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ताना बाना

113 साल की उम्र में नेत्रदान

दूसरों के जीवन में उजाला भरने के लिए नेत्रदान करने की कोई उम्र नहीं होती. 113 साल की उम्र में नेत्रदान करने वाले पंडित सुधाकर चतुर्वेदी अपनी आंखों को दान करने का संकल्प कर दुनिया को यही संदेश दे रहे हैं.

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बैंगलोर में गैरसरकारी संगठन आईडीएल शारीरिक रूप से अक्षम और नेत्रहीन व्यक्तियों के जीवन को बेहतर बनाने पिछले काफी समय से प्रयास कर रहा है. इसी संगठन की ओर से आयोजित एक समारोह में सुधाकर चतुर्वेदी ने रिसर्च के लिए अपनी आंखों को दान करने का फैसला किया. सुधाकर चतुर्वेदी को लिविंग लेजेंड अवॉर्ड से सम्मानित किया गया है. शुरुआत में वह अपनी आंखों की उपयोगिता के प्रति आश्वस्त नहीं थे लेकिन बाद में वह रिसर्च के लिए उन्हें दान में देने के लिए तैयार हो गए.

1897 में जन्मे पंडित सुधाकर चतुर्वेदी ने जिंदगी भर महात्मा गांधी के उसूलों का पालन किया. वह वेदों के ज्ञाता हैं और इस उम्र में भी हिंदी, अंग्रेजी और कन्नड़ भाषा के अखबार और पत्रिकाएं पढ़ते हैं. दिन भर की अहम खबरों पर वह मेहमानों के साथ चर्चा करते हैं. सुधाकर चतुर्वेदी का कहना है कि एक अच्छे काम के लिए अपनी आंखों को दान करते हुए उन्हें संतुष्टि का अनुभव हो रहा है. "अपनी आंखों को दान देकर मैं और लोगों को प्रेरित कर पाऊंगा."

आईडीएल संगठन के प्रचार शुरू करने के बाद अपनी आंखों को दान करने वाले सुधाकर चतुर्वेदी 50,000वें व्यक्ति बने हैं. सुधाकर चतुर्वेदी को लोग पोस्टमैन टू गांधी के नाम से भी जानते हैं क्योंकि दशकों पहले गांधीजी के खतों को वायसरॉय और गवर्नर जनरल तक पहुंचाने का काम वही करते थे. स्वाधीनता संग्राम का सुधाकर चतुर्वेदी हिस्सा बने और 31 बार जेल गए. मुंबई हमलों के दौरान आतंकवादियों की गोलियों का निशाना बने संदीप उन्नीकृष्णन के माता पिता ने भी अपनी आंखें दान करने का संकल्प लिया है.

रिपोर्ट: एजेंसियां/एस गौड़

संपादन: ए जमाल

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