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दुनिया

विकलांग से दिव्यांग हो गए, पर बदला कुछ नहीं

विकलांगों को अब दिव्यांग कहा जाने लगा है, लेकिन इस सम्मानजनक संबोधन से उनकी समस्याओं में कोई कमी नहीं आयी है. अधिकतर सार्वजनिक जगहों पर उनके लिए जरूरी सुविधाओं का अभाव है.

भारत में ढाई करोड़ से कुछ अधिक लोग विकलांगता से जूझ रहे हैं. इतनी बड़ी संख्या होने के बावजूद इनकी परेशानियों को समझने और उन्हें जरूरी सहयोग देने में सरकार और समाज दोनों नाकाम दिखाई देते हैं. देश में हुए एक सर्वे से सामने आया है कि अधिकांश सार्वजनिक स्थलों पर सुविधाओं के लिहाज से विकलांगों का जीवन किसी चुनौती से कम नहीं है.

सुविधाओं का अभाव

विकलांगता की समस्या से दो चार हो रहे लोगों के लिए जो न्यूनतम आवश्यक सुविधाएं सार्वजानिक जगहों पर होनी चाहिए, उसका अभाव लगभग सभी शहरों में है. अस्पताल, शिक्षा संस्थान, पुलिस स्टेशन जैसी जगहों पर भी उनके लिए टॉयलेट या व्हील चेयर नहीं हैं. गैर सरकारी संस्था ‘स्वयं फाउंडेशन' ने देश के आठ शहरों में किये अपने सर्वे में पाया कि सार्वजानिक जगहों पर जो सुविधाएं विकलांगों के लिए होनी चाहिए, वे नहीं हैं.

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‘एक्सेसिबल इंडिया कैंपेन' यानी ‘सुगम्य भारत अभियान' के तहत किए गये इस सर्वे में मुंबई के 51 सार्वजानिक स्थानों की पड़ताल की गयी. लगभग अस्सी फीसदी स्थानों पर रैम्प नहीं पाया गया. इस सर्वे में शामिल किसी भी बिल्डिंग में विकलांगों के लिए अलग से पार्किंग की व्यवस्था नहीं थी. जबकि अधिकतर बिल्डिंग में निर्धारित मानकों के अनुसार विकलांगों के लिए शौचालय तक नहीं पाया गया. मुंबई के आलावा चंडीगढ़, दिल्ली, फरीदाबाद, देहरादून, गुरुग्राम, जयपुर और वाराणसी में भी इस तरह के सर्वे किये गये. स्वयं फाउंडेशन' के सानू नायर के अनुसार इन सभी शहरों में स्थिति लगभग एक जैसी ही है.

सरकारी प्रयास

एक्सेसिबल इंडिया कैंपेन के जरिये सरकार विकलांगों के लिए सक्षम और बाधारहित वातावरण तैयार करने पर जोर दे रही है. इस अभियान के तहत जुलाई 2018 तक राष्ट्रीय राजधानी और राज्य की राजधानियों की कम से कम 50 सरकारी इमारतों को दिव्यांगों के लिए ‘पूरी तरह उपयोग' लायक बनाया जाएगा. परिवहन प्रणाली में सुगम्यता और ज्ञान तथा आईसीटी पारिस्थितिकी तंत्र में विकलांगों की पहुंच को लक्ष्य बनाया गया है.

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दिव्यांगजन सशक्तिकरण विभाग के अनुसार भवनों को पूरी तरह सुगम्य बनाने के लिए 31 शहरों के 1098 भवनों में से 1092 भवनों की जांच का कार्य पहले ही पूरा हो चुका है. विकलांगों के लिए विशेष व सुगम शौचालय का डिजाइन बना कर राज्यों को भेजा जा रहा है. इसके तहत पानी की उपलब्धता, दरवाजे, कमोड की उंचाई, पकड़ने के लिए दोनों तरफ रॉड, स्वच्छ टोंटी तथा नल, लीवर हैंडल नल सहित वाश बेसिन व हवादार तथा प्रकाश जैसे मानक बनाये गये हैं. इसी के आधार पर पूरे देश भर में शौचालय बनाये जायेंगे.

सोच बदलनी होगी

आधुनिक होने का दावा करने वाला समाज अब तक विकलांगों के प्रति अपनी बुनियादी सोच में कोई खास परिवर्तन नहीं ला पाया है. अधिकतर लोगों के मन में विकलांगों के प्रति तिरस्कार या दया भाव ही रहता है, यह दोनों भाव विकलांगों के स्वाभिमान पर चोट करते हैं. शारीरिक रूप से असक्षम के लिए काम करने वाले किशोर गोहिल कहते हैं, "दिव्यांग कह भर देने से इनके जीवन में कोई बदलाव नहीं आएगा. यह केवल छलावा है." उनका कहना है, "हमें इंसान ही समझ लो वही काफी है. असक्षमता के चलते जो असुविधा है, उसके लिए इंतजाम होने चाहिए."

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केन्द्रीय मंत्री एम वेंकैया नायडू का कहना है कि दिव्यांग लोगों के प्रति अपनी सोच और मानसिकता को बदलने का समय आ गया है. विकलांगों को समाज की मुख्यधारा में तभी शामिल किया जा सकता है जब समाज इन्हें अपना हिस्सा समझे, इसके लिए एक व्यापक जागरूकता अभियान की जरूरत है.

आत्मनिर्भर बनाने पर हो जोर

हाल के वर्षों में विकलांगों के प्रति सरकार की कोशिशों में तेजी आयी है. विकलांगों को कुछ न्यूनतम सुविधाएं देने के लिए प्रयास हो रहे हैं या कम से कम प्रयास होते हुए दिख रहे हैं. वैसे, योजनाओं के क्रियान्वयन को लेकर सरकार पर सवाल उठते रहे हैं. पिछले दिनों क्रियान्वयन की सुस्त चाल को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को फटकार लगायी है. सकारात्मक परिणाम के लिए दीर्घकालीन उपायों पर जोर देते हुए सानू नायर कहते हैं कि विकलांग व्यक्तियों को शिक्षा, रोजगार और व्यवसाय के लिए विशेष प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए तभी वह बेहतर गुणवत्तापूर्ण जीवन व्यतीत कर सकते हैं.

विकलांगों को शिक्षा से जोड़ना बहुत जरूरी है. इस वर्ग के लिए, खासतौर पर, मूक-बधिरों के लिए विशेष स्कूलों का अभाव है जिसकी वजह से अधिकांश विकलांग ठीक से पढ़-लिखकर आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर नहीं बन पाते. किशोर गोहिल का मानना है कि विकलांगों को अवसर प्रदान करना या उन पर निवेश करना घाटे का सौदा नहीं है बल्कि इससे देश की अर्थव्यवस्था भी मजबूत होगी.

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