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दुनिया

2004 के बाद भारत में अब फांसी

हाल के सालों में भारत में फांसी पर लटकाने के कम ही मामले सामने आए हैं. कसाब से पहले अगस्त 2004 में बलात्कार और हत्या के दोषी धनंजय चटर्जी को कोलकाता में फांसी पर लटकाया गया था.

भारत में मौत की सजा कानूनी है लेकिन आम नहीं है. देश फांसी के फंदे पर लटका कर मौत की सजा दी जाती है. दूसरे देशों में जहरीली सुई, गोली मार कर और बिजली की कुर्सी पर बिठा कर भी मौत की सजा दी जाती है. भारतीय सुप्रीम कोर्ट ने 1983 में अपने एक फैसले में कहा था कि सिर्फ दुर्लभों में दुर्लभ (रेयरेस्ट ऑफ रेयर) मामलों में ही फांसी की सजा दी जा सकती है. क्रूरतम हत्या, हत्या के साथ डकैती, बच्चे को खुदकुशी के लिए उकसाने, राष्ट्र के खिलाफ युद्ध भड़काने और सशस्त्र बल के किसी सदस्य द्वारा विद्रोह करने की स्थिति में भारत में फांसी दी जा सकती है. 1989 में इस नियम को बदला गया और इसमें नशीली दवाइयों का कारोबार करने वालों के लिए भी फांसी की सजा तय कर दी गई.

हाल के साल में आतंकवादी गतिविधियों में शामिल होने वाले व्यक्तियों को भी फांसी की सजा देने का फैसला किया गया है. भारत में हाल के सालों में इज्जत के नाम पर हत्या के मामले भी ज्यादा संख्या में सामने आए हैं और तय किया गया है कि ऐसी हत्या के जिम्मेदार लोगों को भी फांसी दी जा सकती है.

बहुत कम हुई फांसी

कसाब से पहले भारत में 2004 में एक अपराधी को फांसी दी गई. पश्चिम बंगाल के धनंजय चटर्जी को 2004 में फांसी पर लटकाया गया. 25 साल की उम्र में चटर्जी ने 14 साल की हेतल पारेख नाम की किशोरी के साथ बलात्कार करने के बाद उसकी हत्या कर दी थी. कोलकाता की जेल में फांसी के वक्त चटर्जी की उम्र 41 साल थी और उस समय राष्ट्रीय स्तर पर फांसी की सजा को लेकर काफी विवाद हुआ था. भारत में मानवाधिकार संस्थाएं फांसी की सजा के खिलाफ हैं. चटर्जी से पहले 1995 में सीरियल किलर ऑटो शंकर को सेलम में फांसी दी गई थी.

लटकी हुई फांसी

भारत में निचली अदालतों में फांसी की सजा मिलने के बाद सर्वोच्च अदालत यानी सुप्रीम कोर्ट में अपील की जा सकती है. सुप्रीम कोर्ट भी अगर फांसी की सजा पर मुहर लगा दे तो फिर राष्ट्रपति से दया की अपील की जा सकती है. अगर राष्ट्रपति भी इस अपील को खारिज कर दे तो फांसी दे दी जाती है. इस वक्त भारत की अलग अलग अदालतों ने सैकड़ों लोगों को फांसी सुना रखी है. इनमें से कई याचिकायें राष्ट्रपति या गृह मंत्रालय के पास लंबित हैं.

इनमें सबसे प्रमुख 2001 के संसद हमलों के आरोपी अफजल गुरु की याचिका है. अलग अलग अदालतों में फांसी की सजा होने के बाद अफजल गुरु को 20 अक्तूबर 2006 को फांसी दी जानी थी. लेकिन ऐन मौके पर इसे टाल दिया गया. अरुंधति रॉय जैसी कई कार्यकर्ताओं ने मांग की है कि गुरु की फांसी को माफ कर दिया जाना चाहिए.

जल्लादों की कमी

पहले भारतीय जेलों में जल्लादों की खास पोस्ट होती थी क्योंकि उस वक्त फांसी की संख्या भी ज्यादा होती थी. लेकिन हाल के दिनों में भारत में फांसी देने वाले जल्लादों की संख्या बहुत कम हो गई है. पुराने जल्लाद या तो रिटायर हो गए हैं या फिर उनकी मौत हो चुकी है. ऐसे में फांसी की किसी नई सजा को पूरा करने के लिए जल्लाद को खोज निकालना भी बड़ी जहमत का काम है.

एमनेस्टी इंटरनेशल के आंकड़ों के मुताबिक भारत में 2007 में 100, 2006 में 40, 2005 में 77, 2002 में 23 और 2001 में 33 लोगों को फांसी की सजा सुनाई गई लेकिन किसी भी दोषी को फांसी पर लटकाया नहीं गया.

एजेए/एएम (रॉयटर्स, एएफपी)

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