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दुनिया

15 लोगों की मौत की सजा रद्द

भारत में सुप्रीम कोर्ट ने 15 लोगों की फांसी की सजा को कम कर के उम्रकैद में बदल दिया है. अदालत का कहना है कि दया याचिकाओं के फैसलों पर इतनी देर नहीं की जा सकती.

भारत दुनिया के उन चुनिंदा देशों में से है जहां आज भी मौत की सजा दी जाती है. हालांकि ऐसा 'रेयरेस्ट ऑफ द रेयर' मामले में ही होता आया है. पिछले साल मुंबई हमलों के दोषी अजमल कसाब और संसद पर हमले की योजना बनाने वाले अफजल गुरु को फांसी पर लटकाया गया. आठ साल बाद भारत में किसी को फांसी देने के इस फैसले ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय को सकते में डाल दिया. पर अब अदालत के इस फैसले ने एक बार फिर यह बहस छेड़ दी है कि क्या भारत फांसी की सजा को अलविदा कहने को तैयार हो रहा है.

फैसले का स्वागत

एशियन सेंटर फॉर ह्यूमन राइट्स के अध्यक्ष सुहास चकमा ने समाचार एजेंसी एएफपी से कहा, "यह फैसला एक मील का पत्थर है जो भारत को मौत की सजा को पूरी तरह खत्म करने की ओर ले जाएगा." हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि वे उम्मीद नहीं करते कि देश की सुरक्षा के मामले में भी मौत की सजा पर रोक लगाई जाएगी. लेकिन बाकी मामलों में वह नरमी बरते जाने की उम्मीद कर रहे हैं, "बाकी के 90 फीसदी मामले ऐसे हैं जहां लोगों को कत्ल या बलात्कार के लिए मौत की सजा सुनाई गयी है और इन सब लोगों को फांसी पर लटकाया नहीं जा सकता."

इस फैसले को ले कर मानवाधिकार संगठन काफी खुश नजर आ रहे हैं. ह्यूमन राइट्स लॉ नेटवर्क के संस्थापक कॉलिन गोंसाल्वेस ने टीवी चैनल सीएनएन आईबीएन से कहा, "मैं बता नहीं सकता कि मैं कितना उत्साहित, कितना खुश हूं."

राष्ट्रपति बनाम अदालत

फांसी की सजा के खिलाफ राष्ट्रपति के पास आवेदन देने वाले कुछ कैदियों ने सुप्रीम कोर्ट में इस बारे में याचिका डाली थी कि उनके बारे में फैसला लिए जाने में बहुत देर की जा रही है. अदालत ने इनमें से 15 की सजा कम कर दी है. इनमें वीरप्पन के गिरोह के चार लोग शामिल हैं जिन पर 1993 में बारूदी सुरंग लगाकर 22 लोगों की जान लेने का आरोप है. ये लोग 2004 से जेल में हैं और पिछले साल फरवरी में राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने इनकी दया याचिका खारिज कर दी थी.

Präsident Indien Pranab Mukherjee

राष्ट्रपति ने मौत की सजा को लेकर कड़ी छवि पेश की

मौत की सजा को ले कर प्रणब मुखर्जी ने दुनिया के सामने अपनी एक कड़ी छवि प्रस्तुत की है. कार्यभार संभालने के बाद से वे लगातार दया याचिकाओं को खारिज करते रहे हैं. उनसे पहले राष्ट्रपति रहीं प्रतिभा पाटिल ने इन याचिकाओं पर कोई फैसला ही नहीं लिया था. अदालत का कहना है कि दया याचिका पर फैसले में बहुत देरी हुई है, "मौत की सजा पा चुके किसी भी व्यक्ति को कालकोठरी में नहीं रखा जा सकता और यह गैरसंवैधानिक है." साथ ही अदालत ने कहा है कि मानसिक रूप से बीमार लोगों को भी फांसी नहीं दी जा सकती.

भारत में 400 से ज्यादा लोगों को मौत की सजा सुनाई गयी है. हालांकि पिछले एक दशक में तीन ही को फांसी पर लटकाया गया. देश में मौत की सजा को ले कर रुख बंटा हुआ है. पिछले साल दिल्ली में सामूहिक बलात्कार मामले में फांसी की सजा दिए जाने के लिए सड़कों पर भारी प्रदर्शन हुए और अदालत ने यही फैसला भी सुनाया.

आईबी/एमजे (डीपीए, एएफपी)

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