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दुनिया

40 लाख जर्मन पांचवी पास से भी कमजोर

जर्मनी जैसा विकसित देश के लोग निश्चित ही पढ़ लिख सकते हैं लेकिन चौंकाने वाली बात ये है कि यहां भी ऐसे लोग हैं जिन्हें पढ़ने लिखने में बहुत परेशानी होती है. स्कूल पास करने के बाद भी पढ़ लिख नहीं सकते.

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विश्व साक्षरता दिवस का दिन ये सोचने का अच्छा मौका है कि जर्मनी में क्यों अब भी ऐसे लोग हैं जो स्कूल से पास होने के बावजूद पढ़ लिख नहीं पाते. उनकी पढ़ने लिखने की क्षमता दूसरी तीसरी कक्षा के बच्चों से भी कम है. एक शोध के मुताबिक जर्मनी में 15 साल से ज्यादा उम्र के चालीस लाख के करीब लोग ऐसे हैं जो ठीक से पढ़ लिख नहीं सकते

राल्फ 45 साल के हैं और निरक्षर हैं. 20 साल से भी ज्यादा समय से वे ट्रांसपोर्ट का काम कर रहे थे. कई लोगों को उनकी इस मुश्किल के बारे में पता नहीं था. उन्होंने इसे शर्म के मारे छिपा कर रखा. "मुझे बार बार दिखावा करना पड़ता था. किसी को पता नहीं लगने देना कि मुश्किल है. मैंने भी कभी नहीं कहा, हमेशा छिपता रहता था. मुझे शर्म आती थी कि मैं नहीं पढ़ सकता."

लेकिन अब वे हालात बदलना चाहते हैं, पहली बार वह एक कोर्स में हिस्सा ले रहे हैं. वहां उनके जैसे कई लोग हैं. चालीस लाख निरक्षरों में से अधिकतर जर्मन समाज में घुल मिल गए हैं. उन्हें खरीददारी में मुश्किल होती है खासकर तब जब पैकिंग बदल जाता है तो वे समझ ही नहीं पाते कि क्या ये वही उत्पाद है जो उन्होंने पहले खरीदा था. घर किराए पर लेने के लिए कॉन्ट्रेक्ट वो नहीं पढ़ सकते, नौकरी के लिए आवेदन नहीं कर सकते, या लाइसेंस की परीक्षा नहीं दे सकते.

Frankfurter Buchmesse 2005: Frau mit Buch, Plakat Lesen!

आशंका है कि ऐसे बहुत से लोग हैं जो पढ़ना लिखना नहीं जानते या भूल चुके हैं. लेकिन निरक्षरता के मानक तय नहीं किए गए हैं ताकि इन लोगों की सही संख्या का पता लगाया जा सके. अब जर्मनी में लिओ लेवल वन स्टडी नाम का एक नया शोध किया जा रहा है, ताकि निरक्षरों की संख्या का पता लगाया जा सके. 2011 में ये पूरा होगा. जर्मनी के अंतरिक्ष अनुसंधान केंद्र की काटनिका इस प्रोजेक्ट में सहायता कर रही है वे कहती हैं, "लेवल वन का ये शोध जर्मनी का पहला है जो वयस्क लोगों में लिखने और पढ़ने की क्षमता का आंकलन करेगा. ये जर्मनी के लिए नया है. ये उपाय ज़रूरी है ताकि निरक्षरों की संख्या कम की जा सके."

निरक्षरता का कारण पहली कक्षा में खराब प्रदर्शन हो सकता है या फिर परिवार में इस पर ध्यान नहीं दिया गया होगा. स्कूल ख़त्म होने के बाद हर साल कम से कम 20 हज़ार लोग पढ़ना लिखना ठीक करने के लिए कोर्स में जाते हैं. निरक्षरों के लिए कोर्स तो बढ़ रहे हैं लेकिन ये समस्या हल नहीं होती. भाषा विज्ञान की प्रोफेसर कोर्डुला लोएफलर शिकायत करती हैं, "शिक्षकों को इस समस्या को समझने के लिए प्रशिक्षण नहीं दिया जाता है. बड़ी क्लासों में टीचर सोच लेते हैं कि बच्चे पढऩा लिखना जानते होंगे." वहीं वयस्कों को लगता है कि वे ही अकेले ऐसे हैं जिन्हें पढ़ना लिखना नहीं आता.

संयुक्त राष्ट्र की संस्था युनेस्को के मुताबिक दुनिया भर में करीब 76 करोड़ लोग निरक्षर हैं. जबकि कम से कम सात करोड़ बच्चे ऐसे हैं जो स्कूल नहीं जाते.

रिपोर्टः डॉयचे वेले/आभा एम

संपादनः ए जमाल

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