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मंथन

जब सांस लेना भी मरने की वजह बनने लगे

हर शहर में कारें होती हैं और कारें जहर छोड़ती हैं. वही जहर हवा में मिलकर सांस लेने तक को जानलेवा बना देता है. जर्मनी के वैज्ञानिक इस जहर से लड़ने के रास्ते खोज रहे हैं.

लाइपजिग जर्मनी का बड़ा शहर है. ये दुनिया के दूसरे शहरों की तरह ही बढ़ रहा है और बदल रहा है. समस्या यहां भी वही है, धूल के बारीक कण. शहर का मुख्य बाजार, जिसे सिटी सेंटर कहते हैं, जहरीले पार्टिकल्स की भरमार है. सबसे बड़ी समस्या गाड़ियां हैं. स्वास्थ्य से जुड़े मुद्दों और फाइन डस्ट पर शोध करने वाले भौतिकशास्त्री उलरिष फ्रांक कहते हैं कि यह रहने की बहुत अच्छी जगह नहीं है. वह बताते हैं, "मुख्य यातायात के समय रास्ते एकदम ठस्स जाम होते हैं, कारें बहुत सारा धुआं छोड़ती हैं. इसकी वजह से धूल हरकत में आती है और इसमें टायर के घिसने और ब्रेक लगाने से पैदा हुई गर्द के अलावा गाड़ी के एग्जॉस्ट से निकलने वाली जहरीली गैस भी शामिल है."

ऐसे पार्टिकल तो और ज्यादा खतरनाक हैं, जिनकी अभी तक कोई सीमा तय नहीं हुई है और जो बहुत ही छोटे हैं, यानी अल्ट्रा फाइन. रिसर्चरों ने एक साल तक लाइपजिग में सारे बचाव अभियानों का विश्लेषण किया है. रिसर्च के नतीजे बताते हैं कि यदि अल्ट्रा फाइन पार्टिकल्स की मात्रा ज्यादा हो तो ज्यादा लोगों को अस्पताल ले जाना पड़ता है. फ्रांक कहते हैं, "यदि हम दूसरे देशों को देखें मसलन भारत, चीन या दूसरे विकासशील देश, तो वहां खराब हवा के कारण बहुत ज्यादा बीमारियां होती हैं. वहां विभिन्न बीमारियों और जान जाने का खतरा बहुत ज्यादा है. इनमें सांस लेने की समस्या और दिल की बीमारी से लेकर कैंसर जैसी बीमारियां शामिल हैं."

रिसर्चरों ने घरों के अंदर रहने वाले फाइन डस्ट का भी विश्लेषण किया है. वे जानना चाहते थे कि क्या इसकी वजह से बच्चों में ब्रोंकाइटिस होने का ज्यादा खतरा है. सचमुच यह जोखिम बहुत ही ज्यादा होता है, यदि घर के अंदर सिगरेट पी जाए या घर सड़क पर हो, जहां बहुत सारी गाड़ियां चलती हैं. दोनों ही मामलों में फाइन डस्ट का कंसंट्रेशन बढ़ जाता है. रिसर्चरों ने ये भी पता किया कि शहर में फाइन डस्ट पार्टिकल का घनत्व कहां ज्यादा है और कहां कम.

उलरिष फ्रांक बताते हैं कि शहरों में हरी पट्टी कितनी जरूरी है. वह कहते हैं, "यदि मैं लाइपजिग में इस हरी पट्टी को देखूं तो ये सिर्फ ऑक्सीजन का स्रोत ही नहीं है, बल्कि साफ हवा का बड़ा गलियारा भी है जिसके माध्यम से गंदी हवा बाहर ले जायी जा सकती है और साफ हवा अंदर लायी जा सकती है."

सिटी प्लानरों के लिए यह मजेदार बात हो सकती है कि खुले मकान भी डस्ट पार्टिकल को कम करते हैं. उनमें हवा के आने जाने के बेहतर गलियारे होते हैं. उलरिष फ्रांक कहते हैं कि तेजी से बढ़ते महानगरों में भी कुछ आसान कदमों की मदद से फाइन डस्ट का ज्यादा दबाव होने की संभावना को बहुत कम किया जा सकता है, जैसे कि यह तय कर सकते हैं कि मकान किस तरह बनाए जाएं.

जर्मनी में सिटी सेंटरों में ग्रीन जोन बनाकर ज्यादा फाइन पार्टिकल छोड़ने वाली गाड़ियों का आना रोक दिया गया है. लेकिन उलरिष फ्रांक का कहना है कि दुनिया भर में शहरों में और ज्यादा कदम उठाने की जरूरत है. वह कहते हैं, "कुछ शहरों में सार्वजनिक यातायात को बेहतर बनाने से मदद मिल सकती है. तो दूसरे शहरों में इमारतों की बनावट में सुधार लाने की जरूरत है ताकि हवा के बहाव को बेहतर बनाया जा सके. कुछ शहरों में उद्योग को पर्यावरण सम्मत बनाना होगा."

शहरों में फाइन डस्ट पार्टिकल को कम करना संभव है और जरूरी भी. वैज्ञानिक इस कोशिश में जुटे हैं कि भविष्य में शहर के लोग बिना किसी चिंता के सांस ले सकें.

मारिया लेसर/एमजे

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