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डीडब्ल्यू अड्डा

सात दशकों बाद भी जस का तस है पूर्वोत्तर

आजादी के सात दशक बाद भी पूर्वोत्तर भारत की हालत बहुत बदली नहीं है. प्राकृतिक सौंदर्य से भरे इलाके के सात राज्य उग्रवाद के शिकार हैं और उनके लिए स्वतंत्रता दिवस का मतलब उग्रवादी संगठनों की हड़ताल है.

तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने 1985 में पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता को एक मरता हुआ शहर कहा था. उनकी इस टिप्पणी का तब काफी विरोध हुआ था. अब चाहे राजीव की टिप्पणी के चलते हो या फिर राज्य सरकारों और निजी कंपनियों के प्रयासों से, बाद के तीन दशकों में कोलकाता की हालत में जमीन आसमान का फर्क आ गया है. लेकिन आजादी के लगभग सात दशकों बाद भी पश्चिम बंगाल से सटे पूर्वोत्तर भारत की हालत जस की तस है. इलाके के सात राज्यों में स्वाधीनता दिवस का मतलब उग्रवादी संगठनों की हड़ताल है. उग्रवाद और राजनीतिक अस्थिरता से जूझता यह इलाका भरपूर प्राकृतिक सौदर्य और धनी साहित्यिक व सांस्कृतिक विरासत के बावजूद विकास की राह पर बहुत पीछे छूट गया है.

जमीनी हकीकत

महज 20 किलोमीटर चौड़े कॉरिडोर के सहारे देश के बाकी हिस्सों से जुड़ा यह इलाका कश्मीर घाटी के बाद शायद अकेला ऐसा इलाका है जहां सबसे ज्यादा तादाद में सुरक्षा बल तैनात हैं. केंद्र सरकार ने इलाके के दो प्रमुख संगठनों नेशनल लिबरेशन फ्रंट ऑफ नगालैंड (एनएससीएन) और यूनाइटेड लिबरेशन फ्रंट ऑफ असम (उल्फा) के साथ शांति प्रक्रिया भले शुरू की हो, जमीनी हकीकत जरा भी नहीं बदली है.

देश आजाद होने के 69 साल भी इलाके के ज्यादातर राज्यों में दूसरे राज्यों से कामकाज, व्यापार या नौकरी के सिलसिले में आने वाले लोगों को हिदुस्तानी ही कहा जाता है. साफ है कि इलाके के लोग खुद को हिंदुस्तानी नहीं मानते. नगालैंड में तो एनएससीएन बाकायदा समानांतर सरकार चलाते हुए स्थानीय लोगों और सरकारी दफ्तरों तक से टैक्स वसूलता है. मणिपुर, नगालैंड, त्रिपुरा और असम के कई हिस्सों में तो हिदीभाषी लोगों का जीना तक दूभर है. उग्रवादी इस तबके के लोगों को चुन-चुन कर निशाना बनाते हैं.

तस्वीरों में देखें, खत्म होता स्वर्ग

उग्रवाद

आजादी से पहले इस इलाके को नॉर्थ ईस्ट फ्रंटियर एरिया यानी नेफा कहा जाता था. देश की आजादी के बाद इसे असम का नाम दिया गया. उसके बाद प्रशासनिक सहूलियतों और स्थानीय आबादी की मांग को ध्यान में रखते हुए यह सात छोटे-छोटे राज्यों में बंट गया. लेकिन राज्यों के छोटे होने के साथ समस्याएं कई गुना बढ़ती गईं. असम से सबसे पहले 1 दिसंबर 1963 को नगालैंड अलग हुआ. उसके बाद वर्ष 1972 में मणिपुर, त्रिपुरा व मेघालय का गठन हुआ. बाद में मिजोरम और अरुणाचल प्रदेश भी अलग राज्य बने. लेकिन असम को छोड़ दें तो बाद में उससे अलग होकर बनने वाले यह छोटे राज्य अपने जन्म के साथ ही उग्रवाद और राजनीतिक अस्थिरता की चपेट में आ गए.

असम राजनीतिक रूप से स्थिर भले है, उग्रवाद की समस्या यहां भी बहुत पुरानी है. राज्य में उल्फा और बोडो उग्रवादी संगठनों ने कई दशकों से कहर बरपा रखा है. केंद्र ने उल्फा के साथ शांति प्रक्रिया जरूर शुरू की है, लेकिन यह भी अब तक परवान नहीं चढ़ सकी है. हाल में बोडो उग्रवादियों ने सरेबाजार हमला कर 14 लोगों को मौत के घाट कर उतार कर अपने इरादे जता दिए हैं. दरअसल, केंद्र सरकार जब किसी संगठन के एक गुट के साथ बातचीत की प्रक्रिया शुरू करती है तो दूसरा गुट इसके विरोध में खड़ा हो जाता है. यह कभी नहीं खत्म होने वाली एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें इलाके के आम लोग पिसने को मजबूर हैं.

फिलहाल मिजोरम और अरुणाचल प्रदेश को उग्रवाद के लिहाज अपेक्षाकृत शांत माना जा सकता है. लेकिन मिजोरम लालदेंगा और फिजो की अगुआई में दो दशकों तक उग्रवाद का दंश झेल चुका है. इसी तरह अरुणाचल भी पड़ोसी नगालैंड के उग्रवादी गुट एनएससीएन के उग्रवादियों की हरकतों से परेशान है. मणिपुर में तो हालात बेहद खराब हैं. इस छोटे-से पर्वतीय राज्य में कम से कम तीन दर्जन उग्रवादी संगठन सक्रिय हैं और राज्य में सशस्त्र बल विशेषाधिकार अधिनियम लागू होने के बावजूद उनको कानून व व्यवस्था का कोई खौफ नहीं है. इस अधिनियम के बावजूद राज्य में तैनात असम राइफल्स के जवान या तो उग्रवादियों तक नहीं पहुंच पाते या फिर वह भी उनसे खौफ खाते हैं.

राजनीतिक अस्थिरता

इलाके में उग्रवाद पर अंकुश नहीं लग पाने और तमाम प्राकृतिक संसाधन के बावजूद अब तक खास विकास नहीं हो पाने की एक प्रमुख वजह राजनीतिक अस्थिरता है. असम के अलावा बाकी राज्यों में विधानसभा के 30 से 60 तक सदस्य होते हैं. ऐसी स्थिति में दो-चार विधायकों के पाला बदलते ही सरकारें रातोरात बदल जाती हैं. यही वजह है कि चुनाव जीत कर सत्ता में आने वाली पार्टी किसी तरह जोड़-तोड़ कर अपनी सरकार बचाने में जुटी रहती है तो दूसरी ओर विपक्ष उसे गिराने में.

देखिए, यहां महिलाओं की चलती है

इस फेर में विकास का मुद्दा प्राथमिकता सूची में सबसे नीचे चला जाता है. इसकी सबसे ताजा मिसाल अरुणाचल प्रदेश है जहां कांग्रेस विधायकों की बगावत ने बीते साल के आखिर में नबाम टुकी की सरकार गिरा दी थी और बीती फरवरी में बागी कांग्रेस नेता कालिखो पुल ने भाजपा की सहायता से नई सरकार बना ली. हालांकि सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर उनको सत्ता से हटना पड़ा, लेकिन यह अपने किस्म का अब तक का पहला मामला है. अमूमन तो ज्यादातर सरकारें अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पातीं.

असम में राजनीतिक स्थिरता के बावजूद विकास न हो सकने की सबसे बड़ी वजह है उग्रवाद. अकेले राज्य सरकारें न तो विकास की बड़ी परियोजनाएं शुरू कर सकती हैं और न ही पर्यटन को बढ़ावा दे सकती हैं. उग्रवाद की वजह से अब तक कोई भी बड़ी कंपनी इलाके में निवेश के लिए तैयार नहीं हुई है. उल्टे हाल के दशकों में इन इलाकों से बड़े पैमाने पर पूंजी का पलायन हुआ है. हजारों लोगों ने अपना कारोबार पड़ोसी बंगाल में शिफ्ट कर लिया है. ऐसी हालत में विकास की कल्पना करना संभव नहीं है.

राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि पूर्वोत्तर के विकास के लिए सबसे पहले उग्रवाद पर काबू पा कर इलाके की जमीनी हालत में सुधार जरूरी है. इसके लिए केंद्र व राज्यों को मिल कर एक एकीकृत योजना के तहत काम करना होगा. लेकिन इलाके की जमीनी हालात, स्थानीय लोगों की मानसिकता, उग्रवाद और राजनीतिक अस्थिरता को ध्यान में रखते हुए यह दूर की कौड़ी ही लगती है. यानी यह स्वाधीनता दिवस भी पूर्वोत्तर के लोगों के लिए एक आम हड़ताल के तौर पर ही गुजर जाएगा.

ब्लॉगः प्रभाकर

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