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दुनिया

कांग्रेस के लिए अपना ब्रैंड खराब नहीं करेंगे पीके!

प्रशांत किशोर यूपी और पंजाब में कांग्रेस के लिए जो करने की कोशिश कर रहे हैं, वह सीनियर नेताओं को रास नहीं आ रहा. इस वजह से पीके अपना रास्ता अलग कर सकते हैं.

नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने तो प्रशांत किशोर यानी पीके के गुण गाये गए कि उनकी रणनीतियों से मोदी पीएम की कुर्सी तक पहुंच गए. फिर बिहार चुनाव में वही प्रशांत मोदी के खिलाफ नीतीश कुमार के लिए काम कर रहे थे. बिहार में लालू और नीतीश को एक मंच पर लाकर मोदी को मात दिला देने से पीके भारतीय राजनीति में किसी को हराने और जिताने के विशेषज्ञ मान लिए गए. उसके बाद उन्हें जो शोहरत मिली तो कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी उन्हें यूपी के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस की बची खुची साख को बचाने के लिए अनुबंधित कर लाए.

पीके के आगमन के बाद गुलाम नबी आजाद को यूपी कांग्रेस का प्रभारी बनाया गया और प्रदेश अध्यक्ष राज बब्बर बने. यूपी में कांग्रेस को नया जामा पहनाने का तो श्रेय प्रशांत किशोर को मिला लेकिन वाराणसी रोड शो में सोनिया गांधी के बीमार हो जाने पर उनकी रणनीति की आलोचना भी हुई. देवरिया से दिल्ली तक राहुल गांधी की किसान यात्रा में खाट सभाओं के लिए प्रतिदिन 10 रुपये के किराए पर 5000 खाटें बुक कराई गई थीं. देवरिया में 1700, मिर्जापुर में 1500 तथा सोनभद्र में 1600 से अधिक खाटें या तो टूट गईं या लूट ली गईं जबकि वेंडर्स से अनुबंध था कि एक सभा से दूसरी सभा तक इन खाटों को ट्रकों के जरिए ले जाया जाएगा. इसका नतीजा यह हुआ कि प्रति खाट 1000 रुपये हर्जाना वेंडर को कांग्रेस ने अदा किया. यानी जितनी कीमत नहीं थी उतना हर्जाना. इसके लिए भी प्रशांत की आलोचना हुई.

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बुनियादी तौर पर प्रशांत किशोर रणनीतिकार हैं, इवेंट मैनेजर नहीं जैसा कि आम तौर पर समझा जाने लगा है. अमेरिका में रिपब्लिकन उम्मीदवार डॉनल्ड ट्रंप के चुनाव प्रचार और प्रबंधन में हिस्सा लेकर दिल्ली लौटे प्रशांत के एक जूनियर सहयोगी ने यह बताया और कहा कि भारत में भी रणनीतिकारों की कद्र और कीमत का अंदाजा सभी को होने लगा है. उधर यूपी, पंजाब के सीनियर कांग्रेसी नेता प्रशांत के विरोध में बोलने लगे हैं. जिस दिन सपा प्रमुख मुलायम सिंह से प्रशांत किशोर ने दिल्ली में मुलाकात की उसके अगले दिन ही यूपी कांग्रेस प्रभारी गुलाम नबी आजाद का बयान लखनऊ के अखबारों में छपा कि प्रशांत कोई फैसला नहीं ले सकते. पंजाब से कैप्टन अमरिंदर सिंह के प्रशांत किशोर से रिश्ते अच्छे नहीं होने की चर्चा है. खबरें आने लगी हैं कि यूपी और पंजाब में कांग्रेस और पीके के रास्ते अलग हो सकते हैं.

लेकिन पीके ने कांग्रेस के कार्यकर्ताओं की बड़ी फौज जरूर तैयार कर दी है. कैसे किया उन्होंने, इस पर वह मुस्कुरा देते हैं. उनके सामने बैठे एक भावी प्रत्याशी गोविंद सिंह बताते हैं कि जब उन्होंने लखनऊ पूर्वी विधान सभा क्षेत्र से चुनाव लड़ने का मन बनाया तो उनके पास अपनी जाति के कुछ लोगों के अलावा कोई कार्यकर्ता नहीं था. पीके ने सबसे पहले उनसे उनके क्षेत्र के 18 प्रभावशाली लोगों के मोबाइल फोन नबंर मांगे. उन 18 लोगों से गोविंद सिंह के बारे में फीडबैक लेने के बाद टीम पीके ने 180 लोगों के नाम मांगे और फिर 360. करीब दो महीने में टीम पीके ने इन फोन नंबरों के सहारे सर्वे कर लिया और कांग्रेस की फजा तैयार कर दी. गोविंद सिंह आश्चर्य से कहते हैं कि पीके की रणनीति के वह कायल हो गए हैं.

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गोविंद सिंह के अनुसार उनके चुनाव क्षेत्र में इस समय करीब 70-80 कर्मठ कार्यकर्ता तैयार हो चुके हैं. इसी तरीके से यूपी के 75 जिलों की कुल 403 विधानसभा सीटों के लिए करीब 2000 प्रत्याशी और इसके दस गुना कार्यकर्ता तैयार हो गए हैं. 2012 के विधानसभा चुनावों में मात्र 29 सीटों पर सिमटी कांग्रेस के लिए पीके धीमे से सिर्फ इतना कहते हैं कि देखिए मैं नेता नहीं हूं, जो काम दिया गया कर रहा हूं.

नए कार्यकर्ताओं की यही फौज कांग्रेस के साथ सपा या किसी भी पार्टी के गठबंधन का विरोध कर रही है. कांग्रेस के एक पुराने नेता के अनुसार राहुल ने पांच-सात साल पहले इसी तरह यूपी में युवा और नई कांग्रेस खड़ी करने की कोशिश की थी, तब सीनियर कांग्रेसियों ने ही उनके उस प्रयास को सफल नहीं होने दिया था लेकिन पीके ने यह काम बेहद प्रोफेशनल तरीके से किया. सीनियर कांग्रेसी यही नहीं होने देना चाहते हैं. इसलिए पीके के रास्ते से हटने की अफवाहें तैर रही हैं और पीके गठबंधन के सहारे अपनी ब्रैंडिंग भी खराब नहीं होने देना चाहते हैं.

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