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ब्लॉग

अखिलेश-मुलायम का झगड़ा भारत के लिए जरूरी है

समाजवादी पार्टी का झगड़ा पिता पुत्र या पार्टी के दो सत्ता केंद्रों का झगड़ा नहीं है. यह पीढ़ियों का झगड़ा है. भारत के लिए इस तरह के झगड़े जरूरी हैं.

समाजवादी पार्टी में इस समय वही हो रहा है जो सालों से हर परिवार में हो रहा है. एक पीढ़ी जो अपने बच्चों को वयस्क मानने से लगातार इंकार कर रही है. एक पीढ़ी जो अपने फायदे के लिए बुजुर्ग पीढ़ी को बर्दाश्त किए जा रही है भले ही वे गलत क्यों न हों. मुलायम सिंह की दलीलों में यही वर्चस्व दिखता है. "अखिलेश को मैंने मुख्यमंत्री बनाया," "यदि अमर सिंह नहीं होते तो मैं जेल में होता,” "मैं शिवपाल के काम को भूल नहीं सकता.” मुलायम सिंह यादव अखिलेश यादव के मुख्यमंत्री बनने के बाद भी राजनीतिक तौर पर पार्टी प्रमुख के बदले पिता वाली भूमिका में रहे हैं.

यह समस्या ऐसी है जिसे सिर्फ भारत के ही लोग नहीं भारत के संपर्क में आने वाले विदेशी भी महसूस कर रहे हैं. अकसर जर्मनी के मैनेजर ये पूछते मिल जाएंगे कि भारतीय युवा अपना फैसला क्यों नहीं ले सकते. क्यों प्रोमोशन या ट्रांसफर से पहले उन्हें अपने पिता से पूछना पड़ता है? क्यों लड़कियां इंजीनियर डॉक्टर बनने के बावजूद अपने करियर का फैसला खुद नहीं कर सकते? विदेशी परिवार की इस जकड़ को भारतीय पेशेवरों की कमजोरी के रूप में देखते हैं.

तस्वीरों में देखिए: किन किन पर फेंके गए जूते

आधुनिक विश्व में भारत को यदि बराबरी की जगह बनानी है, या उसे नेतृत्व देना है तो युवा वर्ग को बुजुर्गों के लिए इज्जत बनाए रखते हुए इस बंधन को तोड़ना होगा. अखिलेश यादव ने इसकी शुरुआत की है. राजनीतिक पार्टियों में भले ही परिवारों का वर्चस्व हो, वे सदस्यों वाली लोकतांत्रिक संस्थाएं हैं जिन्हें लोकतांत्रिक सहमति के हिसाब से चलाया जाना चाहिए न कि व्यक्तिगत फायदा पहुंचाने वालों को फायदा बांटने की मशीन बनाकर. लोकतंत्र में राजनीतिक दलों को चुनाव में बहुमत पाकर सरकार चलाने की जिम्मेदारी दी जाती है ताकि वे देश और समाज को आगे ले जा सकें न कि इसलिए कि वे चुनाव जीतने वाले एक छोटे से गुट को फायदा पहुंचाएं. मुलायम सिंह यही करते नजर आ रहे हैं. इस विवाद ने उनकी संपूर्ण राजनीतिक पूंजी को दाव पर लगा दिया है.

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अखिलेश यादव पर अब पार्टी को सही मायने में लोकतांत्रिक बनाने की जिम्मेदारी है. उनके राजनीतिक कौशल की परीक्षा इसी बात में है कि वे ऐसा कर पाते हैं या नहीं. अगर वे ऐसा कर पाते हैं तो दूसरी पार्टियों को भी व्यक्तिवाद के चंगुल से निकाल कर लोकतांत्रिक बनाने का रास्ता साफ होगा. अब ये चाहे डीएमके हो, कांग्रेस हो या बीजेपी को भी परिवारवाद की जद में लाने की कोशिशें हों. तब परिवार के युवा सदस्य अपने करियर के बारे में स्वयं फैसला कर पाएंगे. पिता की विरासत बचाने के लिए उन्हें पिता या परिवार के पेशे में कूदने की जरूरत नहीं रहेगी. तब नेताओं के बच्चे किसान बनेंगे, अभिनेताओं के बच्चे फूल बेचेंगे और कारोबारियों के बच्चे सरकारी अधिकारी बनेंगे. कमाने वाले पेशों को परिवारों के हाथ से बाहर निकालने के बाद ही बराबरी आएगी, तभी अमीर गीरब का भेद मिटना शुरू होगा, तभी जातिवाद के बंधन टूटने शुरू होंगे. भारत के लिए ये एक जरूरी फैसला है.

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