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दुनिया

खाली बैठे शरणार्थियों को जर्मनी ने यूं लगाया काम पर

जर्मनी में इस वक्त हजारों शरणार्थी एक यूरो जॉब कर रहे हैं. अब तक खाली बैठे परेशान होते ये लोग सकून से हैं कि कुछ तो करने को मिला. लेकिन सब लोग तो खुश नहीं हैं.

जर्मनी में शरणार्थियों की बाढ़ आई हुई है. बीते साल ही यहां 11 लाख शरणार्थी आए हैं. राजनीतिक शरण के लिए उनकी अर्जियों पर काम हो रहा है. लेकिन उसमें काफी वक्त लगता है. तब तक ये लाखों लोग क्या करें? कानूनन ये लोग अभी जर्मनी में काम तो कर नहीं सकते. ज्यादातर लोग दिनभर इधर-उधर खाली घूमते रहते हैं. बोर होते हैं. परेशान होते हैं. कई बार लड़ाई-झगड़े भी हो जाते हैं. स्थानीय लोग भी कुछ खफा रहते हैं. शरणार्थी विरोधियों को मौका मिलता है कि देखो ये लोग बोझ हैं. बहुत समस्या है. इन सारी दिक्कतों से निपटने के लिए जर्मन प्रशासन ने एक पुराना आइडिया झाड़-फूंक कर बाहर निकाल लिया है. इस आइडिया का नाम है 'वन यूरो जॉब'.

एक यूरो का काम

प्रशासन इन शरणार्थियों से छोटे-मोटे काम करवा रहा है जैसे रिफ्यूजी कैंप में खाना बांटना, साफ-सफाई कर देना, सब्जी काट लेना आदि. इसके बदले में इन्हें एक यूरो प्रति घंटा दिया जा रहा है. इराक से आए जैद को इस आइडिया से बड़ा सकून मिला है.

23 साल के जैद बर्लिन के रिफ्यूजी कैंप में अब शरणार्थियों को खाना खिलाते दिख जाते हैं. उनकी शिफ्ट शाम 6.30 से 8 बजे तक होती है. उनका काम है, कैंप में रह रहे 152 लोगों को डिनर कराना. सीरिया, इराक, अफगानिस्तान और मॉल्डोवा से आए ये शरणार्थी एक स्पोर्ट्स हॉल में रह रहे हैं.

जैद उन हजारों शरणार्थियों में से हैं जिन्होंने वन यूरो जॉब अपना ली है. जैद के काम में मेज लगाना, ब्रेड काटना, खाना बांटना और फिर सफाई करना शामिल है. हर घंटे का एक यूरो यानि भारतीय मुद्रा में करीब 70 रुपये मिलते हैं लेकिन एक हफ्ते में 20 घंटे से ज्यादा काम नहीं मिल सकता. यानि महीने में ज्यादा से ज्यादा 84 यूरो कमा सकते हैं.

कितना फायदेमंद?

कुछ न करने से, खाली बैठकर अपनी अर्जी पर फैसले का इंतजार करने से ये 84 यूरो कहीं ज्यादा बेहतर हैं. वह बताते हैं, “इससे मुझे जर्मन स्वयंसेवकों के साथ बातचीत का मौका मिलता है. वे लोग भी काम करने आते हैं. मैं उनके साथ जर्मन बोल लेता हूं. और मुझे दिनभर यह नहीं सोचना पड़ता कि मैं क्या करूं.” जैद अपने पिता के साथ छह महीने पहले इराक के हिला शहर से आए हैं.

वन यूरो जॉब का यह आइडिया करीब एक दशक पुराना है. जर्मन चांसलर श्रोएडर ने यह प्रयोग किया था. इसके तहत अब बर्लिन में 3925 शरणार्थियों को काम दिया गया है. बावेरिया प्रांत में 9000 रिफ्यूजी वन यूरो जॉब कर रहे हैं. हनोफर में भी हजारों लोगों को काम मिल गया है. कुछ लोगों को साइकल ठीक करने का या फिर बच्चों को किंडरगार्टन से लाने-ले जाने का काम दिया गया है.

जर्मनी की श्रम मंत्री आंद्रिया नाहेल्स ने शरणार्थियों को लिए ऐसी एक लाख नौकरियों का वादा किया है. काफी विशेषज्ञ इस प्रयोग से खुश हैं. मसलन आरडब्ल्यूआई इंस्टीट्यूट के अर्थशास्त्री रोनाल्ड बाखमान कहते हैं, “कम समय के लिए यह विचार अच्छा है क्योंकि शरणार्थी अभी नियमित तौर पर काम नहीं कर सकते. उन्हें काम देने से अच्छा राजनीतिक संकेत भी जाता है.”

नौकरी या करियर?

लेकिन बाखमान चेताते हैं कि वन यूरो जॉब अपना असली मकसद हासिल नहीं कर पाते कि लंबे समय से बेरोजगार लोगों को रोजगार मिले. वह कहते हैं, “ऐसा तो बहुत, बहुत ही कम होता है कि इस नौकरी से बेरोजगारों को जॉब मार्केट में वापस लाया जा सके. क्योंकि इस तरह की नौकरियों से कुछ सीखने को तो मिलता नहीं है.”

जर्मन फेडरेशन ऑफ यूनियन्स के अध्यक्ष राइनेर होफमान तो इन नौकरियों के सख्त खिलाफ हैं. वह कहते हैं कि प्रवासियों को देश में समेकन के लिए जर्मनी को एक बेहतर और ज्यादा महत्वाकांक्षी योजना की जरूरत है. आईडब्ल्यू इंस्टीट्यूट में बतौर जॉब मार्केट एक्सपर्ट काम करने वाले होल्गन शेफर कहते हैं कि ये सब तो शरणार्थियों को जॉब मार्केट से बाहर कर देने के तरीके हैं.

हालांकि इन आलोचनाओं से दूर जैद जैसे लोग फिलहाल खाली नहीं हैं. और खाना खिलाने को अपना करियर बनाने का जैद का कोई इरादा नहीं है. उन्होंने बर्लिन के एक हाई स्कूल में दाखिला भी ले लिया है, जहां वह पढ़ाई जारी रख सके. हिला में वह इन्फॉर्मेशन टेक्नॉलजी की पढ़ाई कर रहे थे. वह सोच रहे हैं कि जमीन छूट गई है, उससे जो मिला था वह तो न छूटे.

वीके/आईबी (एएफपी)

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