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ब्लॉग

भारत का सिरदर्द नवाज शरीफ नहीं, राहील शरीफ हैं

उड़ी हमले के तीन दिन बाद भी भारत तय नहीं कर पाया है कि पाकिस्तान को वह क्या जबाव दे, जबकि पाकिस्तानी सेना के प्रमुख जनरल राहील शरीफ कह चुके हैं कि वो हर खतरे का मुकाबला करने को तैयार हैं.

भारत में ऐसे लोगों की कोई कमी नहीं है जो अपने 18 सैनिकों की मौत का बदला चाहते हैं. पाकिस्तान की सरकार भले ही कितना इनकार करे, उड़ी हमले के लिए ज्यादातर भारतीयों की नजर में वही जिम्मेदार है. भारत सरकार भी यही बात कर रही है, लेकिन बात जब ‘पाकिस्तान को सबक सिखाने की' आती है, तो विकल्प बहुत ही सीमित हैं और शायद कोई स्पष्ट फैसला में देरी की वजह भी यही है. वरना प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को राजनीतिक गलियारों से लेकर सोशल मीडिया तक पर इतने ताने सुनने को नहीं मिलते.

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लेकिन भारत की यही कशमकश पाकिस्तान और खास कर पाकिस्तानी सेना के हक में जाती है. भारत तय भी नहीं कर पाया है कि वो पाकिस्तान को क्या जबाव देगा, लेकिन जनरल राहील शरीफ ने हर कीमत पर देश की रक्षा का वादा कर फिर पाकिस्तानी लोगों का जरूर दिल जीत लिया होगा. हीरो तो लोग उन्हें पहले से ही मानते हैं. पाकिस्तान में मीडिया और सोशल मीडिया तो छोड़िए, ट्रकों तक पर राहील शरीफ के पोर्ट्रेट बने आपको मिल जाएंगे. पाकिस्तान में कहने को अभी लोकतंत्र है, लेकिन ‘राहील शरीफ अब तो आ जाओ' की फरियाद के साथ उनसे देश की सत्ता अपने हाथ में लेने की गुजारिश करने वालों की कमी नहीं है.

वैसे बात सिर्फ राहील शरीफ की नहीं है, बल्कि पाकिस्तानी सेना की है, जिस पर जनता को राजनेताओं से ज्यादा भरोसा रहा है. ज्यादातर लोगों की नजर में राजनेता भ्रष्ट हैं जबकि देश की असली रक्षक पाकिस्तान की सेना है. भारत जैसे पड़ोसी का डर हमेशा सेना पर लोगों के भरोसे को मजबूत करता है. भारत में जब भी किसी बड़े हमले के बाद पाकिस्तान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई की बात उठती है, तो सबको यहीं चिंता सताती है कि जंग कहीं परमाणु युद्ध में न तब्दील हो जाए. पाकिस्तानी जनता के लिए भारत अगर उनके देश पर हमला करने से पहले सौ बार सोचता है तो इसकी वजह सिर्फ सेना और उसके बनाए परमाणु हथियार हैं. पाकिस्तानी लोग परमाणु बम तैयार करने का श्रेय किसी राजनेता से कहीं ज्यादा सेना को देंगे.

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फिलहाल पाकिस्तान की बागडोर प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के हाथ में है, लेकिन इस बात से किसी को इनकार नहीं कि देश की रक्षा और विदेश नीति से जुड़े सभी फैसले रावलपिंडी के सेना मुख्यालय में लिए जाते हैं. और ऐसा अब नहीं, बल्कि हमेशा से होता आया है. कई बार सैन्य जनरलों ने देश की बाकायदा बागडोर अपने हाथ में ली है, और जब सत्ता सीधे तौर पर उनके हाथ में नहीं होती है, तब भी बड़े फैसले उनकी मर्जी के बिना नहीं होते. देश के संसाधनों पर पहला हक सेना का माना जाता है. और इस सबके पीछे सिर्फ भारत से डर का मनोविज्ञान दिखाई पड़ता है.

जहां सेना का शासन में इतना दखल होगा, वहां लोकतांत्रिक संस्थाएं मजबूत नहीं हो सकतीं. इसलिए पाकिस्तान के मामले में भारत की चुनौती नवाज शरीफ नहीं बल्कि राहील शरीफ है. वैसे भी मोदी और नवाज शरीफ ने तो शुरू शुरू में एक दूसरे से खूब दोस्ती गांठने की कोशिश की. लेकिन फिर, पहले पठानकोट और अब उड़ी के हमले ने तय कर दिया है कि भारत-पाकिस्तान रिश्तों की गाड़ी फिलहाल तो आगे नहीं बढ़ रही है.

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भारत में पाकिस्तान के खिलाफ जंग की आवाजें जितनी बुलंद होगी, पाकिस्तानी सेना के हाथ उतने मजबूत होंगे, और पाकिस्तान सरकार के कमजोर. ये बात दोतरफा रिश्तों में आड़े आती है. आजादी के बाद भारत में जहां लोकतांत्रिक संस्थाओं की जड़ें लगातार गहरी हुई हैं, वहीं पाकिस्तान में चुनी हुई सरकारों को हमेशा सेना की पसंद नापसंद का ख्याल रखना पड़ता है. आखिर में, कुछ पाकिस्तानी दोस्तों का जुमला याद आ रहा है जो मजाक में कहते हैं कि ‘हर देश के पास एक सेना होती है, लेकिन पाकिस्तान में सेना के पास एक देश है'.

ब्लॉग : अशोक कुमार

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