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ब्लॉग

सरपट दौड़ते भारत में किसानों की सुध कौन लेगा?

भारत में सालाना 12,000 से ज्यादा किसान आत्महत्या कर रहे हैं. ये संख्या पश्चिमी देशों में भी सनसनी पैदा करती है और भारत को ऐसे देश के रूप में दिखाती है जो समस्याओं का हल करने में सक्षम नहीं.

भारत से किसानों की आत्महत्या की इक्का दुक्का खबर लगातार आती रहती है. अब सरकार ने स्वीकार किया है कि 2013 से सालाना 12,000 से ज्यादा किसान आत्महत्या कर रहे हैं. भारत जैसे देश में भी ये बड़ी संख्या है जिसे नजरअंदाज करना अमानवीय ही नहीं, शासकीय जिम्मेदारियों की अवहेलना है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सरकार बनाने के बाद से ही किसानों की समस्याओं पर ध्यान दिया है. उनकी सरकार देहाती इलाकों में 2022 तक लोगों की आय को दोगुना करना चाहती है. लेकिन पांच साल में आय को दोगुना करना समस्या का समाधान नहीं हो सकता क्योंकि देश में मुद्रास्फीति की दर सालाना करीब 10 प्रतिशत है.

भारत अब भी कृषिप्रधान देश है. किसानों की आमदनी शहरों में होने वाली आमदनी से बहुत कम है और सरकार को ऐसे कदमों की पहल करनी होगी जो उन्हें जीने के लिये जरूरी न्यूनतम आय मुहैया करा सकें. इसमें फसल की न्यूनतम समर्थन कीमत और बीमा अहम भूमिका निभाती है, लेकिन तेजी से किसानों को अतिरिक्त आय के साधनों में प्रशिक्षित किये जाने की भी जरूरत है.

किसानों की बेहतरी भारत में आम लोगों द्वारा होने वाले खाद्य उपभोग में भी प्रतिबिंबित होगी. यदि सामान्य आय वाले लोग भी आसानी से चावल, दाल, सब्जियां और फल के अलावा दूध दही और अन्य कृषि उत्पाद खरीद पायेंगे तो निश्चित तौर पर इससे किसानों की आमदनी में भी इजाफा होगा. कम लागत में फसल उगाने और अन्य कुटीर उद्योगों का भी प्रशिक्षण देना लाभदायक होगा.

भारत कृषि प्रधान अर्थव्यवस्था से आधुनिक औद्योगिक अर्थव्यवस्था बनने की राह पर है. इस दौरान किसानों को सबसे बड़े बदलाव से गुजरना होगा. एक सर्वे के अनुसार 70 प्रतिशत किसान परिवारों के पास 1 हेक्टेयर से कम जमीन है. इससे जीने लायक कमाई करना आसान नहीं. जब तक ये परिवार आत्मनिर्भर नहीं हो जाते भारत सरकार को उन्हें सम्मानजनक आय पाने के लिये सब्सिडी देने पर भी विचार करना चाहिए. अमीर किसानों और खेती में लगी कंपनियों से आयकर लेने का समय आ गया है. उससे किसानों की आय बढ़ाई जा सकेगी और देहाती इलाकों का विकास भी हो पायेगा.

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