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दुनिया

हिंदू-सिखों के दर्द की दास्तां है 220 हजार से 220 हो जाना

अफगानिस्तान में कभी दो लाख 20 हजार हिंदू और सिख परिवार थे. अब 220 रह गए हैं. इस अल्पसंख्यक समुदाय की जान, धर्म, ईमान हर चीज पर हमला हो रहा है. लिहाजा वे भाग रहे हैं.

दिन का वक्त था. जगतार सिंह लाघमणी काबुल में अपनी दुकान पर काम कर रहे थे. एक युवक उनके पास आया छुरा दिखाकर बोला, मुसलमान हो जाओ, नहीं तो गला काट दूंगा. आसपास खड़े लोगों और पड़ोसी दुकानदारों ने जगतार को बचाया.

जून की शुरुआत में हुआ यह हमला पहला नहीं था. अफगानिस्तान के सिख और हिंदू अक्सर इस तरह के हमलों से दो-चार हो रहे हैं. तेजी से कट्टर इस्लामिक होते जा रहे अफगानिस्तान में इस तरह के हमले आम हो रहे हैं और अल्पसंख्यकों की मुश्किलें बढ़ रही हैं.

कभी हिंदू और सिख अफगान समाज का स्मृद्ध तबका हुआ करता था. अब मुट्ठीभर ही बचे हैं. बढ़ती असहिष्णुता और शोषण का आरोप लगाकर ज्यादातर लोग अपने मुल्क को छोड़कर चले गए हैं. जगतार बताते हैं, "हमारा दिन ऐसे ही शुरू होता है. डर और अकेलेपन के साथ. अगर आप मुसलमान नहीं हैं, तो उनकी नजरों में आप इन्सान नहीं हैं. मुझे समझ नहीं आ रहा कि क्या करूं, कहां जाऊं."

भागते लोगों की दास्तां, तस्वीरों में

तालिबान से भी बुरे हालात

हिंदू और सिख सदियों से अफगानिस्तान में रह रहे हैं. वे वहां के व्यापार जगत का अहम हिस्सा रहे हैं. साहूकारी का काम यही तबका किया करता था. लेकिन आजकल उनकी पहचान जड़ी-बूटियों की दुकानों के लिए है. नेशनल काउंसिल ऑफ हिंदू ऐंड सिख के चेयरमैन अवतार सिंह बताते हैं कि 1992 में काबुल में तख्तापलट के वक्त दो लाख 20 हजार परिवार थे जो अब घटकर सिर्फ 220 रह गए हैं. कभी ये पूरे मुल्क में फैले हुए थे लेकिन अब बस नांगरहार, गजनी और काबुल के आसपास ही बचे हैं.

वैसे तो अफगानिस्तान एक लगभग पूरी तरह इस्लामिक मुल्क है लेकिन 2001 में तालिबान को सत्ता से खदेड़ देने के बाद अमेरिका की सरपरस्ती में बनी नई सरकार का संविधान सभी धर्मों के लोगों को पूजा आदि करने की इजाजत देता है. लेकिन अवतार सिंह बताते हैं कि अब तो हालात तालिबान के राज से भी खराब हो गए हैं. तालिबान ने अफगानिस्तान में शरिया लागू किया था. तब सार्वजनिक तौर पर लोगों को कत्ल किया जाता था. लड़कियों के स्कूल जाने पर पाबंदी थी. हिंदुओं और सिखों पर भी सख्ती थी. उन्हें पीले पट्टे पहनने पड़ते थे ताकि उन्हें पहचाना जा सके. लेकिन अवतार बताते हैं कि तब उन्हें परेशान नहीं किया जाता था. वह कहते हैं, "वे दिन अब जा चुके हैं जबकि हिंदुओं और सिखों को अफगानिस्तानी माना जाता था, बाहरी नहीं. सरकार में बैठे ताकतवर लोगों ने हमारी जमीनें छीन ली हैं. हमें धमकियां मिल रही हैं. छोटा समाज दिन ब दिन और छोटा होता जा रहा है."

बीते हफ्ते ही तालिबान की धमकी मिली थी कि समुदाय को दो लाख अफगानी यानी करीब तीन हजार अमेरिकी डॉलर्स हर महीने देने होंगे. उसके बाद दर्जनों परिवार अफगानिस्तान छोड़ गए.

ऐसा भी था अफगानिस्तान

श्मशान पर बवाल

कालचा में जो कुछ हो रहा है, उससे इन अल्पसंख्यकों की स्थिति समझी जा सकती है. काबुल के साथ सटे कालचा इलाके में पहले ज्यादातर हिंदू और सिख ही रहते थे. उनके पास वहां एक श्मशान घाट है. हाल के दिनों में काबुल फैला है और बहुत से मुस्लिम परिवार कालचा में रहने आ गए हैं. लेकिन अब वे इस श्मशान घाट को लेकर विरोध कर रहे हैं. इस्लाम में मुर्दों को जलाया नहीं जाता बल्कि दफ्न किया जाता है. पड़ोसी मुसलमानों को जलाने से दिक्कत होने लगी है. इलाके में रहने वाले अहमद तिमोर कहते हैं, "जब वे अपने मुर्दों को जलाते हैं तो उसकी दुर्गंध से हमारा जीना दूभर हो जाता है. हम ऐसा नहीं चाहते." अब हालात ऐसे हो गए हैं कि अंतिम संस्कार के लिए पुलिस सुरक्षा की जरूरत पड़ती है. अवतार सिंह कहते हैं, "वे हम पर ईंटें और पत्थर फेंकते हैं. मुर्दों पर पत्थर फेंकते हैं."

हज और धार्मिक मामलों के उप मंत्री दाही उल हक आबिद कहते हैं कि सरकार हिंदुओं और सिखों के जीवन में सुधार लाने के लिए जो कर सकती थी कर रही है. वह कहते हैं, "हम मानते हैं कि संघर्ष की वजह से वे लोग देश छोड़कर जा रहे हैं लेकिन उनके हालात उतने बुरे भी नहीं हैं जितना वे बताते हैं. हमने उन्हें अंतिम संस्कार के लिए एक जगह दे दी है क्योंकि शहर के अंदर लोग दुर्गंध की शिकायत कर रहे थे. लेकिन वे सहमत ही नहीं हैं."

लेकिन मामला सिर्फ इतना ही नहीं है. 8 साल के जसमीत ने स्कूल जाना बंद कर दिया क्योंकि रोज ब रोज उन्हें बच्चे तंग करते थे. अल्पसंख्यकों के बच्चों के पास अब दो ही रास्ते हैं. या तो वे निजी स्कूलों में पढ़ें या फिर मंदिर-गुरुद्वारों में. जसमीत बताता है कि बच्चे उसकी पगड़ी उतार देते थे और उसे काफिर कहते थे. बड़ी तादाद में हिंदू और सिख भारत चले गए हैं लेकिन काफी लोग कहते हैं कि वे जहां भी जाएंगे विदेशी ही कहलाएंगे. काबुल में दुकानदार बलजीत कहते हैं, "भारत जाओ तो वहां हम अफगानी हो जाते हैं और यहां भी हम बाहरवाले हैं, हम इन दोनों दुनिया के बीच कहीं खो गए हैं."

वीके/आईबी (रॉयटर्स)

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