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दुनिया

आनंदीबेन के जाने का मतलब अमित शाह की जीत!

गुजरात में आनंदीबेन के जाने का मतलब सिर्फ नए मुख्यमंत्री का आना नहीं है, बहुत कुछ दांव पर लग गया है. खुद नरेंद्र मोदी की प्रतिष्ठा दांव पर है.

गुजरात की मुख्यमंत्री आनंदीबेन पटेल के इस्तीफे से इस समृद्ध राज्य की राजनीति में खलबली मच गई है क्योंकि उनके उत्तराधिकारी का चयन करना बहुत आसान काम नहीं है. हालांकि पिछले कुछ महीनों के दौरान आनंदीबेन की राजनीतिक स्थिति लगातार कमजोर होती जा रही थी लेकिन उनकी हरचंद कोशिश यही थी कि वे मुख्यमंत्री के पद पर बनी रहें. लेकिन भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय नेतृत्व, जिसका अर्थ इन दिनों प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पार्टी अध्यक्ष अमित शाह है, ने उन्हें हटाने का मन बना लिया था. आनंदीबेन इस समूचे घटनाक्रम से कितनी आहत थीं यह उनके इस्तीफा देने के तरीके और उसके बाद टीवी पर दिये गए बयान से स्पष्ट है. हालांकि उन्होंने इस्तीफे का कारण यह बताया है कि वे 75 वर्ष की होने वाली हैं और अगले वर्ष गुजरात में होने जा रहे विधानसभा चुनाव में पार्टी का नेतृत्व किसी अपेक्षाकृत युवा व्यक्ति को करना चाहिए, लेकिन असल कारण यही है कि मोदी और शाह इस नतीजे पर पहुंच गए थे कि अब आनंदीबेन का जाना ही बेहतर होगा.

यह एक सर्वविदित तथ्य है कि नरेंद्र मोदी के सबसे निकट के सहयोगी माने जाने के बावजूद अमित शाह और आनंदीबेन के बीच छत्तीस का आंकड़ा है. पार्टी अध्यक्ष होने के बावजूद अमित शाह उनको मुख्यमंत्री बनने से नहीं रोक पाये क्योंकि मोदी को आनंदीबेन पर ही सबसे अधिक भरोसा था. लेकिन पिछले एक साल से गुजरात का राजनीतिक घटनाचक्र जिस तरह से घूमा है, उसे देखते हुए आनंदीबेन की रुखसती तय ही थी.

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पाटीदारों के आंदोलन को उग्र होने से रोकने में आनंदीबेन पूरी तरह से विफल रहीं. उनकी विफलता राजनीतिक और प्रशासनिक, दोनों ही स्तरों पर थी. उन्हें इस आंदोलन के पीछे पार्टी के भीतर के अपने राजनीतिक विरोधियों की साजिश नजर आती थी. शायद इसमें कुछ सत्यांश भी हो लेकिन समूचा सच इसके विपरीत ही था. मुख्यमंत्री के नाते आनंदीबेन इस आंदोलन को काबू में करने में पूरी तरह से नाकाम रहीं. उधर राज्य में दलितों पर हमले बढ़ रहे थे जिनकी परिणति 11 जुलाई को ऊना के पास हुई एक घटना में हुई जिसमें तथाकथित गोरक्षकों ने दलितों को बांध कर सरेआम बर्बरतापूर्वक पीटा. इसके पहले भी गुजरात में कई स्थानों पर ऐसी ही घटनाएं घट चुकी थीं, लेकिन ऊना की घटना ने बारूद के ढेर में चिंगारी का काम किया और इसकी न केवल गुजरात में बल्कि पूरे देश में व्यापक प्रतिक्रिया हुई. इसे राजनीतिक विरोधियों के खाते में डालना आनंदीबेन के लिए बहुत मुश्किल था.

नरेंद्र मोदी इस बात से भी चिंतित बताए जाते थे कि मुख्यमंत्री के बेटे-बेटियों पर भ्रष्टाचार और सरकारी कामकाज में हस्तक्षेप करने की लगातार शिकायतें आ रही थीं. इसलिए ऊना की दलित-विरोधी घटना के बाद तय हो गया कि आनंदीबेन को जाना ही होगा.

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पटेल को हटाकर यदि पटेल को ही मुख्यमंत्री न बनाया गया तो पूरे पटेल समुदाय के बीजेपी के खिलाफ हो जाने का खतरा है. पाटीदारों यानी पटेलों के जबर्दस्त आंदोलन के बाद तो यह खतरा और अधिक बढ़ गया है. इसीलिए नितिन पटेल के मुख्यमंत्री बनने की संभावना पर चर्चा शुरू हो गई है. विजय रुपेन और भूपेन्द्र सिंह चूड़ासमा के नाम भी चर्चा में हैं. नितिन पटेल आनंदीबेन के समुदाय से ही हैं लेकिन आनंदीबेन से उनकी भी नहीं बनती. यदि अपने उत्तराधिकारी के चयन में भूमिका निभाने की छूट मिली तो आनंदीबेन नितिन पटेल का मुख्यमंत्री बनना पसंद नहीं करेंगी. विजय रुपेन की संघ में भी जड़ें मजबूत हैं और वे राज्य बीजेपी के अध्यक्ष भी हैं. लेकिन विधानसभा चुनाव से ठीक पहले पटेल के बाद जैन को मुख्यमंत्री बनाना जनता के बीच सही संदेश नहीं भेजेगा. चूड़ासमा का नाम हाल ही में एक भ्रष्टाचार के मामले में उछला था.

गुजरात बीजेपी तो अमित शाह को मुख्यमंत्री के रूप में देखना पसंद करेगी लेकिन शाह ने स्पष्ट कर दिया है कि वे राष्ट्रीय राजनीति छोडकर प्रदेश की राजनीति में नहीं आएंगे. अगले कुछ दिनों में तय हो जाएगा कि गुजरात में बीजेपी को अगले विधानसभा चुनाव में कौन नेतृत्व देगा और किसे मुख्यमंत्री के रूप में पेश किया जाएगा. गुजरात में बीजेपी और मोदी की प्रतिष्ठा दांव पर लगी है.

ब्लॉग: कुलदीप कुमार

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