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दुनिया

दक्षिण अफ्रीका में स्कूल ने काली लड़कियों से कहा, बाल सीधे कराएं

रंगभेद का मुद्दा भले ही अब 22 साल पुराना हो चुका हो लेकिन दक्षिण अफ्रीका में अब भी इसके जख्म रह-रहकर उभर आते हैं. अब एक स्कूल ने काली लड़कियों के बालों को लेकर विवाद छेड़ दिया है.

दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद पर फिर से एक बहस शुरू हो गई है. एक स्कूल ने अपने यहां पढ़ने वाली काली छात्राओं से कहा कि उनके बाल सीधे होने चाहिए और इसके लिए वे रासायनिक प्रक्रिया अपनाएं. विवाद होने के बाद इस आदेश को रद्द कर दिया गया है.

काली छात्राओं ने शिकायत की थी कि उनके अफ्रीकी अंदाज के घुंघराले बालों की वजह से उन्हें बंदर कहा जा रहा था और उन्हें बाल सीधे कराने का आदेश दिया गया था. अब गौटेंग प्रांत के शिक्षा अधिकारियों ने प्रिटोरिया हाई स्कूल को कहा है कि 21 दिन के भीतर अपने नियमों पर पुनर्विचार करे.

यह राजधानी प्रिटोरिया का एक प्रतिष्ठित स्कूल है. रंगभेद की नीति खत्म होने से पहले यहां सिर्फ गोरे बच्चे पढ़ सकते थे. 1994 में रंगभेदी सरकार चली गई और नए शासन में पहली बार काले बच्चों को बराबरी के अधिकार के तहत यहां दाखिला दिया गया. तब से ऐसा पहली बार हुआ है कि रंगभेद एक मुद्दे के रूप में सामने आया है.

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कुछ छात्राओं ने कहा कि उनके घुंघराले बालों को गंदा कहा गया और उन्हें रसायनिक प्रक्रिया से बाल सीधे कराने को कहा गया. प्रांत के शिक्षा मंत्री पान्याजा लेसुफी तक जब बात पहुंची तो उन्होंने स्कूल का दौरा किया और आरोपों की जांच शुरू कराई. शिक्षा मंत्रालय की ओर से जारी बयान में कहा गया, "छात्राओं को लगता है कि उन्हें एफ्रो जैसे ब्लैक हेयरस्टाइल नहीं अपनाने दिए जा रहे हैं. स्कूल की नीति में हेयरस्टाइल को लेकर पाबंदियां हैं. कुछ शिक्षकों ने उनसे कहा है कि वे बंदरों जैसे दिखते हैं या अपने सिरों पर घोंसले लेकर घूमते हैं."

इस मुद्दे पर विवाद बढ़ने के बाद ब्लैक स्टूडेंट्स ने विरोध प्रदर्शन भी किया. प्रदर्शनकारियों को खदेड़ने के वास्ते स्कूल ने पुलिस और हथियारबंद सुरक्षाबलों को बुला लिया तो मसला और बड़ा हो गया. राजनेता भी मामले में कूद पड़े हैं. विपक्षी दलों ने सरकार द्वारा चलाए जा रहे इस स्कूल की तीखी आलोचना की है. जिसके बाद शिक्षा मंत्रालय ने स्कूल से अपनी नीति की समीक्षा करने को कहा है.

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काले छात्रों ने एक और आरोप लगाया है कि उन्हें उनकी बोली में बात करने से मना किया जा रहा है. उनका आरोप है कि स्कूल के श्वेत छात्र और अध्यापक उनके साथ भेदभाव करते हैं. एक छात्रा के मुताबिक एक अन्य श्वेत छात्र ने उससे कहा कि उसे पेंसिल की जरूरत नहीं है क्योंकि उसकी तो उंगलियां ही इतनी काली हैं. स्कूल के पूर्व छात्रों का कहना है कि यह व्यवहार नया नहीं है और पहले भी ऐसा होता रहा है. एक पूर्व छात्रा मिशका वजार ने बताया, "जब मैं पढ़ती थी तब भी ऐसी ही दिक्कतें थीं लेकिन किसी ने भी इतना बवाल नहीं किया जितना इन छात्राओं ने कर दिया है. हम भी शिकायती पत्र लिखते थे लेकिन उन्हें नजरअंदाज कर दिया जाता था." वजार पिछले साल ही स्कूल से निकली हैं और अब यूनिवर्सिटी में पढ़ती हैं. वह बताती हैं कि उनके समय में भी छात्राओं को सभा से बाहर खींचा जाता था और उनके बालों को लेकर फब्बतियां कसी जाती थीं.

रंगभेद का मुद्दा भले ही अब 22 साल पुराना हो चुका हो लेकिन दक्षिण अफ्रीका में अब भी इसके जख्म रह-रहकर उभर आते हैं. सोशल मीडिया पर अक्सर इस तरह के विवाद दिखाई पड़ते हैं. रंगभेदी श्वेत सरकार को सत्ता से हटाने में छात्र संगठनों ने अहम भूमिका निभाई थी लिहाजा प्रिटोरिया हाई स्कूल की छात्राओं के इस आंदोलन को देश में गंभीरता से देखा जा रहा है.

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