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दुनिया

बागों का शहर कैसे बन गया कूड़े का शहर

कूड़ा बेंगलूरु की बड़ी समस्या बन गया है. इस वजह से लोग परेशान हैं और नाराज भी. बागों के शहर को वे कूड़े का शहर कहने लगे हैं.

बेंगलूरू में अगर आपका ध्यान बार-बार कूड़े के ढेर पर जाए तो इसमें कोई बड़ी बात नहीं है. इतने ढेर हैं कि ध्यान बरबस चला जाता है. और ये ढेर देखकर अगर आप इस बात पर हैरान हों कि इस शहर को भारत में रहने के लिए सबसे अच्छा शहर कैसे कहा जा सकता है, तो ऐसा सोचने वाले आप अकेले नहीं होंगे. शहर के बहुत से लोग ऐसा सोचने लगे हैं.

आईटी हब के रूप में पश्चिमी देशों में मशहूर इस शहर को अब सफलता की कीमत चुकानी पड़ रही है. यह एक ऐसा शहर बन चुका है जो अपने कूड़े को संभाल नहीं पा रहा है. कर्नाटक की राजधानी बेंगलूरु में झीलों, बागों और पार्कों का बड़ा जाल है. लेकिन जब से शहर ने खुद को भारत की सिलीकन वैली के रूप में प्रचारित करना शुरू किया, दुनियाभर के लोग यहां आने लगे.

लिहाजा आबादी तेजी से बढ़ी. 1990 के दशक में बेंगलूरु की आबादी 30 लाख हुआ करती थी. अब यह 80 लाख को पार कर चुकी है. बढ़ती आबादी का असर शहर के संसाधनों पर भी पड़ा है. और खराब अर्बन प्लानिंग के लिए आलोचनाएं झेलने वाला शहर का प्रशासन इस बढ़ती आबादी का दबाव संभाल नहीं पा रहा है. नाकामी कूड़े के प्रबंधन के रूप में नजर आती है.

तस्वीरों में, स्वच्छता की सीख देता जर्मनी

टेक फर्म ऑरैकल के लिए काम करने वाले कामेश रस्तोगी ने शहर के हरे-भरे सबर्ब एचएसआर लेआउट में 10 साल पहले फ्लैट खरीदा था. तब उन्हें लग रहा था कि वह बेंगलूरू के सबसे अच्छे इलाके में रहने वाले हैं. लेकिन अब वह कहते हैं, "बदबू इतनी है कि आपको सपने से जगा देगी. बदबू इतनी है कि आपको दरवाजे बंद करने पड़ेंगे. पर राहत तब भी नहीं मिलेगी." दरअसल 2013 में उनके घर के पास ही एक वेस्ट ट्रीटमेंट प्लांट शुरू हुआ. शहर में 3500 टन कचरा रोज पैदा होता है जिससे निपटने के लिए यह प्लांट शुरू किया गया था. जब प्लांट बन रहा था तब यह शहर से कुछ दूर था. लेकिन बेतरतीबी विस्तार ने बहुत जल्दी शहर को प्लांट की दहलीज पर पहुंचा दिया और अब यह एक मुसीबत बन गया है क्योंकि इससे दुर्गंध ही नहीं प्रदूषण भी हो रहा है.

प्लांट का प्रबंधन कहता है कि चिमनी में एयरफिल्टर लगाया जा रहा है लेकिन स्थानीय नागरिक इस वादे पर ज्यादा भरोसा नहीं करते. एक शहरी के मुताबिक, ये बदलाव देखने के लिए तो मुझे दूसरा जन्म ही लेना होगा.

शहर के लोगों में गुस्सा बढ़ रहा है. अखबारों में रोज इस बारे में खबरें छपती हैं और अक्सर गार्डन सिटी को गारबेज सिटी लिखा या बोला जाने लगा है. सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट राउंड टेबल नाम की संस्था चलाने वालीं मरियम शंकर कहती हैं, "बेंगलूरू भारत का सबसे सुंदर शहर होता था. अब इसका हाल देखिए." शंकर इतालवी मूल की जर्मन हैं जो 2004 में भारत आई थीं. यहीं उन्होंने शादी की और अब इस शहर को वह अपना घर मानती हैं. वह अपने साथियों संग लोगों को कूड़े के बारे में जागरूक करने की कोशिश कर रही हैं. वह कहती हैं कि गेट-बंद सोसायटी में तो हालात बेहतर हुए हैं लेकिन गली-मोहल्लों का कोई माई-बाप नहीं है.

वीके/एके (एएफपी)

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