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ब्लॉग

आत्महत्या अपराध नहीं रहेगा भारत में

भारतीय संसद के ऊपरी सदन राज्य सभा ने आत्महत्या को अपराध के दायरे से बाहर निकालने का रास्ता साफ कर दिया है. निर्मल यादव का कहना है कि बदली परिस्थितियों में यह बहुत ही जरूरी कदम है.

भारत को ब्रिटिशकालीन कानूनों के चंगुल से मुक्त करने की कोशिश में एक कदम और आगे बढा दिया गया है. मोदी सरकार ने आत्महत्या के प्रयास को अपराध के दायरे से बाहर करने के लिए कानून में बदलाव की पहल का पहला पड़ाव पार कर लिया है.

क्या है पहल

संसद के मानसून सत्र में सरकार ने मानसिक स्वास्थ्य सुविधा विधेयक 2013 को राज्यसभा से पारित करा लिया. यह विधेयक आधुनिक जीवन शैली के कारण व्यापक पैमाने पर देश भर में मानसिक बीमारियों का दायरा बढने से जनित चिंताओं का निराकरण करता है. इसमें सबसे बडी चिंता मानसिक तनाव और अवसाद के कारण खुदकुशी का प्रयास करने की प्रवृत्ति बढने को लेकर जताई गई है. कानून के इस मसौदे में स्पष्ट तौर पर माना गया है कि खुदकुशी का प्रयास सामान्य मनोदशा में संभव नहीं है.

भारतीय चिकित्सा परिषद की रिपोर्ट के मुताबिक पांच दशकों में देश में आत्महत्या के अधिकांश मामलों में मानसिक व्याधि या अवसाद का होना मूल कारण पाया गया. ऐसे में जीवन से हताश और निराश हो चुके इंसान को खुदकुशी से किसी प्रकार बचा लिए जाने पर उसे कानून के शिकंजे में फंसा देना उसके अवसाद में गुणात्मक इजाफा करता है.

पहल के पहलू

विश्व भर में करीब 800,000 लोग हर साल आत्महत्या करते हैं. इनमें 135,000 यानि 17 प्रतिशत भारत में हैं. सरकार पिछले एक दशक से इन मामलों में इजाफे को देखते हुए खुदकुशी के प्रयास को अपराध की श्रेणी से बाहर करने की पहल कर रही थी. इस पहल का सबसे सार्थक पहलू पहले ही जीवन के मोह से मुक्त हो चुके व्यक्ति में जीवन के प्रति सकारात्मकता का संचार करना है.

इस दिशा में कई अहम फैसले दे चुके दिल्ली हाईकोर्ट के पूर्व न्यायाधीश एसएन धींगरा का कहना है कि ब्रिटिश राज में यह प्रावधान आईपीसी में रखा गया था. उस समय कानून के भय से इस प्रवृत्ति से दूर रहने का संदेश देने की कोशिश की गई थी क्योंकि इस तरह का दुस्साहसिक कदम उठाने वालों की तादाद बहुत कम थी. लेकिन अब समय के साथ समाज और सोच में आए बदलाव को देखते हुए कानून में बदलाव की मांग जायज है.

मनोविद की राय

भोपाल मेडिकल कॉलेज में मनोचिकित्सक डॉ. मानसी तावरे की दलील है कि सामान्य मनोदशा वाले इंसान की सोच में जीवन संघर्ष का दूसरा नाम होता है. लेकिन खुदकुशी का ख्याल मन में घोर अशांति, तनाव या अवसाद के चरमोत्कर्ष पर ही आता है. इसे चिकित्सा शास्त्र में असामान्य मनोदशा के दायरे में रखा गया है.

चूंकि इस व्याधि का अब इलाज है और भारत में मनोचिकित्सकों की संख्या भी बढ़ रही है, इसलिए इसे बीमारी की श्रेणी में रखा गया है. समय के साथ आए इस बदलाव के मद्देनजर अब सरकार ने भी खुदकुशी के प्रयास को अपराध के बजाय चिकित्सा सुविधा के दायरे में लाने की पहल की है. यह पहल अवसादग्रस्त लोगों में जीवन की जीवंतता का संचार करने में मददगार साबित होगी.

कानूनी स्थिति

भारत में खुदकुशी की कोशिश इस समय अपराध की श्रेणी में है. भारतीय दंड संहिता की धारा 309 के तहत खुदकुशी के प्रयास को परिभाषित करते हुए ऐसा करने पर एक साल तक की सजा या जुर्माना या दोनों का प्रावधान है. जस्टिस धींगरा इसे विरोधाभाषी मानते हैं. उनकी दलील है कि कोई व्यक्ति पहले से ही कष्टप्रद हालात के कारण ऐसा कदम उठाता है. इसमें सफल होने पर वह जीवन से हाथ धो बैठता है और असफल होने पर सजा का भागीदार बनता है. यह सही मायने में पीड़ित और उसके परिवार के लिए दोहरा दंड है. जबकि संविधान एक ही व्यक्ति को दोहरा दंड देने से प्रतिबंधित करता है. इस प्रकार धारा 309 गैरसंवैधानिक भी है.

समाज विज्ञानी प्रो. आनंद कुमार का कहना है कि खुदकुशी सही मायने में समाज और सरकार के स्तर पर व्यवस्था की विफलता का परिचायक है. कोई भी इंसान यह कदम तभी उठाता है जब वह परिवार या समाज के दंश का शिकार होता है. ऐसे में समाज को अपनी जिम्मेदारी समझते हुए ऐसे संवेदनशील लोगों के संरक्षण का जिम्मा खुद उठाना चाहिए बजाय उसे मरने के लिए छोड देने के.

शंका का समाधान

मानसिक स्वास्थ्य सुविधा विधेयक में खुदकुशी के प्रयास को अपराध के बजाय बीमारी की श्रेणी में रखने के बाद आइपीसी की धारा 306 को लेकर संशय बन गया था. धारा 306 खुदकुशी के लिए उकसाने को अपराध घोषित करते हुए अधिकतम दस साल तक की सजा या जुर्माने का प्रावधान करती है. संशय धारा 309 के निष्प्रभावी होने के बाद धारा 306 के भविष्य का लेकर था. लेकिन इस विधेयक से स्पष्ट है कि धारा 306 का वजूद बरकरार रहेगा.

इसके पीछे साफ वजह किसानों की आत्महत्या और हॉरर किलिंग जैसे मामले हैं. वैसे भी सजा की दृष्टि से देखा जाए तो खुदकुशी के प्रयास की तुलना में खुदकुशी के लिए उकसाने को गंभीर अपराध माना गया है. इसलिए आज भी झूठी शान की खातिर महिलाओं या दलितों को मारकर पेड़ पर लटकाने जैसी वारदातों और किसानों की खुदकुशी का देखते हुए धारा 306 का वजूद में रहना अनिवार्य है. जिससे धारा 309 के हटने का दुरुपयोग न हो सके.

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