कश्मीर में युवा आतंकियों का सेल्फी-युद्ध | दुनिया | DW | 23.05.2016
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दुनिया

कश्मीर में युवा आतंकियों का सेल्फी-युद्ध

कश्मीर में आतंकियों के वीडियो वायरल होते रहते हैं. इंटरनेट पर स्थानीय लडाकों के वीडियो सहानुभूति पैदा करते हैं. इस सहानुभूति के पीछे कई वजह हैं.

बुरहान वानी जैसे कश्मीरी अलगाववादी बंदूक की जगह स्मार्टफोन को हथियार बना रहे हैं. भारत सरकार से खफा कश्मीरी युवकों तक अपना संदेश पहुंचाने के लिए वानी नए तौर-तरीकों का इस्तेमाल कर रहा है.

22 साल का वानी इस्लामिक अलगाववादी संगठन हिज्ब उल मुजाहिदीन का कमांडर है. वह आतंकवादियों की उस नई पीढ़ी का चेहरा है जो युवाओं की सहानुभूति जीतने में कामयाब हो रहे हैं. वानी के पिता मोहम्मद मुजफ्फर वानी कहते हैं, “वह नेक काम कर रहा है और हमें उस पर नाज है.”

वानी ने पिछले साल सोशल मीडिया पर अपने दल की तस्वीरें और कुछ भाषण डाले थे जो खूब देखे गए. इसके बाद वानी जाना-पहचाना नाम बन गया. त्राल में एक स्कूल के हेडमास्टर उसके पिता कहते हैं कि पूरा कश्मीर उसके मकसद का समर्थन करता है.

कश्मीर में आतंकवाद 1990 से चल रहा है लेकिन दो साल पहले आई नई सरकार ने कई नई पहल करके कश्मीरियों के साथ बातचीत आगे बढ़ाने की कोशिश की है. हालांकि इस पहल को अभी ज्यादा जगह नहीं मिल पाई है. शांति के जरिए कश्मीर की आजादी हासिल करने की बात कहने वाले मीरवाइज उमर फारूक कहते हैं, “भारत सरकार ने फैसला किया है कि वह समस्या से सेना के जरिये निपटना चाहती है, राजनीतिक तौर-तरीकों से नहीं.” फारूक का आरोप है कि नई दिल्ली हम कश्मीरियों को साढ़े सात लाख सैनिकों के जूतों तले रखना चाहती है. साथ ही कश्मीरी हिंदुओं को घाटी वापस लाकर राज्य की जनसांख्यिकी बदलना भी एक रणनीति है. लेकिन नरमपंथी और उग्रवादी दोनों तरह के अलगाववादी मानते हैं कि इससे उग्रता और बढ़ेगी.

इसी उग्रता को वानी जैसे लोग इस्तेमाल करना चाहते हैं. मानवाधिकार कार्यकर्ता कहते हैं कि आतंकवादी सेना का सीधे मुकाबला नहीं कर सकते क्योंकि वे संख्या में बहुत कम हैं. कुछ आंकड़ों के मुताबिक हर एक आतंकवादी पर घाटी में 3000 सैनिक हैं. इसलिए आतंकवादी लुकाछिपी का खेल खेलते हैं ताकि अपना राजनीतिक तर्क पेश कर सकें. एक सामाजिक समूह में सक्रिय खुर्रम परवेज कहते हैं, “उनके पास बंदूकें हैं लेकिन वीडियो जारी करना हिंसा नहीं है. यह प्रचार है.”

वानी हाल ही में एक वीडियो में नजर आया था. इस वीडियो में वह और उसके साथी अलाव के ईर्द गिर्द बैठे हंस रहे थे और हाथ सेक रहे थे. इस तरह के वीडियो सहानुभूति जुटाने में सफल हो रहे हैं. हाल के दिनों में आतंकवादी वारदात की जगहों पर लोग बड़ी संख्या में पहुंच रहे हैं. आतंकी वारदात की खबर आते ही लोग वहां पहुंच जाते हैं. कई बार यह जमावड़ा पत्थरबाजी में तब्दील हो जाता है. अलगाववादियों की अंतिम यात्राओं में जमा होने वाली भीड़ भी बढ़ी है.

भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का एक वरिष्ठ सहयोगी अपना नाम न बताने की शर्त पर कहता है, “कश्मीर में आतंकवाद कम हुआ है लेकिन अस्थिरता बढ़ी है. पहले, मकसद था विदेशी तत्वों का सफाया. लेकिन अब घरेलू आतंकवादी बहुत ज्यादा बढ़ रहे हैं.”

घरेलू आतंकवाद यानि स्थानीय लोगों के मुठभेड़ों में मारे जाने पर स्थानीय गुस्सा भी भड़कता है. फरवरी में एक मुठभेड़ में 22 साल की शाइस्ता हमीद आग में फंसकर मर गई थी. लेलहार गांव की उस मुठभेड़ में एक और युवक भी मारा गया था. यह मुठभेड़ जिन दो लश्कर आतंकियों को मारने या पकड़ने के लिए की गई थी, वे भाग निकले क्योंकि स्थानीय लोगों ने सैनिकों पर पथराव कर दिया. हाई स्कूल में पढ़ने वाला तारिक कहता है, “ये उग्रवादी हमारे भाई हैं. वे हमारे लिए लड़ रहे हैं और हमारे लिए आजादी मांग रहे हैं. अगर अत्याचार बंद न हुए तो मैं भी बंदूक उठा लूंगा.”

वीके/एमजे (रॉयटर्स)

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