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दुनिया

इनर लाइन परमिट पर अशांत हुई मणिपुर घाटी

बाहरी लोगों से अपना वजूद बचाने के लिए राज्य में इनर लाइन परमिट लागू करने के मुद्दे पर मणिपुर एक बार फिर अशांत हो उठा है. राजधानी इंफाल में हिंसा के बाद राज्य सरकार ने तीन दिनों तक स्कूलों को बंद रखने का निर्देश दिया है.

इसे लागू करने की मांग में आंदोलन करने वाले संगठन जॉइंट कमिटी ऑन इनर लाइन परमिट सिस्टम (जेसीआईएलपीएस) ने एक से तीन जून तक पूरे राज्य में पब्लिक कर्फ्यू लागू कर दिया है. उसने घाटी में रहने वाले बाहरी लोगों से इस दौरान घरों से बाहर नहीं निकलने को कहा है. अब एक सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल शनिवार (चार जून) को दिल्ली जाकर इस मुद्दे पर केंद्रीय मंत्रियों और गृह मंत्रालय के अधिकारियों से मुलाकात करेगा. राज्य विधानसभा ने बीते साल इनर लाइन परमिट से संबंधित तीन विधेयक पारित किए थे. लेकिन उनको राष्ट्रपति की हरी झंडी का इंतजार है. राज्य में अगले साल की शुरुआत में होने वाले विधानसभा चुनावों को ध्यान में रखते हुए सत्तारूढ़ कांग्रेस के अलावा बीजेपी इस मुद्दे पर अपनी सियासी रणनीति बनाने में जुट गई हैं.

राष्ट्रपति की मंजूरी का इंतजार

सरकार ने बीते साल अगस्त में बाहरी लोगों की गतिविधियों पर अंकुश लगाने के लिए इससे संबंधित तीन विधेयक पारित किए थे. उन विधेयकों को फिलहाल राष्ट्रपति की मंजूरी का इंतजार है. राज्य की बहुसंख्यक मैतेयी आबादी उन विधेयकों को शीघ्र लागू करने की मांग में सड़कों पर उतर आई है. बीते साल से अब तक इस आंदोलन में लगभग एक दर्जन लोगों की जानें गई हैं और करोड़ों की संपत्ति का नुकसान हुआ है.

दरअसल, पड़ोसी नगालैंड, मिजोरम और अरुणाचल प्रदेश में इनर लाइन परमिट प्रणाली पहले से ही लागू है. इसी आधार पर मणिपुर के लोग भी इसे लागू करने की मांग कर रहे थे. लंबे समय तक चले हिंसक आंदोलन के बाद बीते साल सरकार ने उक्त विधेयकों को पारित कर दिया. लेकिन उसे अब तक अमली जामा नहीं पहनाया जा सका है. अब बीते सप्ताह से एक बार फिर यह मुद्दा गरमा गया है.

बाहरी और मैतेयी का मतभेद

मणिपुर में बाहरी लोगों की आबादी लगातार बढ़ रही है. हालत यह है कि घाटी में रहने वाले मैतेयी समुदाय की आबादी जहां 7.51 लाख है, वहीं बाहरी लोगों की तादाद 7.04 लाख तक पहुंच गई है. इससे मैतेयी समुदाय को अपना वजूद खतरे में नजर आ रहा है. राज्य में इनर लाइन परमिट की मांग बहुत पुरानी है. लेकिन पहली बार जुलाई 2012 में इसका प्रस्ताव विधानसभा में पेश किया गया. उसी साल अगस्त में राज्य सरकार ने इस बारे में केंद्र को एक पत्र भी भेजा था. लेकिन केंद्र ने मणिपुर में आईएलपी लागू करने का प्रस्ताव ठुकरा दिया था. बीते साल छात्रों ने इस मांग में आंदोलन शुरू किया. उस दौरान पुलिस की गोली से एक छात्र की मौत के बाद इस आंदोलन ने जोर पकड़ा और महिलाओं समेत समाज के सभी तबके के लोग इसमें शामिल हो गए.

मणिपुर वर्ष 1949 में भारत का हिस्सा बना और 1972 में इसे पूर्ण राज्य का दर्जा मिला. यहां राजाओं के शासानकाल के दौरान आईएलपी जैसी एक प्रणाली लागू थी जिसके तहत कोई बाहरी व्यक्ति राज्य में न तो स्थायी नागरिक बन सकता था और न ही यहां जमीन या कोई दूसरी संपत्ति खरीद सकता था. लेकिन देश में विलय के बाद केंद्र ने वह प्रणाली खत्म कर दी थी. अब समय-समय पर उसी को लागू करने की मांग उठती रही है. आईएलपी की मांग में पहला बड़ा आंदोलन वर्ष 1980 में छात्रों ने शुरू किया था. उस साल अप्रैल में पुलिस फायरिंग में दो छात्रों की मौत के बाद छात्र संगठन हर साल अप्रैल में उनकी बरसी मनाते हैं और उस दौरान आईएलपी की मांग में प्रदर्शन वगैरह होते रहे हैं. लेकिन बीते साल से यह आंदोलन सुर्खियों में है.

पर्वतीय लोगों के हित

इस मुद्दे पर अब राज्य के पर्वतीय और घाटी इलाके में रहने वाले लोग भी दो-फाड़ हो गए हैं. घाटी में रहने वाली आबादी आईएलपी लागू करने की मांग कर रही है तो पर्वतीय इलाकों में रहने वाले लोग इसका विरोध कर रहे हैं. पर्वतीय इलाकों में नगा जनजाति के लोगों की बहुलता है और इलाके की प्रमुख पार्टी नगा पीपल्स फ्रंट (एनपीएफ) भाजपा की सहयोगी है. एनपीएफ राज्य विधानसभा में पारित तीनों विधेयकों को मंजूरी नहीं देने की मांग कर रहा है. मैतेयी तबके के नेताओं का कहना है कि वे अपनी जमीन की सुरक्षा के लिए आईएलपी की मांग कर रहे हैं और यह प्रणाली पर्वतीय लोगों के हितों के खिलाफ नहीं हैं. लेकिन पर्वतीय लोगों को लगता है कि इसके जरिये मैतेयी तबका भी पर्वतीय लोगों की तरह जनजाति का दर्जा पाने का प्रयास कर रहा है.

आईएलपी का मुद्दा राज्य में एक अहम और संवेदनशील चुनावी मुद्दा रहा है. राज्य में बीते पंद्रह वर्षों से कांग्रेस की सरकार है. अब असम की सत्ता पर काबिज होने के बाद भाजपा अपने स्थानीय सहयोगी एनपीएफ की सहायता से मणिपुर में भी सरकार बनाने के सपने देख रही है. राज्य में अगले साल विधानसभा चुनाव होने हैं. बीते साल नवंबर में हुए उपचुनावों में भाजपा मैतेयी-बहुल इलाके की दो सीटें जीत चुकी है. इससे वह इस मुद्दे पर सियासी रणनीति बनाने में जुटी है. राज्य विधानसभा की 60 सीटों में से बीस सीटें पर्वतीय इलाके में हैं और चालीस घाटी में. ऐसे में भाजपा भी घाटी में रहने वाले मैतेयी समुदाय की मांगों की अनदेखी करने का खतरा नहीं उठा सकती. फिलहाल वह इंतजार करो और देखो की रणनीति पर आगे बढ़ रही है.

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