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दुनिया

कहां गायब हो जाते हैं रईस

भारत में अमीरों को ढूंढना कोई मुश्किल काम नहीं. किसी भी बड़े मॉल में चले जाइए एक नहीं हजारों मिलेंगे. केवल इतना ध्यान रखना है कि आय कर देने का वक्त न हो, साल में इस समय अमीर लापता हो जाते हैं.

इसी साल फरवरी में जब वित्त मंत्री पी चिदंबरम बजट पेश कर रहे थे तो उन्होंने यह कह कर लोगों को हैरान कर दिया कि भारत में सिर्फ 42,800 लोग ऐसे हैं जिनकी सालाना आमदनी एक करोड़ रुपये से ज्यादा है. 120 करोड़ की आबादी वाले देश में बीते कई सालों की तेज आर्थिक प्रगति ने हजारों अरबपतियों को पैदा किया है.

पैसा होने के बाद भी टैक्स न देने की वजह से भारत सरकार को हर साल पैसे की भारी कमी से जूझना पड़ता है. मुंबई की आर्थिक सलाह देने वाली कंपनी के सीईओ जमाल मेकलाई कहते हैं, "टैक्स न देना एक तरह से अमीर लोगों का स्वभाव बन गया है." अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्था क्रेदी सुइस के 2012 के अनुमान के मुताबिक 1,58,000 अरबपति भारतीय हैं.

धोखा देते रईस

हालांकि कई जानकार मानते हैं कि यह संख्या और बड़ी है. मैकलाई के मुताबिक ज्यादातर भारतीय सरकार को धोखा देते हैं. भारत में फिलहाल टैक्स की सर्वोच्च दर 30 फीसदी है. हालांकि सिर्फ बड़े लोग ही टैक्स न देते हों, यह पूरी तरह सच नहीं. अधिकारियों के मुताबिक भारत की कुल आबादी के महज तीन फीसदी लोग आय कर जमा करते हैं. इनमें से केवल 15 लाख लोग ऐसे हैं, जो यह मानते हैं कि उनकी सालाना आमदनी 10 लाख रुपये से ज्यादा है.

टैक्स न देने वाले लोगों के पास इसका एक वाजिब कारण है. देश की आधी से ज्यादा आबादी की आमदनी इतनी कम है कि उन्हें टैक्स नहीं देना पड़ता. अमीरों की लगातार बढ़ती तादाद के बावजूद देश में अभी भी 40 करोड़ से ज्यादा लोग गरीबी रेखा के नीचे हैं. लाखों लोग टैक्स के दायरे से इसलिए भी बाहर हैं क्योंकि खेती से होने वाली आय पर टैक्स नहीं देना पड़ता चाहे कमाई कितनी भी हो. भारत में करोड़ों छोटे किसान हैं और उनके अलावा अमीर किसानों की एक ताकतवर जमात भी है जिन्हें टैक्स के दायरे में लाने का साहस राजनेताओं के पास नहीं. इसके अलावा लोगों को टैक्स से बचाने वाले कई दूसरे नियम कायदे भी हैं.

मध्यम वर्ग पर मार

आय कर देने वाले ज्यादातर लोगों में वेतनभोगी कर्मचारी हैं जिनकी कंपनियां सुनिश्चित करती हैं कि उनकी आमदनी से टैक्स का हिस्सा काट कर सरकारी खजाने तक पहुंच जाए. यह कर्मचारी भी फर्जी बिल दिखा कर जितना मुमकिन हो टैक्स बचाने की कोशिश करते हैं. लेकिन पूरी तरह से टैक्स बचा पाना इनके लिए संभव नहीं होता. सबसे ज्यादा गड़बड़ी करने वाले लोग हैं खानदानी व्यापारी से लेकर डॉक्टर, वकील और स्वतंत्र रूप से काम करने वाले छोटे व्यापारी, जो नगद लेन देन करते हैं और अगर चाहें तो अपनी कमाई का बड़ा हिस्सा बहुत आसानी से छिपा ले जाते हैं.

टैक्स के दायरे में न आने वाली भारत की छिपी हुई अर्थव्यवस्था कितनी बड़ी है और सरकार को कितना नुकसान होता है यह बड़ी बहस का मुद्दा है. हालांकि इसे छोड़ दें तो भारत के कानूनी दायरे में आने वाली अर्थव्यवस्था का आकार भी काफी बड़ा है. फिलहाल भारत की जीडीपी 2000 अरब डॉलर की है. जानकारों की राय है कि भारत की अर्थव्यवस्था का 17 से 42 फीसदी हिस्सा सरकारी आंकड़ों से परे है.

Stadtteil Malad von Mumbai in Indien Flash-Galerie

माना जाता है के भारत के लोगों ने अरबों डॉलर की रकम स्विट्जरलैंड, सिंगापुर और दूसरे देशों में छिपा रखी है. इसके बाद मॉरीशस का एक अनोखा ही मामला है. हिंद महासागर के इस छोटे से देश से भारत में सीधे विदेशी निवेश का सबसे ज्यादा 40 फीसदी हिस्सा आता है. भारत ने मॉरीशस के साथ टैक्स की एक संधि कर रखी है जो कानूनी रूप से बड़ी मात्रा में पैसा आने का रास्ता बनाती है. भारत के अमीर अपना पैसा चोरी छिपे मॉरीशस भेजते हैं और फिर कानूनी रास्ते से उसी पैसे को विदेशी निवेश के जरिए वापस देश में मंगा लेते हैं.

मुश्किल नहीं पकड़ना

सरकार चाहे तो बड़ी आसानी से इन लोगों को घेरे में ले सकती है. पिछले साल देश में 25,000 लक्जरी गाड़ियां बिकीं. इसके अलावा करोड़ों रुपये के आलीशान फ्लैट और लाखों डॉलर के क्रेडिट कार्ड का बिल देने वाले भी कम नहीं हैं लेकिन फिर भी कुछ होता नहीं दिख रहा. सरकार का कहना है कि उसने हाल के दिनों में कुछ बड़े खरीदारों पर नजर गड़ाई है और उन्हें ईमेल से बताया है कि हो सकता है कि उन्होंने टैक्स न दिया हो. कुछ लोग तो मानते हैं कि टैक्स अधिकारी इन दिनों बड़े आक्रामक हो गए हैं.

जमाल मैकेलाई का कहना है, "टैक्स चोरों को पकड़ना कोई मुश्किल काम नहीं है. बस उसके लिए एक तंत्र बनाना होगा." इस पूरे खेल में भ्रष्टाचार भी एक बड़ी भूमिका निभा रहा है. नई दिल्ली के एक कारोबारी कहते हैं, "निश्चित रूप से मैं अपने सारे कर नहीं चुकाता. मैं क्यों कर दूं जब नेता हर गुजरते दिन के साथ अमीर होते जा रहे हैं."  इस तरह की बातचीत बहुत आम बात है और लोग इसे ही टैक्स चोरी के पीछे दलील देते हैं. टैक्स की इस चोरी पर किसी को शर्म नहीं.

एनआर/एजेए(एपी)

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