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दुनिया

हथियार संधि से भारत को खतरा नहीं

अमेरिका ने भारत को भरोसा दिया है कि अरबों डॉ़लर के हथियार बाजार से जुड़ी संधि से भारत के हितों को नुकसान नहीं पहुंचेगा. इस संधि पर ईरान, सीरिया और उत्तर कोरिया ने अड़ंगा लगा दिया है.

अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल के प्रमुख टॉम कंट्रीमन ने कहा, "मुझे इस बात की खुशी है कि यहां भारतीय प्रतिनिधि ने इस पर अपनी चिंता जताई है लेकिन मेरी नजर से इस संधि से भारत और अमेरिका के बीच के द्विपक्षीय रिश्तों पर किसी तरह का असर नहीं पड़ेगा."

दुनिया भर में हर साल करीब 80 अरब डॉलर का हथियार सौदा होता है. इस पर अंकुश लगाने के लिए संयुक्त राष्ट्र में संधि का प्रस्ताव था, जिसका ईरान, उत्तर कोरिया और सीरिया ने विरोध किया. इस वजह से यह संधि नहीं हो पाई और अब इसे संयुक्त राष्ट्र महासभा में वोटिंग के लिए लाया जाएगा. वहां दो तिहाई बहुमत से यह पास हो सकता है.

बात नहीं मानी

भारत ने इस प्रस्ताव को अमल में लाने के लिए कड़ा प्रयास किया है. लेकिन इसके आखिरी मसौदे पर उसने एतराज जताया. भारतीय प्रतिनिधि सुजाता मेहता ने कहा कि आखिरी मसौदा भारत की अपेक्षाओं के अनुकूल नहीं है, "इस कांफ्रेंस के शुरू में ही भारत ने साफ कर दिया था कि एटीटी संधि हथियारों के अवैध खरीद फरोख्त और उनके गैरवाजिब इस्तेमाल तथा आतंकवादियों और गैरसरकारी संस्थाओं को हथियार दिए जाने की घटनाओं पर इसका असर दिखना चाहिए. लेकिन आखिरी मसौदे में इस तरह के प्रतिबंधों का साफ उल्लेख नहीं है."

Rüstungskontrolle

बैठक में नहीं हुआ फैसला

भारत का कहना है कि संधि ऐसी नहीं होनी चाहिए, जिससे हथियारों का निर्यात करने वाले देशों को एकतरफा फैसला लेने की सुविधा हो.

संधि के रोड़े

संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय में 10 दिनों की कांफ्रेंस के दौरान ईरान, उत्तर कोरिया और सीरिया ने दो बार इससे संबंधित प्रस्ताव के पास होने की राह में रोड़े अटकाए. इसके बाद तय किया गया कि 193 देशों वाली संयुक्त राष्ट्र महासभा में इसे पेश किया जाएगा.

प्रस्ताव पास न होने को ब्रिटेन नाकामी नहीं मानता है. इसकी मुख्य वार्ताकार जो एडमसन ने कहा, "यह नाकामी नहीं है. आज सिर्फ कामयाबी को आगे टाल दिया गया है और हमेशा आगे नहीं टाला जाता जाएगा."

एमनेस्टी इंटरनेशनल ने संधि न हो पाने पर निराशा जताई है. ऑक्सफैम की आना मैकडोनाल्ड का कहना है, "तीन राष्ट्रों ने पूरी दुनिया को बंधक बना लिया." दुनिया भर के प्रमुख हथियार उत्पादक अमेरिका, जर्मनी, रूस, फ्रांस और चीन इस संधि को मानने के लिए तैयार थे. संधि पर 2006 से बातचीत चल रही है.

जरूरी है संधि

परमाणु हथियारों के प्रसार को रोकने वाली 1996 की सीटीबीटी संधि के बाद यह दुनिया की सबसे बड़ी हथियार संधि है. यह आम तौर पर इस्तेमाल होने वाले हथियारों, जैसे टैंकों, बख्तरबंद गाड़ियों, युद्धक विमानों, हेलिकॉप्टरों, युद्घपोतों, मिसाइलों और मिसाइल लांचरों से जुड़ी है.

लेकिन संयुक्त राष्ट्र में ईरान के राजदूत मुहम्मद खाजी का कहना है, "इस प्रस्ताव में राष्ट्रों की आत्मसुरक्षा और अपने क्षेत्रों की सुरक्षा बनाए रखने के प्रावधानों का उल्लेख नहीं किया गया है." उत्तर कोरिया ने इसे जोखिम भरा प्रस्ताव बताया, जबकि सीरिया के राजदूत बशर जाफरी का कहना है कि इसके अमल में आने से आतंकवादियों तक ज्यादा हथियार पहुंच सकते हैं.

दुनिया भर के लोगों ने इन तीन राष्ट्रों को इस बात के संकेत दिए कि वे अलग थलग पड़ गए हैं. संयुक्त राष्ट्र महासचिव बान की मून ने संधि लटक जाने पर गहरी निराशा जताई.

अमेरिका दुनिया का सबसे बड़ा हथियार डीलर है, जबकि भारत सबसे बड़ा खरीदार. अब अगर इसे महासभा में स्वीकार भी कर लिया जाता है, तो सभी राष्ट्रों पर इसे मानने की बाध्यता नहीं होगी.

एजेए/एमजे (पीटीआई, एपी, एएफपी)

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