु हथियार हासिल करने की तरफ बढ़ रहे उत्तर कोरिया के रिश्ते अब चीन से पहले जैसे नहीं रहे.

उत्तर कोरिया के नेता किम जोंग उन ने जब 2011 में सत्ता संभाली तो तत्कालीन चीनी राष्ट्रपति हू जिनताओ ने उनका भरपूर समर्थन करते हुए "पारंपरिक दोस्ताना सहयोग" आगे बढ़ने की इच्छा जतायी थी. अब भी उत्तर कोरिया का अगर कोई सबसे करीबी देश है तो वह चीन ही है. लेकिन रिश्तों में पहले जैसी गर्मजोशी नहीं है.

सत्ता संभालने के दो साल बाद किम जोंग उन ने अपने फूफा जांग सॉन्ग थाएक को "देशद्रोह" के आरोप में मौत सजा दे दी. जांग न सिर्फ चीन के साथ उत्तर कोरिया के मुख्य वार्ताकार थे बल्कि उन्हें एक हद तक सुधारवादी भी माना जाता था. बताया जाता है कि सत्ता संभालने के शुरुआती दिनों में उन्होंने किम जोंग उन की भी काफी मदद की थी.

जांग की मौत से ही चीन और उत्तर कोरिया के रिश्ते बिगड़ने लगे. कुछ विश्लेषक तो यहां तक कह रहे हैं कि कहीं उत्तर कोरिया के रिश्ते चीन के साथ ठीक वैसे ही न हो जाएं, जैसे उसके रिश्ते अमेरिका के साथ हैं. उत्तर कोरिया के तेजी से बढ़ते परमाणु हथियार और मिसाइल कार्यक्रम के चलते दोनों देशों के बीच राजनयिक मोर्चे पर तनाव बढ़ रहा है.

बीजिंग की रेनमिन यूनिवर्सिटी में अंतरराष्ट्रीय मामलों के प्रोफेसर जिन कानरोंग कहते हैं कि यह समझना ही गलत है कि तातकवर चीन गरीब देश उत्तर कोरिया पर राजनयिक तरीके से नियंत्रण कर सकता है. उनके मुताबिक, "दोनों देशों के बीच कभी ऐसे रिश्ते नहीं रहे कि कोई एक दूसरे को दबा सके. खास कर शीत युद्ध की समाप्ति के बाद, जब उत्तर कोरियाई लोग मुश्किलों में फंस गये थे और उन्हें चीन की तरफ से पर्याप्त मदद नहीं मिली. तब उन्होंने अपनी मदद खुद करने की ठानी."

चीन ने 1950 से 1953 तक चले कोरिया युद्ध में उत्तर कोरिया का साथ दिया था. इसमें चीनी नेता माओ त्सेतुंग का बड़ा बेटा भी मारा गया था. चीन उत्तर कोरिया का लंबे समय से मुख्य सहयोगी और व्यापारिक साझीदार रहा है. हालांकि दोनों देशों के रिश्तों पर हमेशा अविश्वास और संदेह की छाया मंडराती रही. कुछ विश्लेषकों का कहना है कि तबाही, बर्बादी और संकट की बजाय चीन ने उत्तर कोरिया के भड़काऊ कदमों को बर्दाश्त करना अब तक ज्यादा बेहतर समझा है. इसीलिए चीन बराबर संयम और बातचीत से मुद्दे को सुलझाने पर जोर देता है.

दोनों देशों के रिश्तों पर बात करने के लिए उत्तर कोरिया की तरफ से कोई जरिया ही नहीं है, जबकि चीनी विदेश मंत्रालय की तरफ से भी रॉयटर्स के फैक्स का कोई जबाव नहीं मिला. लेकिन उत्तर कोरिया के मौजूदा नेता किम जोंग उन के पिता किम जोंग इल ने 2011 में अपनी मौत तक कई ऐसे कदम उठाये जिनसे सुनिश्चित किया जा सके कि चीन उनके उत्तराधिकारी का समर्थन भी करता रहेगा.

सत्ता में आने के कुछ महीनों के भीतर ही किम जोंग उन ने अपने इरादे साफ कर दिये थे. उन्होंने संविधान में संशोधन तक उत्तर कोरिया को परमाणु राष्ट्र घोषित कर दिया. 2013 में जब जांग को मौत की सजा दी गयी तो इससे उत्तर कोरिया के नये नेता के प्रति चीन का अविश्वास और बढ़ गया.

उत्तर कोरिया के घटनाक्रम पर नजर रखने वाले बीजिंग स्थित एक राजनयिक ने बताया, "बेशक चीनी लोग खुश नहीं थे. अपने फूफा को मौत की सजा देना और वह इस तरह से." रिश्तों को बेहतर करने के लिए राष्ट्रपति शी जिनपिंग के एक उच्चाधिकारी लियू युनशान अक्टूबर 2015 में उत्तर कोरिया की सत्ताधारी वर्कर्स पार्टी की 70वीं सालगिरह पर होने वाली सैन्य परेड के मौके पर प्योंगयांग गये. लियू ने इस दौरान किम को राष्ट्रपति शी का एक पत्र भी सौंपा जिसमें युवा नेता की तारीफ की गयी थी.

लेकिन चीन के इन कदमों का उत्तर कोरिया पर कोई असर नहीं हुआ और वह लगातार आक्रामक हो गया. एक के बाद एक उसके मिसाइल और परमाणु परीक्षण चीन पर अंतरराष्ट्रीय दबाव को बढ़ा रहे हैं. अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप कई बार कह चुके हैं कि चीन उत्तर कोरिया पर अपने असर का प्रयोग नहीं कर रहा है.

वहीं कुछ विश्लेषकों का तो यह भी मानना है कि उत्तर कोरिया ऐसा इसलिए कर रहा है ताकि कूटनीतिक मोर्चे पर चीन को ज्यादा से ज्यादा शर्मिंदगी उठानी पड़े. टाइमिंग पर ध्यान दें तो पता चलता है कि जब चीन में ब्रिक्स देशों का सम्मेलन चल रहा था तो उसी दौरान उत्तर कोरिया के परमाणु परीक्षण की खबर आयी. इससे पहले चीन ने जब बीजिंग में अपनी "वन बेल्ट वन रोड" परियोजना को लेकर दुनिया भर के देशों का शिखर सम्मेलन बुलाया हुआ था तो उससे कुछ ही घंटे पहले उत्तर कोरिया ने लंबी दूरी की मिसाइल का परीक्षण कर डाला.

उत्तर कोरिया की वजह से पड़े रहे दबाव के बावजूद चीन ने अब तक कोई सख्त रुख नहीं अपनाया है. उत्तर कोरिया के हालिया परमाणु परीक्षण के बाद चीन के ग्लोबल टाइम्स अखबार में छपे एक संपादकीय के मुताबिक अगर उत्तर कोरिया के तेल का रास्ता बंद किया गया तो यह संकट चीन और उत्तर कोरिया के बीच संकट में तब्दील हो जायेगा.

बीजिंग के कारनेगी-त्सिंगहुआ सेंटर में उत्तर कोरिया मामलों के विशेषज्ञ चाओ थोंग कहते हैं कि उत्तर कोरिया इस बात से बहुत नाखुश की कि उसके खिलाफ लगाये गये संयुक्त राष्ट्र के प्रतिबंधों का चीन समर्थन करता है. वह कहते हैं, "अगर चीन उत्तर कोरिया की शासन व्यवस्था को अस्थिर करने वाले और कड़े आर्थिक प्रतिबंधों का समर्थन करेगा तो संभव है कि उत्तर कोरिया उसी तरह चीन को भी अपना दुश्मन समझने लगेगा जैसे वह अमेरिका को समझता है."

एके/एनआर (रॉयटर्स)

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