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दुनिया

बचा हुआ खाना बेचने वाली जर्मनी की पहली सुपरमार्केट

यहां ऐसे खाने को बेचा जाता है जिसे लोग खराब समझकर या तो फेंक देते हैं या इस्तेमाल नहीं करते. यह भोजन की बर्बादी को रोकने की दिशा में उठाया गया एक छोटा कदम है लेकिन सामाजिक जागरूकता की दिशा में बढ़ाया गया बड़ा कदम.

खाने के शौकीनों से लेकर इसके बचाने वालों तक के लिए जर्मनी के कोलोन में हाल में खोला गया "द गुड फूड” एक आकर्षक केंद्र साबित हो सकता है. 4 फरवरी को खोली गई इस दुकान में सब्जियों से लेकर शराब तक सब उपलब्ध है. फर्क बस इतना है कि यह सब वैसा सामान है जिसे कभी लोगों ने कूड़ा या बेकार समझकर फेंक दिया था. जर्मनी में खोली गई यह पहली ऐसी दुकान है और यूरोपीय संघ में तीसरी.

इसकी एक और खास बात है कि "द गुड फूड” में किसी भी चीज के दाम तय नहीं हैं. ग्राहक अपने मन- मुताबिक किसी भी सामान का कोई भी दाम दे सकता है. दरअसल दुकान खोलने वाली निकोल कलास्की का उद्देश्य इससे लाभ कमाना नहीं बल्कि भोजन बचाना है.

संयुक्त राष्ट्र खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) के आंकड़ों के मुताबिक हर साल विश्व में पैदा किया गया एक तिहाई भोजन बेकार चला जाता है लेकिन बेकार हो जाने वाले भोजन का चौथाई हिस्सा भी बचा लिया जाए तो दुनिया के करीब 90 करोड़ भूखे लोगों का पेट भर सकेगा.

"टेस्ट द वेस्ट” डॉक्युमेंट्री फिल्म के निर्देशक वेल्नटीन थर्न इस कदम को एक सकारात्मक कदम मानते हैं लेकिन थर्न के मुताबिक अब भी इस दिशा में बहुत चुनौतियां हैं.

थर्न ने कहा, "यह आइडिया बहुत शानदार है लेकिन मुझे अब भी समझ नहीं आता कि हम इतना भोजन क्यों बर्बाद करते हैं.” थर्न के मुताबिक कारोबार में ग्राहक वही खरीदना पसंद करता है जो बेहतर नजर आता है. एफएओ के मुताबिक भी फुटकर में भोजन की बर्बादी इसलिए अधिक होती है क्योंकि वह अकसर अच्छा नजर नहीं आता. 

कलास्की ने डीडब्लयू से बातचीत में कहा कि यह वक्त इस ट्रेंड को बदलने का है. इनकी दुकान में ऑर्गैनिक फूड सभी की पहुंच में है और इसके लिए भी ग्राहकों को अपनी इच्छानुसार भुगतान करना होता है.

हालांकि दुकान देखने पहुंचे कुछ लोग इस खाने की गुणवत्ता पर भी सवाल उठाते हैं. इनमें से कइयों ने कहा कि वे इस दुकान से सामान इसलिए नहीं लेंगे क्योंकि इनमें से कुछ की तारीख निकल चुकी है. लेकिन कलास्की इससे परेशान नहीं हैं. उन्होंने कहा कि किसी सामान पर लिखी तारीख ग्राहकों को दिया गया बस एक सुझाव होता है.

कलास्की ने साफ किया कि अगर कोई बीमार हो भी जाता है तो किसी न किसी को तो जिम्मेदारी लेनी होगी इसलिए हमारी टीम उपभोक्ताओं को ऐसे सामानों की जानकारी बहुत सावधानी से देती है. लेकिन इसके बाद भी कुछ होता है तो हम इसके लिए भी तैयार हैं.

सुपरमार्केट के उद्देश्यों के उलट द गुड फूड का मकसद सामाजिक प्रभाव डालना है. इसे शुरू करने वाली टीम का मानना है कि इस पहल से लोगों को भोजन बचाने को लेकर प्रोत्साहित किया जा सकता है.

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