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दुनिया

देह कारोबार से बच कर निकली लड़कियां सीख रही हैं हिंदी

हिंदी का यह ज्ञान इन्हें भविष्य में ऐसे खतरों से तो बचाएगा ही साथ ही पुलिस को भी उन खुफिया रास्तों की जानकारी मुहैया कराएगा जिनका इस्तेमाल मानव तस्कर और देह कारोबारी करते हैं.

बांग्लादेश की बबली अपने तकिये के नीचे रखे एक हिंदी अखबार को हर दिन निहारती है. यह अखबार एक महीना पुराना है लेकिन इसमें छपी शेख हसीना की खबर के शब्दों को बबली रोज पढ़ने की कोशिश करती है. ऐसा इसलिए क्योंकि ये शब्द उसे अपने घर बांग्लादेश से जोड़ते हैं.

पिछले साल बांग्लादेश से मुंबई पहुंची बबली को यहां के एक वेश्यालय में बेच दिया गया था लेकिन अब यह कांदिवली के एक इलाके में पिछले साल से हिंदी सीख रही है. वेश्यालय से बचाकर निकाली गई बबली अब हिंदी को बोल सकती है और कुछ हद तक लिख और समझ भी सकती है. हिंदी क्लासों के जरिये अब ये लड़कियां मानव तस्करों द्वारा इस्तेमाल किए जाने रास्तों के बारे में समझ रही हैं ताकि अपने बयान में ज्यादा सटीक ढंग से पुलिस को इन जगहों के बारे में समझा पाएं.

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बबली ने बताया कि उसे कोलकाता के रास्ते लाया गया था लेकिन वह मुंबई तक पहुंचने वाले स्टेशनों के बारे में नहीं जानती. उसने बताया कि मुंबई में भी उसे लोगों की भाषा समझने में कठिनाई होती थी. बबली की मातृ भाषा बांग्ला है और बबली की ही तरह हजारों लड़कियों को हर साल बांग्लादेश से मुंबई में चलने वाले देह कारोबार के लिए लाया जाता है.

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक साल 2014 में बांग्लादेश से लाई गईं करीब 80 फीसदी लड़कियों को इस सेक्स कारोबार में झोंक दिया गया.

इन लड़कियों को जागरूक करने की दिशा में काम करने वाले संगठनों के मुताबिक इस तस्करी को रोक न पाने की सबसे बड़ी वजह इन लड़कियों का पढ़ा-लिखा न होना है. कई लड़कियां तो आजतक स्कूल भी नहीं गई हैं.

त्रिवेणी आचार्य ऑफ रेस्क्यू फाउंडेशन के मुताबिक, जांच के दौरान ये लड़कियां उन जगहों को भी नहीं बता पातीं जो इन्हें रास्ते में मिलती हैं. लेकिन अब मानचित्रों का प्रयोग कर इन्हें सीमाओं की जानकारी दी जा रही है ताकि ये उन जगहों और जिलों की पहचान कर सकें जहां से इन्हें लाया गया था.

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तमाम गैर सरकारी संगठनों के मुताबिक हर साल तकरीबन 500 से 28 हजार लड़कियां नेपाल और बांग्लादेश के रास्ते भारत में लाई जाती हैं.

कार्यकर्ताओं के मुताबिक इन लड़कियों के हिंदी सीखने से पुलिस को तो मदद मिलेगी ही साथ ही ये लड़कियां अदालत में चल रहे अपने मामलों को समझ सकेंगी, साथ ही उन लड़कियों के लिए भी यह फायदेमंद होगा जो अदालती मामलों के निपटारे के बाद घर लौट गई हैं.

संस्थाओं की इस पहल का असर साफ नजर आ रहा है और अब ये लड़कियां हर सुबह हिंदी, अंग्रेजी और गणित की पढ़ाई कर रही हैं. यहां रहने वालीं कुछ लड़कियां तो मार्च में होने वाली हाई स्कूल की परीक्षा में भी शामिल हुईं.

हालांकि बबली जैसी लड़कियों के लिए ये भाषाई ज्ञान उन्हें अपने देश से जोड़ता है. जब वह पढ़ती है कि भारत और बांग्लादेश के बीच एक नई रेल सेवा शुरू हुई है तो उसकी खुशी का ठिकाना नहीं रहता.

एए/वीके (रॉयटर्स)

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