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दुनिया

छात्र बदल रहे हैं ‘कैंसर वाले’ गांव की तस्वीर

भारत में विकास के लाख दावों के बीच दिल्ली से महज चंद किलोमीटर की दूरी पर बसा एक गांव कैंसर की भयानक चपेट में है. कुछ छात्रों की पहल से गांव की तस्वीर बदल रही है.

दिल्ली से करीब 30 किलोमीटर की दूरी पर स्थित ग्रेटर नोएडा के सादोपुर गांव में अब तक कैंसर से 20-25 लोगों की मौत हो चुकी है. सिर्फ सादोपुर ही नहीं बगल के गांव दुजाना, बिश्नूली, खेड़ा धर्मपुरा, सदुल्लापुर, अच्छैजा में भी आलम यही है. गांव वालों का कहना है कि यहां कैंसर और हेपेटाइटिस सी के कई मरीज हैं और अनुमान है कि पिछले सात सालों में इन गांवों के सैकड़ों लोगों की मौत कैंसर से हो चुकी है. दिल्ली के श्रीराम कॉलेज ऑफ कॉमर्स के छात्रों ने अंतरराष्ट्रीय नॉन प्रॉफिट संगठन इनक्टस के तहत सादोपुर गांव में साफ पानी पहुंचाने का बीड़ा उठाया है. छात्रों ने साफ पानी मुहैया कराने के लिए मिट्टी से बना फिल्टर तैयार किया है. छात्रों के प्रोजेक्ट अस्बाह से ग्रामीणों की पहुंच अब स्वच्छ पानी तक बनी है.

सपना साफ पानी का

श्री राम कॉलेज ऑफ कॉमर्स की छात्रा और अस्बाह प्रोजेक्ट की निदेशक सांची श्रॉफ बताती हैं, "भारत में अभी भी करोड़ों लोग हैं जिन्हें साफ पानी नहीं मिल पा रहा है. इस प्रोजेक्ट के तहत हमने दो समस्याओं को हल करने की कोशिश की है. हम गांवों में जाकर वहां के पानी की जांच करते हैं और फिर देखते हैं कि हमारा मिट्टी का फिल्टर कितना कारगार है. एक बार पानी जांच में सुरक्षित पाया जाता है तो हम गांव में इस फिल्टर को बेचते हैं. दूसरा ये कि कुम्हारों को इसके जरिए रोजगार का अवसर बढ़ जाता है."

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छात्रों ने इस प्रोजेक्ट के लिए डेढ़ साल तक शोध किया और उसके बाद कुम्हारों को फिल्टर बनाने की ट्रेनिंग दी गई. इसी साल के जून महीने में छात्रों ने ग्रेटर नोएडा के सादोपुर गांव में मिट्टी के फिल्टर बेचना शुरू किया. सांची श्रॉफ के मुताबिक छात्रों ने सादोपुर गांव में एक महीने के भीतर 26 फिल्टर बेचे हैं जिससे करीब 11600 लीटर साफ पानी लोगों को मिल पाया है. इसे चलाने के लिए बिजली नहीं लगती है.

इस फिल्टर की खास बात यह है कि इसमें लगा कैंडल वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद (सीएसआईआर)  ने मुहैया कराया है. इस परिषद के अध्यक्ष प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी है और परिषद के 75 साल पूरे होने पर इस प्रोजेक्ट के बारे में

प्रधानमंत्री मोदी के सामने भी छात्रों ने प्रेजेंटेशन दिया. सांची का दावा है कि प्रधानमंत्री भी इस प्रोजेक्ट के बारे में जानकारी रखते हैं.

सादोपुर गांव में इस फिल्टर को डीलर के जरिए बेचा जाता है. सांची के मुताबिक एक फिल्टर की कीमत 550 रुपये है, जिसमें फिल्टर बनाने वाले कुम्हार को 120 रुपये मिलते हैं और डीलर को 75 रुपये मिलते हैं. खास बात ये है कि प्रोजेक्ट अस्बाह के तहत श्री राम कॉलेज ऑफ कॉमर्स इनक्टस मुनाफा नहीं रखता है. यह ऐसा संगठन है जिसके 39 देशों में 70 हजार से अधिक छात्र सदस्य हैं.

क्या है गांव की हकीकत

ग्रेटर नोएडा के दुजाना गांव के ही पर्यावरण वैज्ञानिक डॉ. जितेंद्र नागर दुजाना के मुताबिक 2011 में ग्रेटर नोएडा के इन गांवों में कैंसर के मामले सामने आने लगे. डॉ. दुजाना कहते हैं, "इन 6 गांवों में कैंसर किस कारण से हो रहा है इसका अभी तक प्रमाण नहीं मिल पाया है. लेकिन हमारा मानना है कि इन गांवों का वॉटर लेवल गड़बड़ाया गया है जिस कारण पानी दूषित या कहें जहर बन गया है." यही नहीं ये सभी गांव छपरौला औद्योगिक क्षेत्र से घिरे हुए हैं और यहां वायु प्रदूषण भी एक बड़ी समस्या है. जल और वायु की वजह से यहां वातावरण गंभीर बीमारियों का अड्डा बनता जा रहा है. दुजाना कहते हैं, "कैंसर के मामले सामने आने के बाद हम लोगों ने 6 गांवों का सर्वे कराया और मामला एनजीटी में दायर कराया. लेकिन गांव में हालात अभी भी खतरनाक है."

ये हैं बूंद बूंद को तरसते

गांव के ही प्रदीप सिंह बताते हैं कि यहां के पानी में पीलापन है और टीडीएस की मात्रा कहीं अधिक है. वह कहते हैं, "हमारे गांव के पानी, जमीन और हवा में अजीब सी घुटन है. हम यहां इसी तरह से जीने को मजबूर हैं. जो पानी खरीद सकते हैं वे तो खरीद लेते हैं लेकिन गरीब परिवार बोरिंग का बिना फिल्टर वाला पानी पीने को मजबूर हैं."

छात्रों की छोटी सी पहल ने कुछ गरीब परिवारों में उम्मीद बांधी है. वे अब कम कीमत पर फिल्टर खरीदकर पानी पी रहे हैं. सादोपुर गांव के अलावा छात्रों ने दिल्ली के जौन्टी गांव में भी इस प्रोजेक्ट को शुरू किया है. यहां पानी की जांच की जा रही है. इसके अलावा छात्र बलियाना गांव में भी इस सस्ते फिल्टर को लॉन्च करने की योजना बना रहे हैं.

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