स्वायत्तता का मोहताज बना प्रसार भारती | ब्लॉग | DW | 06.03.2018
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ब्लॉग

स्वायत्तता का मोहताज बना प्रसार भारती

भारत के सूचना और प्रसारण मंत्रालय और प्रसार भारती के बीच टकराव से न सिर्फ वर्चस्व की लड़ाई सार्वजनिक हो गई है, बल्कि इससे यह भी स्पष्ट हो रहा है कि सरकारी संस्थाओं को वास्तव में कितनी स्वायत्तता हासिल है.

केंद्रीय सूचना प्रसारण मंत्री अपनी कार्यशैली को लेकर अक्सर सुर्खियों में रहती हैं. फिल्म प्रमाणन बोर्ड से उनका टकराव तो चल ही रहा था, अब प्रसार भारती के साथ भी उनके संबंध सौहार्दपूर्ण नहीं रहे. विवाद क्या है, यह जानने से पहले थोड़ा इतिहास में झांक लेते हैं. इमरजेंसी में दूरदर्शन और आकाशवाणी के दुरुपयोग की वजह से इन दोनों संस्थाओं को स्वायत्त बनाने की मांग उठने लगी और कई समितियों और सिफारिशों के बाद 1990 में प्रसार भारती अधिनियम पारित हुआ.

इस अधिनियम के तहत नवंबर 1997 में स्वायत्त प्रसार भारती बोर्ड का गठन किया गया और आकाशवाणी और दूरदर्शन को सूचना और प्रसारण मंत्रालय से हटाकर, बोर्ड के तहत कर दिया गया. आज सूचना और प्रसारण मंत्रालय पर आरोप लग रहा है कि वह दूरदर्शन और आकाशवाणी को चलाने के लिए निर्धारित धनराशि नहीं दे रहा है. प्रसार भारती के चेयरमैन ए सूर्यप्रकाश का अंग्रेजी के एक चर्चित वेब पोर्टल में बयान आया कि मंत्रालय ने वेतन के पैसे रोक रखे हैं, प्रसार भारती को अपने आपातकालीन कोष से कर्मचारियों को वेतन देना पड़ा है और अगर ऐसा ही रहा, तो अप्रैल से तनख्वाह देने के लाले पड़ जाएंगें.

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इस झगड़े की शुरुआत दरअसल तब हुई जब बोर्ड ने पिछले साल एक निजी कंपनी को गोवा में हुए अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव की कवरेज के लिए करीब तीन करोड़ रुपए का भुगतान करने से मना कर दिया. बोर्ड का कहना था कि दूरदर्शन के पास इसके लिए पर्याप्त अनुभव और संसाधन हैं और अब तक दूरदर्शन ही इसकी कवरेज करता आया है, इसलिए मंत्रालय द्वारा बाहरी फर्म से कवरेज कराने का औचित्य ही नहीं.

जैसा कि बताया जाता है कि कुछ समय पहले बोर्ड ने टीवी के लिए दो पत्रकारों को भारी-भरकम वेतन में लाने की मंत्रालय की कथित सिफारिश को भी ठुकरा दिया था. और इसके भी पहले मंत्री ईरानी ने प्रसार भारती में ठेके पर रखे गए सभी कर्मचारियों को हटाने के लिए कहा था, लेकिन प्रसार भारती ने ऐसा करने से भी मना कर दिया. संभवत: इन्हीं वजहों से मंत्रालय की मुखिया ईरानी ने इसे नाक की लड़ाई बना दिया और प्रसार भारती की बांह मरोड़ते हुए फंड अटका दिया गया. हालांकि मंत्रालय की दलील है कि फंड इसलिए रोके गए क्योंकि कथित तौर पर प्रसार भारती ने वित्तीय नियमों के तहत जरूरी समझौते पत्र पर हस्ताक्षर नहीं किए थे.

अपनी स्वायत्तता पर हुए इस हमले को सुलटाने के लिए प्रसार भारती ने संसद में जाने की गुहार लगाई है, जहां से उसका जन्म हुआ था. सवाल यह है कि क्या प्रसार भारती एक स्वायत्त संस्था बन भी पाई है या नहीं. अधिनियम के तहत कहा गया था कि तमाम फंड और संपत्तियां और आकाशवाणी और दूरदर्शन के सभी कर्मचारियों का बोर्ड को हस्तांतरण किया जाए और भर्ती बोर्ड की स्थापना की जाए जो दोनों संस्थानों में अधिकारियों और कर्मचारियों की नियुक्ति की व्यवस्था करे.

अधिनियम के चैप्टर 2(4) में कहा गया है कि प्रसार भारती से जुड़े सभी मामलों की देखरेख करने, प्रबंधन करने और उनका निर्णय करने का सामान्य और अंतिम अधिकार प्रसार भारती बोर्ड के पास ही होगा. लेकिन जानकारों का कहना है कि अपनी स्थापना के दो दशक बाद भी आज तक प्रसार भारती को अधिनियम के अनुसार कर्मचारियों, अधिकार और संपत्तियों का हस्तांतरण नहीं किया गया है. अभी तक अपने बजट के लिए यह सरकार पर ही निर्भर है. न ही यह स्वतंत्र रूप से अधिकारियों और कर्मचारियों की नियुक्ति कर सकता है और न ही हार्डवेयर या सॉफ्टवेयर खरीद सकता है.

अब तक समय-समय पर भेजी गई कई पत्रावलियों और निर्देशों से सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने यह अनिवार्य बना दिया है कि प्रसार भारती को अपने हर प्रस्ताव और फैसलों के लिए कई समितियों और विभागों की मंजूरी लेनी होती है और उनकी दया का मोहताज बनना होता है. अभी तक उस भर्ती बोर्ड की स्थापना भी नहीं की गई है जिसे निगम बनने के पहले ही अस्तित्व में आ जाना चाहिए था.     

इन बुनियादी मुश्किलों और अंतर्विरोधों के बीच प्रसार भारती का काम चल रहा है. और थोड़ी देर के लिए अगर मौजूदा विवाद को छोड़ भी दें, तो कार्यक्रमों और प्रसारण में प्रसार भारती सार्वजनिक हित में कितना काम करता है और कितना सरकारी और पार्टी हित में, यह कोई छिपी बात नहीं है क्योंकि सरकारी भोंपू के रूप में इस पर लगा ठप्पा हटा नहीं है. शासकीय कामकाज की पारदर्शिता और स्वायत्तता, लोकतांत्रिक व्यवस्था को मजबूत बनाती है और नागरिकों का उसमें विश्वास भी गढ़ती है. लेकिन प्रसार भारती के साथ मंत्रालय का मौजूदा टकराव, लोकतांत्रिक मूल्यों को ही चोट पहुंचाता है. फिलहाल यही लगता है कि सरकार को प्रसार भारती का स्वायत्त ढांचा रास नहीं आ रहा है. और प्रसार भारती का संकट यह है कि वह दुर्दशा के लिए कोसे तो किसे.

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