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दुनिया

मर्द हों ना हों राजी, ये तो बनेंगी काजी

भारत की कुछ मुसलमान औरतों ने मर्दों की दुनिया को चुनौती देने की तैयारी कर ली है. वे काजी बनने वाली हैं. हालांकि मर्द ज्यादा खुश नहीं हैं.

इन मुसलमान औरतों ने तैयारी कर ली है मर्दों को चुनौती देने की. अब ये काजी बनेंगी. इस्लाम में काजी बनना मर्दों का पेशा माना जाता है. लेकिन मुंबई की एक संस्था कुछ महिलाओं को इस पेशे के लिए तैयार कर रही है.

इस संस्था का नाम है भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन (बीएमएमए). यह संस्था 30 महिलाओं को कुरान के कानूनों की शिक्षा दे रही है. साथ ही इन्हें संविधान और महिला अधिकारों की जानकारी भी दी जा रही है. संस्था का मकसद है कि पूरे देश में महिला काजियों की एक पूरी जमात तैयार की जाए.

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भारत की सबसे बड़ी अल्पसंख्य आबादी मुसलमानों को भारतीय संविधान में बराबर के हक हासिल हैं लेकिन शादी, तलाक और विरासत आदि के मसलों पर वे अपने फैसले अपनी नागरिक संहिता के मुताबिक कर सकते हैं. इसलिए इस तरह के मामले काजियों के पास जाते हैं. हालांकि काजी आमतौर पर विरासत में मिला एक टाइटल होता है. शादियां और तलाक कराना और इन पर विवादों की सुनवाई करना उसका काम होता है. और यह काम पुरुष ही करते आए हैं. लेकिन बीएमएमए इस स्थिति को बदलना चाहती है. बीएमएमए की सह संस्थापक जाकिया सोमान बताती हैं, "पारंपरिक तौर पर तो काजी पुरुष ही होते हैं. और उनके फैसलों को कोई चुनौती भी नहीं दी जाती. भले ही फिर ये फैसले महिलाओं के साथ अन्याय ही क्यों न कर रहे हों." सोमान कहती हैं कि इसीलिए महिला काजियों का होना जरूरी हो गया है. उन्होंने कहा, "यह जरूरी है कि महिलाएं ऐसे मामलों को सुनें जिनमें कोई महिला ही मुश्किल स्थिति में है. और फिर कुरान में ऐसी कोई पाबंदी नहीं है कि औरत काजी नहीं हो सकती."

बीएमएमए का यह कदम ऐसे वक्त में उठा है जबकि ऐसे कानूनों पर लगातार सवाल उठ रहे हैं जो महिलाओं के साथ भेदभाव करते हैं. संस्था ने पिछले साल एक सर्वे किया था जिसमें पता चला कि 90 फीसदी मुस्लिम महिलाएं चाहती हैं कि ट्रिपल तलाक की प्रथा बंद हो. इन महिलाओं ने एक से ज्यादा शादियों को भी गलत माना. ट्रिपल तलाक पर बैन लगाने संबंधी एक याचिका में पिछले महीने भारत के सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस बात की पड़ताल की जाएगी कि इस्लामिक कानूनों में किस हद तक दखल दिया जा सकता है.

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भारत की 1.2 अरब आबादी में 13 फीसदी मुसलमान हैं. लेकिन सरकारी आंकड़े दिखाते हैं कि यह तबका सबसे ज्यादा पिछड़ा हुआ है और समाज में हाशिये पर है.

जिन महिलाओं को काजी बनने का प्रशिक्षण दिया जा रहा है वे सामुदायिक कार्यकर्ता हैं. महाराष्ट्र, राजस्थान, मध्य प्रदेश, तमिलनाडु और बिहार की ये महिलाएं फिलहाल मुंबई में ट्रेनिंग ले रही हैं. वैसे, मुस्लिम देश इंडोनेशिया और मलेशिया में कुछ महिला काजी हैं. सोमान कहती हैं कि एक औरत अगर काजी बनेगी तो वह बाल विवाह रोक सकेगी, सुनिश्चित कर सकेगी कि औरत की शादी उसकी मर्जी से हो, और उसे तलाक के वक्त उसका पूरा हक मिले.

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लेकिन ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने महिलाओं को काजी बनाने के इस कदम की आलोचना की है. मुस्लिम पर्सनल लॉ के लिए जिम्मेदार इस गैरसरकारी संगठन का मानना है कि महिलाओं को काजी बनने का हक नहीं है. बोर्ड के सचिव मौलाना खालिद रश्दी फिरंगी महली कहते हैं, "महिलाओं को काजी बनने का कोई हक नहीं है. और फिर जरूरत भी नहीं है क्योंकि पहले ही पुरुष काजी काफी संख्या में हैं. इसलिए यह एक फिजूल का काम है."

लेकिन ट्रेनिंग ले रहीं साफिया अख्तर इस बात से इत्तेफाक नहीं रखतीं. उनका कहना है कि महिला काजियों की सख्त जरूरत है. भोपाल में उन्होंने कहा, "मुस्लिम औरतों के साथ बहुत अन्याय होता है. जो मामले हमें प्रभावित कर रहे हैं, हमें उनमें अपनी बात कहने का पूरा हक है. अगर इस देश की औरतें पायलट और प्रधानमंत्री बन सकती हैं तो फिर काजी क्यों नहीं?"

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