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दुनिया

15 सालों में 58 फीसदी बढ़ गया ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन

भारत में पिछले 15 सालों में ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन 58 फीसदी बढ़ गया है. एसोचैम और एर्न्स्ट एंड यंग के साझा रिसर्च की रिपोर्ट में ये बात सामने आई है. बिजली बनाने के लिए कोयले का इस्तेमाल इसकी सबसे बड़ी वजह है.

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1995 से 2009 आते-आते ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन 1.9 अरब टन तक पहुंच गया. सिर्फ बिजली के लिए कोयला जलाने की बात करें तो 1995 में इसकी मात्रा 35.50 करोड़ टन थी जो 2009 में 71.93 करोड़ टन हो गई कोयला जलाकर बिजली पैदा करने के कारण भारत में कार्बन फुट प्रिंट करीब दोगुना हो गया है. जितनी ज्यादा बिजली पैदा होती है पर्यावरण में ग्रीनहाउस गैसों की मात्रा भी उसी हिसाब से बढ़ती जाती है. पूरी दुनिया का करीब 10 फीसदी कोयला भारत में मौजूद है. 11वीं पंचवर्षीय योजना में भारत 78.7 गीगावाट बिजली पैदा करने की क्षमता हासिल कर लेगा. इस बिजली का ज्यादातर हिस्सा कोयला जलाकर पैदा होगा.

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प्रगति की कीमत

रिपोर्ट में ये भी कहा गया है कि प्रति नागरिक के हिसाब से दुनिया के औसत ग्रीन हाउस उत्सर्जन को देखें तो हमारा उत्सर्जन अभी आधा ही है.  बिजली और परिवहन में ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन ही दुनिया के बढ़ते तापमान की प्रमुख वजह है.

 आनेवाले दिनों में पर्यावरण के नियमों के हिसाब से चलते हुए विकास हासिल करने के लिए भारतीय उद्योग जगत को अपना कार्बन फुटप्रिंट खूब घटाना होगा. एसोचैम ने कहा है कि उद्योगों को अपने उत्सर्जन की लगातार निगरानी करनी होगी तभी उत्सर्जन में कटौती के 2020 तक के लक्ष्य को हासिल किया जा सकेगा. अगर ऐसा नहीं हुआ तो हर उद्योग को अलग से लगी पाबंदियों का सामना करना पड़ेगा. भारत ने पिछले साल कोपेनहेगेन पर्यावरण सम्मेलन में 2020 तक कार्बन उत्सर्जन में 15-20 फीसदी के कटौती की बात कही थी. इसे हासिल करने के लिए जरूरी कदमों का एलान सरकार जल्दी ही करने वाली है. हर कंपनी अगर खुद ही ऊर्जा के वैकल्पिक साधनों, ऊर्जा की फिजूलखर्ची और पर्यावरण के अनुकूल तकनीकों के इस्तेमाल  जैसे उपायों पर अमल करे तो सरकार के लिए ये लक्ष्य हासिल करना मुश्किल नहीं होगा.

रिपोर्टः एजेंसियां/एन रंजन

संपादनः उ.भ.

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