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दुनिया

AFSPA पर अब तक का सबसे तीखा हमला

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि सेनाएं विशेषाधिकार कानून का बेजा इस्तेमाल नहीं कर सकतीं. पहली बार इस कानून को लेकर ऐसी तीखी टिप्पणी की गई है.

भारत में सेना को चुने हुए इलाकों में विशेष अधिकार देने वाले कानून एएफएसपीए पर यह सबसे तीखा हमला कहा जा सकता है. देश के सर्वोच्च न्यायालय ने कहा है कि सेना और अर्द्धसैनिक बल उन इलाकों में भी अतिशय बल का इस्तेमाल नहीं कर सकते जहां उन्हें विशेषाधिकार कानून एएफएसपीए के तहत अतिरिक्त अधिकार हासिल हैं. सुप्रीम कोर्ट ने मणिपुर में 1528 कथित फर्जी मुठभेड़ों के बारे में भी जानकारी मांगी है.

कोर्ट ने कहा कि बीते दो दशकों में हुईं इन मुठभेड़ों की जांच एक स्वतंत्र एजेंसी द्वारा की जानी चाहिए. हालांकि कोर्ट को इस बात से भी आपत्ति नहीं है कि सेना इन मुठभेड़ों की जांच खुद करे.

आर्म्ड फोर्सेस स्पेशल पावर्स ऐक्ट देश के अशांत क्षेत्रों में सेना को अतिरिक्त अधिकार देता है. इसके तहत सेना लोगों को बिना किसी वारंट के गिरफ्तार कर सकती है. किसी भी जगह छापे मार सकती है. और इस दौरान जवाबी कार्रवाई में हथियारों का इस्तेमाल भी कर सकती है. लेकिन मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि इस कानून का गैरवाजिब इस्तेमाल होता है.

यह कानून जम्मू कश्मीर और उत्तर पूर्वी भारत में लागू है. और इसका विरोध लंबे समय से हो रहा है. मणिपुर की मानवाधिकार कार्यकर्ता शर्मिला इरोम इस कानून को हटाए जाने की मांग को लेकर 14 साल से भूख हड़ताल पर हैं.

मणिपुर में कथित फर्जी मुठभेड़ों में मारे गए लोगों को परिवार वालों द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई के बाद जस्टिस मदन बी लोकर और जस्टिस आर के अग्रवाल की बेंच ने कहा कि सैन्य बलों की नियमावली में बहुत सी बातें लिखी हैं और उन्हें नजरअंदाज करने या जांच और कार्रवाई के दौरान नियमों को तोड़ने को कतई सही नहीं ठहराया जा सकता. सुप्रीम कोर्ट ने मुठभेड़ के मामलों की जांच के लिए जस्टिस हेगड़े की अध्यक्षता में एक आयोग बनाया था. इस आयोग ने 62 में से 15 मामलों पर सवाल उठाया था. लेकिन जब मानवाधिकार आयोग ने इन्हीं मामलों की जांच की तो पाया कि कम से कम 31 मामले ऐसे थे जिनमें मुठभेड़ ईमानदार नहीं थी. अब सुप्रीम कोर्ट ने इन 62 मामलों की फिर से जांच को कहा है.

वैसे कोर्ट ने फर्जी मुठभेड़ करने वाले सैन्य अफसरों के कोर्ट मार्शल की बात नहीं की और इस पर कार्रवाई की जिम्मेदारी जांच एजेंसियों पर ही छोड़ दी है. लेकिन उसने केंद्र सरकार से इस बात पर सवाल जरूर पूछा है कि राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग एक 'दंतहीन बाघ' क्यों बन गया है. इस मामले पर सुनवाई एक महीने बाद होगी.

मणिपुर में फर्जी मुठभेड़ों को लेकर लगातार आवाज उठती रही है. सेना, सीआरपीएफ और पुलिस के कमांडो ऐसे आरोपों से घिरे रहे हैं. हाल ही में स्थानीय रिटायर्ड और पदासीन जजों की एक जांच कमिटी की रिपोर्ट ने इस विरोध को और भड़काया. इस रिपोर्ट में कहा गया कि सेना और पुलिस के जवान कई मामलों में फर्जी मुठभेड़ों में शामिल रहे. 2014 में यह रिपोर्ट राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को सौंपी थी. दरअसल, 2012 में फर्जी मुठभेड़ों में मारे गए लोगों के परिजनों की संस्था ने जनहित याचिका दायर की थी. वरिष्ठ अधिवक्ता कॉलिन गोन्जाल्वेस के जरिये दायर इस याचिका में कहा गया कि फर्जी मुठभेड़ों और लोगों के लापता होने के मामलों की जांच के लिए विशेष जांच दल बनाया जाए.

देखिए, सुंदरता और संघर्ष का नाम कश्मीर

2014 में सुप्रीम कोर्ट ने मणिपुर सरकार को आदेश दिया था कि थांगजाम मनोरम की मां को 10 लाख रुपये का मुआवजा दिया जाए. आरोप है कि मनोरम की 2004 में असम राइफल्स के जवानों ने हत्या कर दी थी. एक न्यायिक जांच में पता चला कि असम राइफल्स के जवानों ने हत्या से पहले मनोरमा को प्रताड़नाएं भी दी थीं.

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