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मंथन

खुद बर्फ बनाने लगा मछुआरों का गांव

आइस मेकर मछुआरों और सलामांसा के लिए बड़ी राहत लेकर आया है. एक और होता तो ज्यादा बेहतर होता. लेकिन ऐसी आधुनिक तकनीक सस्ती नहीं है.

एक वक्त था जब अफ्रीका के द्वीपीय देश केप वेर्डे में मछुआरों का एक गांव खूब मेहनत से पकड़ी गई मछलियों को खराब होने से बचाने के लिए बर्फ की सिल्लियां तक नहीं खरीद पाता था. महंगाई परेशानी बनी तो उन्होंने मिल कर सौर ऊर्जा से चलने वाले खास किस्म के आइसमेकर में निवेश किया. और अब तो कुछ ही सालों में वे पूरे देश को स्वच्छ ऊर्जा से ही चलाना चाहते हैं.

इस काम के अगुआ बने ऑक्सिलियो माटियास. माटियास को भी सलामांसा के बाकी मछुआरों की तरह बर्फ खरीदने में काफी पैसा खर्च करना पड़ता था. 50 किलो बर्फ खरीदने के लिए उन्हें पास के शहर जाना पड़ता था. लेकिन अब वह यहीं बर्फ बना सकते हैं, खर्चा आधा हो गया है. सलामांसा की फिशरमैन असोसिएशन के अध्यक्ष ऑक्सिलियो माटियास बताते हैं, "समुदाय गरीब है, उसे काफी मदद चाहिए. हम मिनडेलो से बर्फ खरीदा करते थे. कार से जाना पड़ता था. इसी वजह से मैंने एक प्रोजेक्ट के बारे में सोचा ताकि बर्फ को यहां सलामांसा में लाया जा सके."

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खर्च कम करने के लिए उन्होंने सौर ऊर्जा का सहारा लिया. ऑक्सिलियो ने जापान सरकार से सूरज की रोशनी से चलने वाले आइसमेकर की दरख्वास्त की. ऑक्सिलियो और उनके बेटे ने उसे चलाना और रिपेयर करना भी सीखा, ताकि बर्फ का प्रोडक्शन हमेशा चलता रहे. अब उनकी असोसिएशन मशीन के रखरखाव और बर्फ बेचने का काम संभालती है. एक बैंक खाता भी है, जिसमें कमाई को जमा किया जाता है. इस पैसे से आइसमेकर की देखरेख की जाती है और समुदाय की मदद होती है. बर्फ का इस्तेमाल मछुआरों द्वारा पकड़ी मछली को ताजा रखने के लिए ही नहीं होता, बल्कि असोसिएशन गांव वालों को भी बाल्टी में बर्फ बेचती है, जिसका इस्तेमाल फलों और मछली को ताजा रखने के लिए होता है. कभी कभार दूसरे कस्बों को भी बर्फ बेची जाती है. असोसिएशन के मुताबिक ज्यादातर कमाई मशीन की मेंटेनेंस में लग जाती है. साथ ही थोड़ी मदद स्थानीय स्कूल की और इलाज का खर्च न उठा पाने वाले लोगों की भी होती है.

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सौर ऊर्जा का इस्तेमाल स्ट्रीट लाइट के लिए भी होता है. सलामांसा जैसे ग्रामीण इलाके में भी सौर ऊर्जा लोकप्रिय हो रही है. संयुक्त राष्ट्र और सेंटर फॉर रिन्यूएबल एनर्जी एंड एनर्जी एफिशिएंसी, इकोवास भी इन प्रयासों को बारीकी से देख रहे हैं. हेलेनो सांचेज की टीम दक्षिण केप वेर्डे के फुना समुदाय में चल रहे प्रोजेक्ट की निगरानी कर रही हैं. बर्फ का उत्पादन करने के लिए मछुआरे हर महीने करीब 420 यूरो की बिजली खर्च करते हैं. सोलर पैनल लगाने से यह खर्च घटकर 70 यूरो रह गया है. इक्री के पर्यवेक्षक हेलेनो सांचेज कहते हैं, "हमारा लक्ष्य इस प्रोजेक्ट के जरिये ग्रीनहाउस गैसों में कमी लाना है. लेकिन समुदायों को केप वेर्डे में चल रहे अक्षय ऊर्जा के प्रोजेक्टों का पहला आर्थिक फायदा महसूस होना चाहिए. नतीजा ये है कि बिजली के बिल नीचे गिरे हैं."

आइस मेकर मछुआरों और सलामांसा के लिए बड़ी राहत लेकर आया है. एक और होता तो ज्यादा बेहतर होता. लेकिन ऐसी आधुनिक तकनीक सस्ती नहीं है. सोलर एनर्जी से चलने वाले एक आइस मेकर का दाम ढाई लाख यूरो से ज्यादा है. लोगों के पास इतना पैसा नहीं है. ज्यादा बर्फ का मतलब बेहतर मछली कारोबार और ज्यादा इनकम है. ऑक्सिलियो माटियास को लगता है कि एक और आइस मेकर मिल पाता तो बेहतर होता.

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