जयललिता की जय से आगे का रास्ता | ब्लॉग | DW | 06.12.2016
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ब्लॉग

जयललिता की जय से आगे का रास्ता

भारत की समकालीन राजनीति की तीन सबसे बड़ी क्षेत्रीय शक्तियों की त्रयी जयललिता, मायावती और ममता बनर्जी से बनती है. इस त्रयी में जयललिता सबसे मजबूत और पुरानी कड़ी थीं.

तमिलनाडु की मुख्यमंत्री और अन्नाद्रमुक पार्टी की प्रमुख जे जयललिता ने सक्रिय राजनीति में करीब 34 साल बिताए. 1991 में पहली बार तमिलनाडु की सबसे युवा महिला मुख्यमंत्री बनीं. इस तरह से मुख्यमंत्री और विपक्ष की नेता के रूप में उनके राजनैतिक उतार-चढ़ाव के 25 साल भी पूरे हुए थे. भारतीय राजनीति में टिके रहने के लिए 68 साल कोई लंबी उम्र नहीं होती लेकिन जयललिता के बुरी तरह गिरते हुए स्वास्थ्य ने इस पर विराम लगा दिया. हालांकि उनके कई चाहने वाले ऐसे भी हैं जो उनकी बीमारी को षड्यंत्र से भी जोड़कर देखेंगे क्योंकि उन्हें लगेगा कि सार्वजनिक जीवन में उनकी ‘अम्मा' और उनकी ‘पुरातची थलाइवी' (क्रांतिकारी नेता) शिथिल नहीं दिखती थीं. और इसी साल मई में तो वो भारी बहुमत से जीतकर आई थीं. जबकि उन्हें भ्रष्टाचार के एक मामले में जेल की सजा भी काटनी पड़ी थी.

कन्नड़, तमिल, तेलुगु के अलावा अंग्रेज़ी और हिंदी भाषाओं में अच्छी पकड़ रखने वाली जयललिता वकील बनना चाहती थीं लेकिन उनकी खूबसूरती, उनकी अदाएं और मां की जिद उन्हें कन्नड़, तेलुगु और तमिल फिल्म उद्योग की ओर ले गईं. अदम्य ऊर्जा, बुद्धिमता और जीत की चाहत के दम पर अपने दौर की सुपरहिट अभिनेत्रियों में एक बनीं. दक्षिण भारतीय फिल्मों के धुरंधर सुपरस्टार्स जैसे शिवाजी गणेशन, एनटी रामाराव, जयशंकर, राज कुमार और एमजी रामचंद्रन के साथ उन्होंने फिल्में कीं. बाद में एमजी रामचंद्रन उनके मेंटॉर बन गए.  1972 में अन्नाद्रमुक का गठन कर चुके एमजीआर ने 1982 में जयललिता को पार्टी में शामिल होने की दावत दी. जयललिता के लिए ये एक अलग और मुश्किल भूगोल था लेकिन शुरुआती झटकों के बाद उन्होंने पीछे मुड़ कर नहीं देखा.

1983 में वो पार्टी की विधायक बनीं और 1984 में राज्यसभा सांसद. 1988 में जब एमजी रामचंद्रन के इंतकाल के बाद पार्टी दो फाड़ हुई तो जयललिता ने खुद को एमजीआर का राजनैतिक उत्तराधिकारी घोषित कर दिया. राज्य के जनमानस पर कर्नाटक के ब्राह्मण परिवार से आईं, तेजतर्रार जयललिता की छवि अंकित होती चली गई. 1989 में डीएमके सरकार के दौर में तमिलनाडु विधानसभा के भीतर विपक्ष की नेता जयललिता के साथ छीनाझपटी और बदसलूकी की गई. सदन के भीतर किसी महिला नेता का ऐसा घृणित अपमान कभी नहीं हुआ था. वो ऐसी बिफरीं कि महिला सम्मान की वापसी के साथ लौटने की कसम खाई. ये कसम उन्होंने 1991 में मुख्यमंत्री बनकर पूरी की जब कांग्रेस के साथ समझौता कर प्रचंड बहुमत हासिल किया. जयललिता ने एक अलग ही ढंग से अपनी पोशाकें पहनीं, आभूषण कभी नहीं पहने और एक कट्टर किस्म के मर्दवादी समाज में खुद के लिए स्त्रियोचित विराटता का एक प्रतीक गढ़ लिया. ये एक तरह का ‘डिसेक्शूअलाइज़ेशन' था. वो अब सबसे अलग और ऊपर होती गईं और अम्मा कहलाने लगीं. जयललिता का ‘अम्मा' ब्रांड और खुले दिल से चुनाव पूर्व और चुनाव बाद उपहार बांटने की लोकप्रिय शैली ने लोगों को उनका पहले मुरीद फिर परम भक्त बनाया. भारतीय राजनीति में आगे शायद ही ऐसा नजारा देखने को मिले. इससे पहले ऐसी अगाध ‘श्रद्धा' सिर्फ पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को ही हासिल हो पाई थी.

तस्वीरों में: विवादों की अम्मा

90 के दशक में ही भारतीय राजनीति में क्षेत्रीय दलों के दबदबे का नया दौर भी शुरू हुआ. गठबंधन की राजनीति दक्षिण भारत के कद्दावर नेताओं के इर्दगिर्द घूमने लगी. जयललिता की धमक दिल्ली तक सुनाई दी. केंद्र की सरकारों में दबदबा बना और मंत्री भी. उनसे मिलने कभी कांग्रेस कभी बीजेपी कभी वामदल कभी इन दलों के साथ मिलकर बने राजनैतिक गठबंधनों के प्रमुख नेता चेन्नई जाते रहे. जयललिता ने कभी किसी का सलाम कुबूल किया, कभी नहीं. कभी तुनक गईं, कभी मुंह फिरा लिया. कभी मानीं, कभी नहीं मानीं. जयललिता पर अक्खड़ और गोलमोल रवैये के आरोप लगे. अतिशय भ्रष्टाचार और अपने करीबियों पर राज्य के संसाधन लुटाने के आरोप भी खूब लगे. जयललिता इन सबसे बेपरवाह थीं. उनके समर्थक, उनके मंत्री उनके विधायक और पार्टी के नेता कार्यकर्ता उन्हें दूर से, कमर तक झुक कर प्रणाम करते थे. कई तो दंडवत भी होते थे. उनमें से एक ओ. पनीरसेल्वम भी हैं जो जयललिता के अस्पताल में भर्ती होने के बाद से कार्यवाहक मुख्यमंत्री के रूप में काम तो करते रहे लेकिन सीएम की कुर्सी से अलग हटकर. उस पर उनकी ‘अम्मा' की तस्वीर रखी रही.

इस तस्वीर को मुख्यमंत्री बनाकर तो तमिलनाडु की आगे की राजनीति, अन्नाद्रमुक पार्टी करती नहीं रह पाएगी. बेशक ये तस्वीर उसके वोटरों के बीच लंबे समय तक पार्टी से जुड़े रहने का सबब बनी रहेगी लेकिन आखिरकार एक चेहरा तो उसे चाहिए ही होगा. मुख्यमंत्री तो चुन लिए गए लेकिन क्या पनीरसेल्वम वो चेहरा बन पाएंगे या वो चेहरा बनेंगी शशिकाल नटराजन जो जयललिता की करीबी रही हैं और अस्पताल में उनकी देखरेख संभालती रहीं. शशिकला के ही भतीजे की शादी एक अविश्वसनीय धूमधाम के साथ 1995 में जयललिता ने की थी और आलोचना का शिकार बनी थीं. एक तीसरा संभावित चेहरा तमिलनाडु की पूर्व मुख्य सचिव शीला बालकृष्णन का है जो जयललिता की सलाहकार बनीं और अस्पताल में डटी रहीं.

जयललिता के भारीभरकम राजनैतिक करियर की यही एक बड़ी चूक थी या शायद वो ऐसा चाहती भी न हों कि उनके समानांतर कोई नेता के रूप में उभरता दिखे. क्या अन्नाद्रमुक पार्टी एक और बिखराव की ओर बढ़ रही है? क्या कोई नेता, जयललिता की जयजयकार और भक्ति के उस कुहासे से निकलकर प्रशंसकों में सर्वमान्य स्वीकार्यता बना पाएगा? इस सवाल को अन्नाद्रमुक जितना जल्दी हल कर ले, उतना उसके लिए बेहतर होगा. क्योंकि डीएमके या कांग्रेस या राज्य में अपने पांव जमाने की कोशिश कर रही बीजेपी को चुनौती देने के लिए अन्नाद्रमुक के पास फिलहाल कुछ समय तक तो जयललिता की याद रहेगी, लेकिन राजनीति में ‘याद' तो कोई विरासत होती नहीं.

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