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दुनिया

जर्मन सेना के सामने समलैंगिक भेदभाव से निपटने की चुनौती

हाल के सालों में हुई प्रगति के बावजूद जर्मन सेना में अब भी समलैंगिक सैनिकों को कई बार भेदभाव और उपहास का सामना करना पड़ता है. हालांकि जर्मन रक्षा मंत्री अब इस स्थिति को बदलना चाहती हैं.

समलैंगिक होने के नाते जर्मन सैनिक मारकुस ऑटो बहुत दिनों तक डर के साए में जीते रहे. छह साल तक उन्होंने अपने साथी सैनिकों से अपनी पहचान को छुपाए रखा. वजह, 33 वर्षीय इस कैप्टन को हर तरफ समलैंगिक विरोधी नजरिया दिखाई पड़ता था. उनके साथी समलैंगिक लोगों के बारे में तरह तरह की बातें करते थे, उनका मजाक उड़ाते थे. ऑटो बताते हैं, "आपको पता ही नहीं चलता कि लोग इस तरह की बातें गंभीरता से कर रहे हैं या फिर सिर्फ अपनी मर्दानगी दिखाने के लिए. इससे बहुत तनाव होता था.”

ऑटो को डर लगा रहता था कि अगर उन्होंने अपने बारे में खुलकर बता दिया तो उन्हें अलग थलग किया जा सकता है. जर्मन सेना ने 1955 में अपनी स्थापना के बाद से एक लंबा सफर तय किया है. लेकिन कई तरह के पूर्वाग्रह अब भी बने हुए हैं.

ऑटो बताते हैं कि सेना में समलैंगिकता ऐसा विषय है जिस पर कोई गंभीरता से बात नहीं करता. वह इसके लिए सेना के वरिष्ठ अधिकारियों को जिम्मेदार बताते हैं जबकि यह हजारों सैनिकों से जुड़ा मुद्दा है. वह कहते हैं, "जितना अफसर समझते हैं, उससे कहीं ज्यादा हम जैसे लोग हैं.”

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जर्मन रक्षा मंत्री उर्सुला फॉन डेय लाएन ने सेना में विविधता के मुद्दे पर सख्त रुख अपनाया है. हाल ही में जर्मन संसद में उन्होंने कहा कि सैनिकों का मजाक नहीं उड़ाया जाना चाहिए, उन पर चुटकुले नहीं मारे जाने चाहिए "भले ही वे कहीं से भी आए हो, किसी को भी प्यार करते हों और कुछ भी सोचते हों."

जर्मन सेना में लैंगिक विविधता को लेकर कोई आंकड़े तो नहीं हैं, लेकिन देश की जनसंख्या के औसत से देखा जाए तो बुंडेसवेयर के दो लाख साठ हजार से ज्यादा कर्मचारियों में लगभग 17 हजार समलैंगिक हो सकते हैं. इनमें सैन्य और सिविलियन दोनों ही तरह के पदों पर काम करने वाले लोग शामिल हैं.

बहुत से लोगों को अपनी लैंगिक पहचान को लेकर एक डर रहता है, हालांकि पिछले पंद्रह साल से जर्मन सेना में एक कार्य समूह काम कर रहा है जो समलैंगिक, बायसेक्सुअल और ट्रांसजेंडर लोगों के विषय में दिलचस्पी रखता है. इस समूह में 130 सदस्य है और ऑटो इसके प्रमुख हैं.

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ऑटो लंबे समय से लड़ रहे हैं कि आधिकारिक तौर पर सेना में समलैंगिक लोगों को स्वीकार किया जाना चाहिए, जैसा कि कॉरपोरेट सेक्टर में किया गया है. खास कर तब जब जर्मन सेना को नए कर्मचारियों की सख्त जरूरत है. 2011 में अनिवार्य सैन्य सेवा समाप्त कर दिए जाने के बाद सेना में जाने वाले लोगों की संख्या घटी है.

ऑटो की मानें तो सेना में समलैंगिक लोगों से इतना भेदभाव किया जाता है कि आप सुनते रहिए बात खत्म ही नहीं होगी. एक रंगरूट ने नौसैनिक टेक्निकल स्कूल में अपने समलैंगिक इंस्ट्रक्टर से कहा था, "रूस में तो इस तरह के लोगों को गोली मार देते हैं.” ऑटो बताते हैं कि खुले तौर पर भेदभाव तो अब शायद ही होता है, लेकिन बहुत से मामले को कमांडिंग अफसर तक ले जाया भी नहीं जाता.

एके/एमजे (डीपीए)

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