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दुनिया

देह का नहीं, मन का कालापन मिटाने की जरूरत

फिल्म अभिनेत्री तनिष्ठा चटर्जी ने एक भारतीय मनोरंजन टीवी चैनल के चर्चित कॉमेडी शो में अपने साथ हुए बर्ताव के बाद समाज में व्याप्त पूर्वाग्रहों का मु्द्दा सामने ला दिया है.

ये सिर्फ टीवी में फूहड़ कॉमेडी का मामला नहीं है बल्कि समाज में गहरी जड़ें जमाए पूर्वाग्रह का भी है. कॉमेडियन भी चाहे-अनचाहे और शो की टीआरपी के चक्कर में इन पूर्वाग्रहों का फायदा उठाते नजर आते हैं.

तनिष्ठा के साथ जो हुआ उसे एकबारगी तो ये कहकर खारिज कर देना आसान है कि वह मामले पर तिल का ताड़ बना रही हैं या अपनी नई फिल्म पार्च्ड के लिए पब्लिसिटी स्टंट कर रही हैं. जैसा कि बुजुर्ग अभिनेता प्रेम चोपड़ा ने खबरों के मुताबिक कह भी दिया है. लेकिन ध्यान देने वाली बात ये है कि तनिष्ठा को पार्च्ड फिल्म के लिए इस तरह का प्रचार करने या पाने की जरूरत नहीं होगी और दूसरे ये तिल का ताड़ इसलिए नहीं लगता क्योंकि अगर वह इस बारे में चुप रह जातीं तो इसे एक स्वाभाविक मजाक या तीखे हास्य के रूप में ले-देकर भुला दिया जाता है.

लेकिन तनिष्ठा ने सही समय पर ये मुद्दा उठाया क्योंकि इस बार निशाने पर वह खुद या यूं कहें उनकी त्वचा या उनकी त्वचा का रंग था. शो के कॉमेडी मेजबानों का उन पर किया गया व्यंग्य हल्के-फुल्के अंदाज में लेना इसलिए मुश्किल है क्योंकि उसमें अंतर्निहित टोन, विचार और मानसिकता उस ग्रंथि से निकली है जो भारत देश में निरंतर फूलती जा रही है. ये ग्रंथि गोरेपन की अभिलाषा से जुड़ी है. इस मध्यवर्गीय चाहत का एक सिरा जातिवाद से भी जुड़ता है और श्रेष्ठता ग्रंथि से भी. गोरापन समस्याओं का एक निदान मान लिया जाता है. ये भी मान लिया जाता है कि जो गोरा है वह निश्चित ही उच्चतर जाति से होगा. जो सांवला या काला है वह निम्न जाति का ही होगा. तनिष्ठा ने अपने साथ एक पुराने वाकये का जिक्र किया है जहां उनकी जाति और उनके रंग में परस्पर संबंध जोड़ने और सवाल उठाने की कोशिश की गई थी. और उनसे पहले और भी अभिनेत्रियां ये दंश झेल चुकी हैं, चाहे स्मिता पाटिल हों या नंदिता दास.

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गोरी त्वचा न होने का जो मलाल आम भारतीय परिवारों में देखा जाता है उसकी चपेट में सबसे ज़्यादा लड़कियां ही आती हैं. उनकी कद्र घट जाती है और उन्हें कई तरह की अप्रिय स्थितियों का सामना करना पड़ता है. तनिष्ठा के साथ जो हुआ वो सोचिए आए दिन कितनी सांवली लड़कियों के साथ गुजरता होगा. उन्हें कितने शब्दबाण और तिरछी नजरें सहनी पड़ती होंगी. जब आप इस तरह के सार्वजनिक मजाक करते हैं तो आप एक तरह से उन पूर्वाग्रहों को भी जगह देते हैं जो मान्यता और परंपरा के नाम पर लाखों करोड़ो भारतीय घरों में स्त्री शोषण का कारण बने हुए हैं. क्या कॉमेडियन इतनी दूर तक सोच पाए होंगे कि वे जो कह रहे हैं या भद्दा मजाक उड़ा रहे हैं उसका कितना दूरगामी असर होगा. और यही वो बात है जिसकी वजह से आधुनिकता आ नहीं पाती. लाख हवा भर दीजिए, लाख शीशे चमका लीजिए- कहे आप पिछड़े और दकियानूसी ही जाएंगे क्योंकि आप जाति, रंग और लिंग के आधार पर पूर्वाग्रह वाला समाज हैं.

मध्यवर्ग में गोरेपन की चाहत के लिए उकसाने और उत्तेजित करने वाला वो बाजार भी है जहां हर चीज एक उत्पाद की शक्ल अख्तियार कर लेती है. भावनाएं भी. लिहाजा गोरेपन को श्रेष्ठता और अच्छाई से जोड़ देते हैं और कालेपन को कमजोरी और बुराई से. फेयरनेस की क्रीमों से बाजार अटा पड़ा है. जिस सिने दुनिया की प्रतिनिधि तनिष्ठा हैं उसी सिने दुनिया के कई अदाकार उन उत्पादों को बेचते देखे जाते हैं जो गोरेपन की गारंटी देते हैं और उसे ही सफलता की गारंटी भी कहते हैं. कहीं किसी की आत्मा नहीं डिगती. बाजार और मुनाफे और मोटी फीस में भला आत्मा का क्या काम. 1978 में बहुराष्ट्रीय कंपनी यूनिलीवर ने फेयर एंड लवली नाम की क्रीम लॉन्च की थी. उसके बाद तो इस बाजार ने ऐसी भीषण चाहत पैदा कर दी कि फेयरनेस की इस क्रीम का विस्तार फेस क्लीन्सर, शावर जेल, और यहां तक कि वेजीना वॉश जैसे उत्पादों तक होता चला गया. द गार्डियन अखबार में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत में त्वचा के गोरेपन को लक्षित बाजार 2010 में 43 करोड़ डॉलर से भी ज्यादा का था और ये करीब 18 फीसदी की दर से हर साल बढ़ रहा है. इसी से आप अंदाजा लगा सकते हैं कि भारतीय मध्यवर्ग किस भीषण ऑब्सेशन का शिकार हुआ है. देह के कालेपन को मिटाने की उसकी कामना विकराल होती जा रही है.

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‘डार्क इज़ ब्यूटीफुल' नाम से एक अभियान भी इस रवैये के विरोध में छेड़ा गया है. नंदिता दास इसमें प्रमुखता से शामिल हैं. ऐसे पूर्वाग्रहों से आमने सामने की लड़ाई लड़नी होगी. लड़कियां शिक्षित होंगी, अपने पैरों पर खड़ी होंगी, स्वाभिमानी बनेंगी तो वे इन पाखंडों को ध्वस्त करने का साहस रख पाएंगी. अभिभावक और मां-बाप अपने बच्चों को उनकी प्रतिभा से आंकें, उनके रंग से नहीं. उनके भीतर प्रतिभा विकसित करें, स्कूलों को भी इस काम में आगे आना होगा. आज वैल्यू एजुकेशन के नाम पर कक्षाएं तो खूब हैं लेकिन उनमें अब, कुछ इस बाजार के दौर में पनप आए पूर्वाग्रहों से लड़ने के सबक भी जोड़ने चाहिए. उन उत्पादों पर फौरन प्रतिबंध लगना चाहिए जो त्वचा के गोरेपन का दावा करते हैं, हालांकि इस बारे में एक लड़ाई जारी है फिर भी ऐसे उत्पादों को लेकर सरकारों के कानून सख्त होने चाहिए. एडवरटाईज़िंग स्टैंडर्ड काउंसिल ऑफ इंडिया, एएससीआई जैसी आधिकारिक संस्थाओं को विज्ञापनों को लेकर अपनी गाइडलाइन्स और सख्त करनी होंगी. मुक्त बाजार के नाम पर सरकार ने अगर कई चीजों को छूट नहीं दी है तो फिर ऐसे उत्पादों को छूट क्यों? लोग क्या खाएं, क्या पहनें इस पर तो डंडा और नैतिकताई दोनों चले आते हैं लेकिन ऐसे उत्पादों पर ये दुहाई कहां छुप जाती है जो सीधे सीधे हमारी मानवीय गरिमा को चोट पहुंचा रही हैं? त्वचा के कालेपन को मिटाना है या जेहन के कालेपन को, ये तय करने का वक्त फिर कब आएगा?

आज तक न केंद्र न राज्य सरकार, किसी का भी कोई ऐसा प्रत्यक्ष अभियान नहीं नजर आता जो इस रवैये के खिलाफ लोगों को प्रेरित या जागरूक बनाता हो. मीडिया में भी ऐसी कार्रवाइयां लगभग नगण्य हैं. हां सिलेब्रिटी स्तर पर कुछ आयोजन हो जाए तो उसकी चर्चा हो जाती है लेकिन इसे एक जनजागरण अभियान तो अभी तक किसी ने बनाया नहीं है जबकि इन्हीं मीडिया कंपनियों के विभिन्न माध्यमों पर एक से एक चमकदार अभियानों के झंडे लहराते दिख जाते हैं. अखबारों में शादियों के विज्ञापनों का एक बहुत बड़ा बाजार है जो अब फैलता हुआ ऑनलाइन दुनिया में भी पसर चुका है. वहां वर-वधू के लिए एक तरह से पात्रता की शर्तें लिख दी जाती हैं. खासकर वधू के मामले में- गोरेपन की मांग आपको हर दूसरे या तीसरे विज्ञापन में दिख जाएगी. ये कब बंद होगा? गोरेपन की लालसा और कालेपन की खिल्ली उड़ाने की ये मानसिकता बताती है कि चहुंमुखी तरक्की के दावे करता देश, वैचारिक स्तर पर अभी कितना पीछे चल रहा है.

ब्लॉगः शिवप्रसाद जोशी

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