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विज्ञान

2020 तक बाजार में आ सकती है कृत्रिम किडनी

कृत्रिम किडनी इस दशक के अंत तक बाजार में आ सकती है. मुट्ठी के बराबर छोटी की इस मशीन का फिलहाल अमेरिका में सैकड़ों मरीजों पर परीक्षण किया जा रहा है.

दुनिया भर में लाखों लोग किडनी की बीमारी से जूझ रहे हैं. उन्हें या तो दूसरी किडनी की जरूरत पड़ती है या फिर आए दिन अस्पताल जाकर डायलिसिस मशीन का सहारा लेना पड़ता है. डायलिसिस में काफी समय लगता है और पैसा भी. एक बार डायलिसिस शुरू हो गया तो फिर जिंदगी भर इसी के सहारे जान बची रहती है. डायलिसिस बंद तो सांस बंद. लेकिन भविष्य में शायद ऐसा नहीं होगा.

वैज्ञानिक कृत्रिम किडनी बनाने में कामयाब हो चुके हैं. अमेरिका में फिलहाल इसे सैकड़ों मरीजों पर टेस्ट किया जा रहा है. वैज्ञानिक आर्टिफिशियल किडनी की सुरक्षा और क्षमता की पूरी जानकारी हासिल करना चाहते हैं.

भारतीय मूल के वैज्ञानिक डॉक्टर शुभो रॉय इसके सह आविष्कारक हैं. बुधवार रात चेन्नई में टैंकर एनुअल चैरिटी एंड अवॉर्ड्स के दौरान रॉय ने यह जानकारी दी. ट्रायल में खरा उतरने के बाद अमेरिका का फेडरल ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन मशीन को मंजूरी देगा और कृत्रिम किडनी बाजार में आ जाएगी.

डॉक्टर रॉय के मुताबिक बंद मुट्ठी के बराबर आकार वाली इस मशीन को पेट में लगाया जाएगा. मशीन को ऊर्जा दिल से मिलेगी. आर्टिफिशियल किडनी रक्त को साफ करेगी, हार्मोंस को नियंत्रित करेगी और ब्लड प्रेशर को काबू करने में भी मदद करेगी. डॉक्टरों, पैरामेडिक्स और मरीजों से भरे हॉल को संबोधित करते हुए यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया सैन फ्रांसिस्को के रिसर्चर डॉ. रॉय ने कहा, "परंपरागत डायलिसिस के तुलना में यह मशीन किडनी का काम ज्यादा बेहतर तरीके से करेगी."

भारत में हर साल 2.5 लाख लोग किडनी की बीमारी से मरते हैं. बीमारी के आखिरी चरण में पहुंचने के बाद डायलिसिस या किडनी ट्रांसप्लांट का विकल्प ही बचता है. इसमें बहुत ही ज्यादा पैसा खर्च होता है.

डॉक्टर रॉय ने कृत्रिम किडनी की कीमत के बारे में कुछ नहीं बताया. उन्होंने बस यही कहा कि यह सामान्य डायलिसिस और ट्रांसप्लांट से काफी सस्ती होगी.

(कैसे पहचानें डायबिटीज के शुरुआती संकेत)

ओएसजे/एके (पीटीआई)

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