एक कश्मीरी लड़की कुछ जवाब चाहती है | डीडब्ल्यू अड्डा | DW | 19.07.2016
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डीडब्ल्यू अड्डा

एक कश्मीरी लड़की कुछ जवाब चाहती है

बेनिश अली बट पिछले 10 दिन से घर से बाहर नहीं निकली हैं, कर्फ्यू की वजह से. बंद कमरों से ये सवाल आ रहे हैं जिनके जवाब भारत को देने हैं.

यह एक चक्र है. पहले खबर आती है, फिर उबला कश्मीर. और जब हिंसा खत्म होती है तो खबर आती है, कश्मीर में हालात सामान्य. बस, बात यहीं खत्म हो जाती है. हर बार यही होता है. लेकिन इस चक्र की जड़ें 1947 के उस बंटवारे से जुड़ी हैं जिसने भारत और पाकिस्तान बनाए और ये दोनों मुल्क कश्मीर के लिए लड़ने लगे.

तब कश्मीर के राजा रहे महाराजा हरि सिंह ने कश्मीर को अस्थायी तौर पर भारत में मिला दिया था. लेकिन इसके साथ एक शर्त थी कि अपनी किस्मत का फैसला कश्मीरी खुद करेंगे. एक जनमत संग्रह का वादा किया गया था जो कभी निभाया नहीं गया. राज्य को बिना कश्मीरियों की मर्जी जाने भारत में मिला लिया गया. बस तभी यह विवाद और यह चक्र जारी है.

कश्मीरी अवाम का एक बड़ा हिस्सा भारत से अलग होने का हिमायती रहा है. इसी के नाम पर हिंसा होती रही है जो 1980 और 1990 के दशक में अपने चरम पर थी. तब पाक समर्थित आतंकवाद अपने चरम पर था. भारत ने गोली का जवाब गोली से दिया. फौजों का पूरा जमावड़ा कश्मीर में हो गया. लेकिन उन दो दशकों में हजारों कश्मीरी मारे गए, गायब हो गए या हमेशा के लिए अपंग हो गए. बलात्कारों की तो बात ही क्या करनी. मानवाधिकारों का खुलेआम उल्लंघन होता रहा और आफ्सपा जैसे कानून फौज की ढाल बने रहे.

नई सदी के साथ थोड़ी शांति आई थी. एक उम्मीद जगी थी कि प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने बातचीत को जिस तरह पाकिस्तान के साथ आगे बढ़ाया था, कुछ शांतिपूर्ण लेकिन स्थायी हल निकलेगा. लेकिन बातें ही होती रहीं और 2008 का मुंबई आतंकी हमला हो गया. जिसके बाद सारे दरवाजे बंद हो गए.

कश्मीर में आज जो हिंसा हो रही है, उसकी शुरुआत का पहला कदम 2008 में ही उठा था. शांति को पहला धक्का तब पहुंचा जब अमरनाथ की जमीन गैर स्थानीय लोगों की दी जाने लगी. फिर 2009 में शोपियां में दो कश्मीरी लड़िकयों को बलात्कार के बाद कत्ल कर दिया गया. और जब 2010 एक बच्चे तुफैल मट्टू को झूठे एनकाउंटर में मार डाला गया तो विरोध पूरी ताकत के साथ सड़कों पर उतर आया. फिर यह कुचक्र बन गया. एक कत्ल का विरोध करने उतरे प्रदर्शनकारियों में से 100 को मार डाला गया. गुस्सा बढ़ता गया. तब भी बहुत सारे वादे किए गए थे. बातचीत के लिए तीन शांतिदूत भी भेजे गए थे. लेकिन हुआ क्या? उनकी सिफारिशों को रद्दी में फेंक दिया गया.

इस हफ्ते कश्मीर फिर से उबाल पर है. एक स्थानीय उग्रवादी बुरहान वानी को मुठभेड़ में मार डाला गया. जिस पल पुलिस ने वानी के मारे जाने की खबर की पुष्टि की, भारी विरोध प्रदर्शन शुरू हो गया. अब तक दर्जनों लोगों की जान जा चुकी है. सैकड़ों घायल हैं. लोगों के गुस्से की हद यह है कि पुलिस की चेतावनियों के बावजूद वानी के जनाजे में दो लाख से ज्यादा लोग पहुंचे थे.

ऐसा क्यों होता है कि जब कश्मीरी विरोध करते हैं तो उन पर कथित अ-घातक हथियारों से कहर बरपाया जाता है? इन अ-घातक हथियारों ने कैसे दर्जनों जानें ले लीं और सैकड़ों को घायल कर दिया? एक जांच का वादा तो इस बार भी किया गया है लेकिन इस बात की क्या गारंटी है कि इस जांच का हश्र भी वही नहीं होगा जो पहले की दर्जनों का हुआ? फरवरी 2016 में जब हरियाणा में जाट अपने आरक्षण के लिए प्रदर्शन कर रहे थे तो उन्होंने जोरदार हिंसा की. सार्वजनिक संपत्ति को आग लगाई. करीब 50 लाख डॉलर का नुकसान हुआ. और जाट कितने मारे गए? एक भी नहीं.

इसलिए अब जो कश्मीर में हो रहा है, हैरतअंगेज नहीं है. दिक्कत यह है कि जब कश्मीर में हालात थोड़े शांत होते हैं और टूरिस्ट आने लगते हैं तो भारत सरकार सोचती है कि कश्मीरी स्वीकार कर रहे हैं. लेकिन सच यह है कि कश्मीर आग पर चढ़ी केतली है में रखा पानी है. वह उबलता रहता है. और जैसे ही आंच थोड़ी तेज हुई, उफनने लगता है. फिर वह उफान उस नकली शांति को बहाकर ले जाता है.

और इसमें राष्ट्रीय मीडिया की पक्षपातपूर्ण रिपोर्टिंग का कम हाथ नहीं होता. कश्मीरियों को लगता है कि यह कैसा नेशनल मीडिया है जो हमारी बात ही नहीं करता.

एक बात समझनी होगी. कश्मीर में उग्रवाद बढ़ रहा है. और इस बार उसे जनता का बहुत जोरदार समर्थन मिल रहा है. भारत आम कश्मीरी का साथ खो रहा है. इस चलन को रोकने का एक ही तरीका है. कश्मीर की नीति में क्रांतिकारी बदलाव हो. भारत और पाकिस्तान के बीच गंभीरता से बात हो और हल निकालने की सोच के साथ बात हो.

बेनिश अली बट

पत्रकार, श्रीनगर

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