1. Inhalt
  2. Navigation
  3. Weitere Inhalte
  4. Metanavigation
  5. Suche
  6. Choose from 30 Languages

विज्ञान

टीशर्ट बताएगी, मुझे गुलाम ने बनाया है तो मत खरीदो

कपड़ा उद्योग में दास प्रथा से लड़ने के लिए तकनीक का सहारा लिया जा रहा है. डीएनए की मदद से आप जान सकते हैं कि कौन सा कपड़ा कहां से आया है.

क्या आप ब्रैंडेड टीशर्ट खरीदने से पहले सोचते हैं कि इसे बनाने के लिए किसी इंसान को गुलाम बनाकर उससे काम तो नहीं करवाया गया? और अगर सोचते भी हैं, तो क्या इस सवाल का जवाब मिल पाता है? यानी, आप अगर कसम भी खा लें कि दास प्रथा के विरोध में ऐसी चीजें नहीं खरीदेंगे, जिन्हें बनाने के लिए इंसानों को गुलाम बनाया गया हो, तो भी बेबस रहेंगे. क्योंकि पता कैसे चले कि कपड़े को कैसे और किसने बनाया है. अब पता चल सकेगा. तकनीक की मदद से. डीएनए फॉरेंसिक तकनीक आपको बता सकेगी कि कौन सा कपड़ा बनाने में किसने काम किया है.

देखिए, कैसे बने ये कपड़े

इस तकनीक पर अप्लाइड डीएनए साइंसेज इंक कपड़ा उद्योग के साथ मिलकर करीब 9 साल से काम कर रही थी. इस अमेरिकी कंपनी के चीफ एग्जेक्यूटिव जेम्स हेवर्ड बताते हैं कि यह तकनीक नकल जैसी समस्याओं से लड़ सकती है और साथ ही यह सुनिश्चित कर सकती है कि कपड़े प्रमाणिक हों. हेवर्ड बताते हैं कि इस तकनीक पर काम करने के पीछे उनकी प्रेरणा पूरी दुनिया से उठ रही वे चिंताएं थीं जो 25 करोड़ लोगों को रोजगार देने वाले कपड़ा उद्योग को परेशान कर रही थीं. इस उद्योग पर गुलामों और बाल मजदूरों को झोंके जाने के आरोप लगते हैं. ऐसे कई प्रमाण मिल चुके हैं जबकि कपास उगाने से लेकर टीशर्ट बनाने तक पूरी प्रक्रिया में कहीं ना कहीं बाल मजदूरों या फिर गुलामों का इस्तेमाल होता है.

कपास या सूती उद्योग इस मामले में सबसे जटिल उद्योग है क्योंकि इसकी सप्लाई से लेकर फैशनेबल कपड़े बनाने तक में 100 से ज्यादा देश शामिल हैं और अलग अलग स्तरों पर काम होता है. हेवर्ड बताते हैं, "कपास उगाने से लेकर सूती कमीज बनाने की पूरी प्रक्रिया में अक्सर एक देश एक ही काम कर रहा होता है. इस वजह से गड़बड़ी के लिए अनेक मौके मिलते हैं."

जानें, कितनी बार पहनें कौन सा कपड़ा

हेवर्ड कहते हैं कि हमारा मकसद कपास की सप्लाई चेन की सफाई करना है. यानी कपास को सूत में बदलकर बेचने के दौरान उसकी पहचान के लिए डीएनए तकनीक की मदद ले जाती है. हेवर्ड की कंपनी डीएनए की पहचानकर उसका लेबल लगाने की तकनीक उपलब्ध कराती है. इससे कपास कहीं भी जाए, पता चल जाएगा कि यह कहां का कपास है और कहां कहां से गुजरा है. दरअसल, सप्लाई के दौरान ही गड़बड़ी की गुंजाइश होती है. जैसे कि गलत लेबलिंग हो जाती है या फिर कई जगहों के कपास को मिला दिया जाता है.

दास प्रथा इस वक्त पूरी दुनिया के लिए एक बड़ी समस्या है. वॉक फ्री फाउंडेशन ने ग्लोबल स्लेवरी इंडेक्स जारी किया है जिसके मुताबिक दुनिया में 4.6 करोड़ लोगों को कहीं ना कहीं किसी न किसी रूप में गुलाम बनाकर रखा गया है. फाउंडेशन का कहना है कि तुर्कमेनिस्तान, ताजिकिस्तान और कपास का पांचवां सबसे बड़ा उत्पादक उज्बेकिस्तान अपने लोगों को कपास की खेती में काम करने को मजबूर कर रहे हैं.

वीके/एके (रॉयटर्स)

DW.COM