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दुनिया

क्या भारत की दोस्ती अफगानिस्तान के लिए खतरनाक है?

बहुत से विश्लेषकों का मानना है कि भारत से दोस्ती अफगानिस्तान को बहुत महंगी पड़ रही है. ऐसा सिर्फ पाकिस्तान के लिहाज से नहीं बल्कि तालिबान के हमलों में भी नजर आ रहा है.

अफगान सरकार अपनी राजधानी काबुल में होने वाले हालिया एक के बाद एक हमलों से सदमे में है. कुछ विश्लेषकों का कहना है कि अफगानिस्तान के भारत के साथ बढ़ते रिश्ते हिंसा की वारदातों में इजाफे का कारण बन रहे हैं.

अफगानिस्तान में तालिबान की सरकार खत्म होने के बाद से उसके भारत के साथ करीबी संबंध रहे हैं. लेकिन हालिया कुछ बरसों में वो अफगानिस्तान का बड़ा मददगार बन उभरा है. भारत ने अफगानिस्तान में अरबों डॉलर की विकास परियोजनाएं शुरू करने के साथ साथ सैन्य सहयोग को भी बढ़ाया है. हाल ही में भारत ने अफगानिस्तान को चार एमआई 25 हेलिकॉप्टरों का तोहफा भी दिया है जबकि भारत हर साल सैकड़ों अफगान सैनिकों और पुलिसकर्मियों को ट्रेनिंग भी दे रहा है. लेकिन तालिबान ने भारतीय सैन्य मदद की निंदा की है. चार सितंबर को तालिबान के प्रवक्ता जबीउल्ला मुजाहिद ने अपने संदेश में कहा, ‘‘हम भारत से मांग करते हैं कि वो अफगानिस्तान को हत्या और तबाही की तरफ ले जाने वाला सामान न दे और खास तौर से सैन्य मदद के जरिए काबुल की भ्रष्ट सरकार की उम्र को और न बढ़ाए.''

देखिए, आतंकियों ने क्या कर दिया

जर्मनी की हाइडेलबर्ग यूनिवर्सिटी में दक्षिण एशिया मामलों के विश्लेषक जिगफ्रेड वोल्फ कहते हैं कि ‘‘इस बयान से साफ हो जाता है कि जिहादी तत्व भारत को अफगानिस्तान में न सिर्फ अमरीकी हितों का एक साझीदार मानते हैं बल्कि सैन्य लिहाज से उसे अमरीका का एक उत्तराधिकारी समझ रहे हैं.'' डीडब्ल्यू से बातचीत में उन्होंने कहा, ‘‘काबुल में होने वाले तालिबान के हमले सिर्फ अफगान सरकार के खिलाफ नहीं थे बल्कि भारत को अफगानिस्तान से बाहर रखने की तरफ भी एक इशारा है. ठीक उसी तरह जैसे वे अमेरिका को एक बाहरी ताकत समझते हैं.''

बहुत खास है अफगानिस्तान की कुश्ती, देखिए

भारत और अफगान सरकार के बीच सैन्य सहयोग में आश्चर्यजनक इजाफा एक ऐसे वक्त में हो रहा है जब अमरीका धीरे धीरे अफगानिस्तान से हट रहा है. कई विश्लेषकों के मुताबिक अमरीका पहले ही भारत को अफगानिस्तान में अपना उत्तराधिकारी नियुक्त कर चुका है. अमरीकी विदेश मंत्री जॉन केरी की तरफ से भारत-अफगानिस्तान-अमरीका की साझा बैठक बुलाने का एलान इसी सिलसिले की कड़ी है.

यह बैठक अगले महीने न्यूयॉर्क में होनी है. पाकिस्तान में इस घोषणा की आलोचना हुई क्योंकि अभी तक अफगानिस्तान के सुरक्षा मामलों में अमरीका का सबसे अहम सहयोगी पाकिस्तान ही रहा है.

अफगानिस्तान सेंटर फॉर रिसर्च पॉलिसी इंस्टीट्यूट नाम के एक थिंक टैंक में राजनीतिक विश्लेषक हारून मीर कहते हैं कि इस त्रिपक्षीय बातचीत से पाकिस्तान को निकालने का असर पाकिस्तान और अफगानिस्तान के सरकार के रिश्तों पर पड़ेगा.

तस्वीरों में देखिए, ऐसा भी था अफगानिस्तान

पाकिस्तान और भारत दशकों से अफगानिस्तान में अपना अपना दबदबा कायम करने में जुटे हैं. लेकिन भारत और अफगानिस्तान के बीच रिश्तों की मजबूती ने भारत और पाकिस्तान के बीच अफगानिस्तान में संभावित प्रॉक्सी वॉर की आशंकाओं को बढ़ा दिया है.

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