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दुनिया

इरोम की हड़ताल खत्म, विजय का धरना जारी

उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर में मास्टर विजय सिंह 21 साल से धरने पर बैठे हैं. सबसे लंबा धरना जिसे हर रिकॉर्ड बुक में जगह मिल चुकी है.

इरोम शर्मिला ने पूर्वोत्तर राज्यों में लागू सशस्त्र बल विशेष शक्तियां कानून 1958 (आफप्सा) को खत्म करने की मांग को लेकर 16 साल पहले उन्होंने अनशन शुरु किया था. वह कानून खत्म नहीं हुआ, इरोम का अनशन खत्म हो गया. इसी तरह मुजफ्फरनगर में 21 वर्षों से मास्टर विजय सिंह अनवरत धरने पर बैठे हुए हैं, उनकी भी मांग पूरी नहीं हो पा रही है.

मुजफ्फरनगर में करीब 4575 बीघा जमीन पर भूमाफिया के कब्जे के खिलाफ मास्टर विजय सिंह ने 26 फरवरी 1996 को जिलाधिकारी के कार्यालय के सामने जो धरना शुरु किया था, वह आज भी जारी है. इन 21 वर्षों में उन्हें लगभग हर राजनीतिक दल और सरकार ने सीबीआई से लेकर तरह तरह की जांच का आश्वासन दिया लेकिन कोई जांच शुरू नहीं हुई. इस दौरान कौशल राज शर्मा और निखिल कुमार, मुजफ्फरनगर में दो ऐसे डीएम आए जिन्होंने विजय सिंह के आरोपों के आधार पर जांच कराई तो 3200 बीघा भूमि पर घोटाला साबित हुआ. इसमें से करीब 300 बीघा भूमि माफिया से मुक्त भी कराई गई, इससे जुड़े राजस्व अभिलेखों में हेरा फेरी के 136 मुकदमे दर्ज हुए तथा दंड स्वरूप 81 हजार रुपये सरकारी खजाने में जमा किए गए.

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मास्टर विजय सिंह का यह 21 साल पुराना धरना देश व दुनिया का एक व्यक्ति का सबसे लम्बा धरना घोषित हो चुका है. लिम्का बुक आफ वर्ल्ड रिकॉर्डस, इंडिया बुक आफ रिकॉर्डस, एशिया बुक आफ रिकॉर्डस, मीरा सेल्स आफ द वर्ल्ड रिकॉर्डस और यूनिक रिकॉर्ड आफ द वर्ल्ड ने मास्टर विजय सिंह के धरने को देश के सबसे लम्बे धरने के रूप में दर्ज कर रखा है. लेकिन उनकी मांगों पर सरकारें चुप हैं. इरोम शर्मिला हों या मास्टर विजय सिंह, इस तरह के धरने और अनशन क्या अब अप्रासांगिक हो चुके हैं?

देखिए, विरोध ने इन्हें स्टार बना दिया

लखनऊ यूनिवर्सिटी मं सोशल साइंस विभाग के अध्यक्ष प्रोफेसर राजेश मिश्र इससे इनकार करते हैं. उनके अनुसार भारत के लोगों के खून में रचा बसा है आंदोलन. स्वतंत्रता आंदोलन से पहले और उसके बाद भी, यहां हमेशा आंदोलन चलते रहते हैं. आर्य समाज, ब्रम्ह समाज से लेकर केरल का मापिला आंदोलन, बंगाल का तेभागा आंदोलन, खिलाफत आंदोलन, तेलंगाना, नक्सलबाड़ी, भूदान, भाषाई आंदोलन, हिंदी का विरोध, गो रक्षा आंदोलन, राम जन्म भूमि आंदोलन, जेपी मूवमेंट और दलित पैंथर से लेकर हाल में अन्ना हजारे, कन्हैया कुमार, जिग्नेश कुमार और हार्दिक पटेल तक. प्रोफेसर राजेश मिश्र के अनुसार कश्मीर और उना में भी आंदोलन चल रहे हैं. लेकिन एक बात इसमें अहम है, वह है लोकतांत्रिक स्पेस की, वह नहीं बढ़ रहा है. इसको वह इंग्लिश में इस तरह बताते हैं 'इट्स नॉट डीपनिंग', तो सारी समस्या यही है. सफलता या असफलता इतनी अहम नहीं है जितनी लोकतांत्रिक स्पेस के बढ़ने की है. इसीलिए आंदोलनों का जो आउटपुट सामने आना चाहिए, वह नहीं आ पाता है.

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प्रोफेसर मिश्र के अनुसार दलित आंदोलन और राम जन्म भूमि आंदोलन की अगर बात की जाए तो जो उसका जो राजनीतिक आउटपुट सामने आना चाहिए था क्या वही मिला. इसका मतलब साफ है कि आंदोलनों की राह गलत नहीं है, वह स्वतःस्फूर्त होते हैं, होते रहेंगे लेकिन लोकतांत्रिक स्पेस न बढ़ने की वजह से उनका प्रतिफल जो मिलना चाहिए वह नहीं मिल पाता है. हालांकि चेतना के स्तर पर उनकी प्रासंगिकता पर उंगली नहीं उठाई जा सकती. इसलिए इरोम शर्मिला हों या मास्टर विजय सिंह, इनकी मांगें पूरी होने न होने पर अफसोस नहीं किया जा सकता.

इरोम शर्मिला के अनशन खत्म होने पर मास्टर विजय सिंह से डीडब्ल्यू ने फोन पर बात की तो उन्होंने कहा कि इरोम का शरीर जर्जर हुआ जा रहा था इसलिए उन्होंने अनशन खत्म कर सही किया. अपने धरने के बारे में बोले कि जब तक भूमाफिया से भूमि वापस नहीं कराई जाती उनका धरना जारी रहेगा. बोले कि केवल मुजफ्फरनगर और शामली जिलों में ही लगभग सात लाख बीघा सरकारी भूमि अवैध कब्जे में है. इसे खाली कराकर भूमिहीन किसानों को बांट दी जाए तो गरीबी पर अंकुश लग सकता है. सरकारी भूमि पर से अवैध कब्जे अगर हटा लिए जाएं तो सरकार को भूमि अधिग्रहण से भी मुक्ति मिल सकती है.

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