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ब्लॉग

भारत में पत्रकारिता के बढ़ते खतरे

बिहार और झारखंड में पत्रकारों की हत्या के बाद ये सवाल उठा है कि लोकतांत्रिक भारत पत्रकारों के लिए इतना खतरनाक क्यों है? कुलदीप कुमार पत्रकारों को बेहतर कामकाजी और आर्थिक सुरक्षा उपलब्ध कराने की वकालत करते हैं.

तीन दिन पहले 24 घंटों के भीतर बिहार और झारखंड में दो पत्रकारों की हत्या कर दी गई. इससे एक बार फिर यह आशंका पुष्ट हो गई कि भारत में निर्भीक पत्रकारिता करना खतरों से भरा है. पिछले साल अंतर्राष्ट्रीय संगठन कमिटी टु प्रोटेक्ट जर्नलिस्ट्स ने एक रिपोर्ट जारी की थी जिसमें कहा गया था कि युद्धग्रस्त इराक और सीरिया के बाद दुनिया भर में भारत ही ऐसा देश है जहां पत्रकारों को सबसे अधिक खतरा है और जहां उनकी सबसे अधिक हत्याएं होती हैं. वर्ष 1992 से लेकर 2015 तक भारत के विभिन्न भागों में 64 पत्रकारों को काम के दौरान अपनी जान गंवानी पड़ी है. इनमें से अधिकांश उन छोटे कस्बों में कार्यरत थे जहां भ्रष्टाचार का बोलबाला है और उसे उजागर करने का मतलब स्थानीय अफसरशाही, राजनीतिक नेताओं और गुंडों से दुश्मनी मोल लेना है.

बिहार के सिवान में दैनिक हिंदुस्तान के ब्यूरो प्रमुख राजदेव रंजन भी माफिया डॉन से राजनीतिक नेता बने शहाबुद्दीन की कारगुजारियों की पड़ताल कर रहे थे और उनकी खोजबीन से 2014 में राजनीतिक कार्यकर्ता श्रीकांत भारती की हत्या में शहाबुद्दीन का हाथ होने के संकेत मिल रहे थे. लालू प्रसाद यादव की पार्टी राष्ट्रीय जनता दल के नेता शहाबुद्दीन इस समय भी हत्या के मामले में जेल में ही हैं. जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) के सक्रिय नेता चंद्रशेखर की हत्या के पीछे भी उन्हीं का हाथ माना जाता है. इस समय लालू यादव की पार्टी सत्ता में है और उनके पुत्र बिहार के उपमुख्यमंत्री हैं.

हालांकि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने अपनी छवि अपराधी तत्वों से समझौता न करने वाले नेता और प्रशासक की बनाई है, लेकिन पिछले कुछ समय से राज्य में बढ़ रहे अपराधों को देखते हुए अब इस छवि पर भी प्रश्नचिन्ह लग रहे हैं. पिछले साल उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर में स्थानीय पत्रकार जागेन्द्र सिंह को जिंदा जला कर मार दिया गया था. जागेन्द्र सिंह वहां के एक विधायक के बारे में असुविधाजनक रिपोर्टिंग कर रहे थे. बहुत बाद में अचानक उनके परिवारवालों ने यह बयान दिया कि जागेन्द्र सिंह ने खुद ही स्वयं को आग लगाकर जान ले ली थी. इस बयान के पीछे राजनीतिक दबाव माना गया था.

झारखंड में भी यही स्थिति है. वहां पत्रकार अखिलेश प्रताप सिंह की हत्या कर दी गई. ये हत्याएं बहुत पेशेवर तरीके से की गई हैं इसलिए इनका कारण कोई छोटी-मोटी आपसी रंजिश नहीं हो सकती. इन्हें योजनाबद्ध तरीके से अंजाम दिया गया है यानी इनके पीछे ऐसे ताकतवर तत्वों का हाथ है जिन्हें पत्रकारों के लेखन से परेशानी होती है. शनिवार को प्रेस क्लब ऑफ इंडिया और मुंबई प्रेस क्लब जैसी पत्रकारों की संस्थाओं ने बिहार और झारखंड में हुई हत्याओं के दोषियों की तत्काल गिरफ्तारी की मांग करते हुए देश में अभिव्यक्ति की आजादी पर लगातार बढ़ रहे हमलों पर चिंता प्रकट की. जब पत्रकार दबाव के आगे झुकने से इनकार कर देते हैं तो उनकी हत्या कर दी जाती है.

अनेक पत्रकार संघर्षग्रस्त क्षेत्रों से रिपोर्टिंग करते हुए मारे जाते हैं. लड़ाई के मोर्चे पर न जाने कितने पत्रकारों ने अपनी जान गंवाई है. लेकिन एक दुर्भाग्यपूर्ण तथ्य यह है कि अखबार और टीवी चैनल अपने पत्रकारों का जीवन बीमा भी नहीं कराते. पत्रकारिता एक ऐसा अभागा पेशा है जिसमें पेंशन की कोई सुविधा नहीं है. इसीलिए बुढ़ापे में भी पत्रकार काम करते नजर आते हैं. पत्रकार संगठनों का दायित्व है कि वे देश भर में सरकार और मीडिया के मालिकों का ध्यान इन समस्याओं की ओर आकृष्ट करें ताकि पत्रकारों की सुरक्षा के बेहतर इंतजाम हो सकें और उनकी मृत्यु की स्थिति में उनके परिवार के लोगों को राहत उपलब्ध कराई जा सके. यह केंद्र और राज्य सरकारों का संवैधानिक दायित्व है कि वे यह सुनिश्चित करें कि पत्रकार बिना किसी खौफ के अपना काम कर सकें और उनकी अभिव्यक्ति की आजादी पर आंच न आने पाए. लेकिन खुद अभिव्यक्ति की आजादी पर बंदिशें लगाने वाली सरकारें क्या कभी ऐसा करेंगी?

ब्लॉग: कुलदीप कुमार

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