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दुनिया

600 बच्चों की मौत पर कोर्ट और लोग सरकार से नाराज

महाराष्ट्र में कुपोषण की वजह से बच्चों की मौत एक बार फिर चर्चा में है. सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार की संवेदनशीलता पर सवाल उठाते हुए कड़ी फटकार लगाई है.

भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में से एक है लेकिन यहां कुपोषित बच्चों की तादाद अर्थव्यवस्था और सामाजिक ताने बाने के लिए किसी खतरे की घंटी से कम नहीं है. यूनिसेफ की रिपोर्ट के अनुसार देश के साढ़े पांच करोड़ बच्चे यानी पांच साल से कम उम्र के लगभग आधे बच्चे कुपोषित हैं. महाराष्ट्र में कुपोषण से हुई 600 आदिवासी बच्चों की मौत की खबर पर मानवाधिकार आयोग से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक ने चिंता जतायी है.

आदिवासी बच्चों में कुपोषण

महाराष्ट्र के जनजातीय बहुल क्षेत्रों में कुपोषण की समस्या काफी गंभीर है, खासतौर पर मुंबई से सटे पालघर जिले में कुपोषण के चलते, हर साल बहुत से बच्चे मौत के नींद सो जाते हैं. यहां से लगातार आ रही बच्चों की मौत की खबर पर मानवाधिकार आयोग और सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लेते हुए सरकार को फटकार लगाई है.

पिछले कुछ महीनों में ही जिले के 254 बच्चे कुपोषण के शिकार बने और इसी दौरान कुपोषण 195 गर्भस्थ शिशुओं की मौत का कारण बना. ये आंकड़े सरकार ने ही जारी किए हैं जबकि स्वयंसेवी संगठनों का दावा है कि सिर्फ मोखाड़ा तालुका में कुपोषण से 600 से ज्यादा बच्चों की जान गई है. मुख्यमंत्री देवेन्द्र फडणवीस मानते हैं कि पालघर जिले में जव्हार और मोखाड़ा कुपोषण से बुरी तरह प्रभावित है. यहां 30 प्रतिशत बच्चे कुपोषण के शिकार हैं.

राज्य के कई जिलों में कुपोषण ने अपना पांव फैलाया हुआ है. ज्यादातर आदिवासी जिले इसकी चपेट में हैं. अमरावती जिले के अंतर्गत आने वाली चिखलदरा तथा धारणी तहसील कुपोषण से ज्यादा प्रभावित रही हैं. इसके अलावा राज्य के नंदूरबार, यवतमाल, परभणी, जालना और बुलढाना जिलों में कुपोषित बच्चों की तादाद परेशान करने वाली है.

क्यों बढ़ रही है संख्या?

सामाजिक कार्यकर्ताओं और विपक्षी नेताओं का आरोप है कि बच्चों में कुपोषण के खिलाफ लड़ाई कमजोर हुई है. पालघर क्षेत्र में कुपोषित बच्चों की मौत के मामले को लगातार उठाने वाले पूर्व विधायक विवेक पंडित ने राज्य सरकार पर ग्रामीण बाल विकास कार्यक्रम को रोकने का आरोप लगाया. उनका कहना है कि इस कार्यक्रम के बंद होने से स्थिति और खराब हुई है. क्षेत्र में सक्रिय सामाजिक कार्यकर्ताओं के अनुसार भले ही पालघर देश की आर्थिक राजधानी मुंबई के करीब है लेकिन विकास का कोई चिन्ह यहां नहीं दिखता. बेरोजगारी, गरीबी से त्रस्त आदिवासी समुदाय बहुत हद तक सरकार के समाज कल्याण योजनाओँ पर ही निर्भर हैं. जिले के अधिकतर हिस्से में स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति ठीक नहीं है. ग्रामीण आदिवासियों की पहुंच से यह सुविधाएं दूर हैं.

केन्द्रीय महिला एवं बाल कल्याण मंत्री मेनका गांधी ने समाचार एजेंसी रॉयटर्स को दिए गए एक इंटरव्यू में कहा था कि सामाजिक क्षेत्र के बजट में कटौती के सरकार के फैसले से बुरा असर कुपोषण के खिलाफ लड़ाई पर पड़ा है. हालांकि बाद में उनके मंत्रालय ने इस रिपोर्ट का खंडन किया था. वैसे, जमीनी स्तर पर काम कर रहे लोगों को समाज कल्याण योजनाओं में बजट की कमी महसूस होती है.

लोगों में नाराजगी

बच्चों की मौत के चलते यहां लोगों में जबर्दस्त गुस्सा है. राज्य के जनजातीय कल्याण मंत्री विष्णु सावरा के पालघर जिले के ही हैं और वे इस जिले के अभिभावक मंत्री भी हैं. बच्चों की मौत पर सरकार की इस उदासीनता को लेकर आदिवासियों का गुस्सा अपने अभिभावक मंत्री विष्णु सावरा पर तो फूटा ही, साथ ही पिछले दिनों इलाके का दौरा करने वाली महिला और बाल विकास मंत्री पंकजा मुंडे को भी लोगों के गुस्से का शिकार होना पड़ा. लोगों की नाराजगी देखते हुए प्रशासन को यहां धारा 144 लगाना पड़ी थी.

टास्क फोर्स का गठन

प्रभावित लोगों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, मानवाधिकार आयोग और अब सुप्रीम कोर्ट की आलोचना झेलने वाली महाराष्ट्र सरकार ने अब एक टास्क फोर्स गठित करने का फैसला लिया है. मुख्यमंत्री देवेन्द्र फडणवीस ने इस टास्क फोर्स के गठन का ऐलान करते हुए कहा कि इसमें स्वास्थ्य, महिला एवं बाल विकास और चिकत्सा विभाग के मंत्री शामिल होंगे. उनके अनुसार, "इन मंत्रालयों के बीच बेहतर तालमेल से कुपोषण पर काबू पाया जा सकता है." पालघर में 6 साल से कम उम्र के बच्चों के स्वास्थ्य की जांच की जा रही है. कुपोषण से निपटने के लिए ग्रामीण बाल विकास केंद्र पौष्टिक पुनर्वास केंद्र जैसी योजनाओं का सहारा लिया जा रहा है. इसके अलावा सरकार राज्य के विभिन्न आश्रमों, शालाओं और आदिवासी हॉस्टलों में भोजन की गुणवत्ता को सुनिश्चित करने के लिए एक स्कीम शुरू करने जा रही है.

उपाय

अकेले टास्क फोर्स या कार्यक्रमों को शुरू भर कर देने से कुपोषण की समस्या से छुटकारा नहीं पाया जा सकता. कार्यक्रम के क्रियान्वयन पर ज्यादा जोर देना होगा. कुपोषण के खिलाफ लड़ाई में जागरूकता अभियान के महत्व को नहीं नाकारा जा सकता. जानकार मानते हैं कि इसे रोकने के लिए जो आवश्यक जानकारी प्रभावित लोगों के बीच पहुंचनी चाहिए थी, उस पर ध्यान नहीं दिए जाने के चलते भी कुपोषण की स्थिति विकराल रूप धारण करती जा रही है. आदिवासी क्षेत्रों में आर्थिक विकास के साथ साथ सामाजिक परिवर्तन किए जाने की भी जरूरत है.

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