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दुनिया

चम्बल के डकैतों के साये में यूपी चुनाव

वैसे तो चुनाव में बैलट पेपर ज्यादा प्रभावी होता है लेकिन उत्तर प्रदेश में चुनावी मौसम में डकैत भी सक्रिय हो जाते हैं और बैलट की जगह बुलेट ले लेती है.

बुंदेलखंड और उससे लगे हुए इलाकों में डकैतों के फरमान से चुनाव जीते-हारे जाते थे. हालांकि अब पुराने डकैत या तो मर गए या फिर जेल में हैं लेकिन डकैतों की दहशत उस इलाके में कायम है.

आर्थिक सम्पन्नता और विकास होने से डकैतों का आतंक कम तो हुआ है लेकिन प्रशासन अभी भी कोई मौका नहीं देना चाहता. ऐसे क्षेत्रों में चुनाव कराना बहुत बड़ी ज़िम्मेदारी है जहां गाड़ियां नहीं पहुच सकतीं और डकैतों की दहशत अभी भी है. हालात सुधर रहे हैं लेकिन अभी भी हत्या, अपहरण और रंगदारी की घटनाएं होती रहती हैं. ऐसे में चम्बल क्षेत्र में बन्दूक ले कर निकलना आजकल आम बात है.

डाकुओं और चम्बल के बीहड़ों का पुराना नाता रहा है. आजादी से पहले से डाकुओं को बागी कहा जाता था. वे अपना दबदबा बनाये रखते थे. आमतौर पर किसी परिवार पर जुल्म होने पर उसके परिवार का कोई चम्बल में शरण लेता था और बागी बन जाता था. फिर शुरू होती थी बदले की कहानी और धीरे धीरे वह लूट-मार पर आ जाती थी.

बॉलीवुड की फिल्मों में चम्बल के डकैतों पर बहुत सी फिल्में बनी हैं. पहले तो डाकू अपना बदला लेने के लिए चम्बल की घाटियों में शरण लेते थे. धीरे धीरे पैसा और ताकत उन्हें आकर्षित करने लगी. डकैतों का गिरोह भी राजनीति के तरह जाति-आधारित होने लगा. पहले ठाकुरों के गिरोह हुए फिर मल्लाह, कुर्मी, दलित वगैरह सभी के गिरोह उभरते रहे. इन डकैतों का अपनी बिरादरी में वर्चस्व होने लगा और उनकी मान-दान होने लगी. कुछ अपनी रॉबिन हुड वाली छवि बनाने में लगे तो कुछ आतंक कर पर्याय बन गए.

डाकुओं के वर्चस्व से प्रभावित इलाकों में बुंदेलखंड के ललितपुर, बांदा, चित्रकूट, जालौन, हमीरपुर, आगरा के कुछ क्षेत्र और इटावा का छोटा सा हिस्सा हैं.

लूट-मार के बाद डकैतों की दिलचस्पी राजनीति में बढ़ने लगी. पहले डकैत समर्थन देने लगे. फिर राजनीतिक दल भी उनसे समर्थन की आस लगाने लगे. उसके बाद डकैत सीधे चुनाव में उतरने लगे. सभी पार्टियों के लिए यह एक फायदे का सौदा साबित हो रहा था. भाजपा ने पूर्व डकैत तहसीलदार सिंह को मुलायम सिंह यादव के खिलाफ विधानसभा चुनाव में उतारा तो बहुजन समाज पार्टी ने भी कई पुराने डकैतों जैसे राम सेवक पटेल, हरी प्रसाद वगैरह को चुनाव में मौका दिया. मुलायम ने दस्यु सुंदरी फूलन देवी को टिकट दिया और वह सांसद भी बनीं. इसी क्रम में डकैतों का फरमान जारी होने लगा.

अस्सी के दशक का सबसे चर्चित नाम रहा डकैत शिवकुमार उर्फ ददुआ. ददुआ पर दो राज्यों ने इनाम घोषित किया था. ददुआ को पहले बीएसपी ने अपने पाले में किया. और ददुआ का फरमान जारी हो गया, मोहर लगाना हाथी पर, वरना गोली चलेगी छाती पर. ददुआ के परिजन चुनाव लड़ने लगे. उसका लड़का वीर सिंह जिला पंचायत अध्यक्ष चुना गया. बीच में ददुआ की नजदीकी सपा से हुई लेकिन वह पुलिस एनकाउंटर में मारा गया. हालांकि तब तक उसका राजनीतिक साम्राज्य खड़ा हो चुका था. अभी ददुआ के पुत्र वीर सिंह समाजवादी पार्टी के चित्रकूट से विधायक हैं. ददुआ के भाई बाल कुमार पटेल सांसद रह चुके हैं और उनके पुत्र राम सिंह प्रतापगढ़ में पट्टी विधान सभा में सपा विधायक हैं. ददुआ का दूसरा रिश्तेदार राम सिंह पटेल भी सांसद बना और बसपा, सपा और अब भाजपा में हैं. इसी बीच ददुआ का एक मंदिर भी बन गया है. फतेहपुर जनपद में एक मंदिर में उसकी मूर्ति लगायी गई है. जब मूर्ति लगायी गई तो मंत्रियों के साथ हजारों लोगों ने शिरकत की थी. कुल मिला कर ददुआ मर कर भी राजनीतिक रूप से क्षेत्र में जिंदा है.

बांदा के वरिष्ठ पत्रकार जियाउल हक के अनुसार ज्यादातर डकैतों के परिजन पंचायत चुनाव से शुरुआत करते हैं. अब बड़े नामी डकैत तो बचे नहीं हैं लेकिन चम्बल कभी खाली नहीं रहता. कई डकैत अपनी दहशत फैलाने में लगे हैं. चुनाव के समय तक इनका असर बहुत गांवों में दिखने लगता है. जियाउल हक मानते हैं कि राजनितिक पार्टियां अपने फायदे के हिसाब से डकैतों के असर का इस्तेमाल भी कर लेती हैं.

इस समय क्षेत्र में गौरी यादव और बबुली कोल का आतंक है. दोनों गिरोह चम्बल पर अभी भी कब्जा जमाये हैं. अभी कुछ मजदूरों का अपहरण हुआ. एक ग्राम प्रधान भी घर से गायब हुआ. ऐसा करने के पीछे मंशा दहशत पैदा करने की होती है. चुनाव में यही दहशत वोट डलवाने के काम आती है. ऐसा इस वजह से और हो जाता है क्योंकि अभी भी बहुत से गांव ऐसे हैं जहां चौपहिया वहां नहीं जा सकते.

प्रशासन ने इधर सख्त कार्रवाई करते हुए कई नामी डकैतों जैसे ठोकिया, डॉक्टर आदि को मार गिराया. इन मुठभेड़ों में पुलिस के कई जवान भी शहीद हुए. दूसरा बड़ा नाम राधे उर्फ सूबेदार सिंह बांदा जेल में उम्र कैद की सजा काट रहा है. चम्बल के बीहड़ों में सघन छानबीन की जा रही है. पुलिस बल गांव गांव जा कर विश्वास दिला रहे हैं कि डकैतों का आतंक अब खत्म हो चुका है लेकिन गांव वालों के मन में दहशत अभी कायम है.

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