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दुनिया

हौसले और हिम्मत से भरपूर दावा की कहानी

हॉलीवुड के धूम धड़ाके और बॉलीवुड के लटके झटकों से दूर...मध्य एशियाई देश मोंगोलिया में भी फिल्में बनती हैं. वहां ब्यामबसूरेन दावा नाम की एक ऐसी महिला फिल्म निर्देशक हैं,जिन्हें दुनिया जानती हैं..सलाम करती हैं

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परंपरा, रीति रिवाज, समाज में बदलाव, यह कुछ ऐसे मुद्दे हैं जिन पर मंगोलिया की फिल्म निर्देशक ब्यामबसूरेन दावा ज़ोर देने की कोशिश करती हैं. लेकिन 39 साल की ब्यामबसूरेन के लिए अपने देश मंगोलिया में फिल्में बनाना आसान नहीं हैं. पहली चुनौती है उनका महिला होना और फिर मंगोलिया में फिल्म बनाने के लिए सुविधाएं भी नहीं हैं.

झकझोर देने वाली

द स्टोरी ऑफ द वीपिंग कमेल यानी रोते हुए ऊट की कहानी ने ब्यामबसुरेन दावा को पूरी दुनिया में मशहूर कर दिया. 2005 में इस फिल्म के लिए उन्हे ऑस्कर यानी दुनिया के सबसे प्रतिष्ठित पुरस्कार के लिए नामांकित किया गया. यह फिल्म 80 देशों में बिकी. इस फिल्म में ब्यामबसूरेन एक खानाबदोश परिवार की कहानी बतातीं हैं जो एक सफेद ऊंट को बचाने की कोशिश करता है. सफेद होने की वजह से ऊंट के बच्चे को उसकी मां ने दुत्कार दिया.

हमारी आपकी

फिल्म में कोई नामी गिरामी कलाकार नहीं है.आम जिंदगी की कहानी, आम लोग ही कहते हैं. ब्यामबसुरेन की खासियत है कि उनकी फिल्में काल्पनिकता और सच्चाई के बीच की सीमाओं को तोड़ देती हैं.. उनकी फिल्में हमेशा मंगोलिया के खानाबदोशों के मुश्किल जीवन, उनके रीति रिवाज़ों और परंपराओं को भी दिखाती हैं. ब्यामबसूरेन कहतीं हैं कि उनके निर्देशन में हमेशा एक खोज छिपी हुई है, अपनी पहचान को समझने के लिए....समाजिक बदलावों से जूझने और लड़ने के लिए. "मेरे लिए आकर्षण की बात हमेशा यह रही है कि मंगोलिया के लोग प्राकृति को लेकर किस तरह का रुख अपनाते हैं. वह प्रकृति के बहुत करीब हैं. उनका बहुत गहरा रिश्ता है. मेरी उम्मीद यह है कि पश्चिम और पूरब और मेरे देश में विकास हो लेकिन प्रकृति को सम्मान देने की कला सीखते हुए."

1971 में मंगोलिया की राजधानी उलान बातोर में जन्मी ब्यामबसूरेन ने 1995 से लेकर देश की सबसे बडी फिल्म अकादमी में पढाई की. 1998 में वे टीवी एंकर बनी और उन्होंने सरकारी टलेविज़न के लिए फिल्में बनाना शुरू किया. 2000 में वह जर्मनी आईं, जहां पहली बार उन्हें अपनी सच्चाई भरी रुपहली सोच को दुनियाभर के दर्शकों के सामने पेश करने का मौका मिला. म्यूनिख के फिल्म इंस्टिट्यूट में उन्होने और प्रशिक्षण लिया. वह याद करतीं हैं कि शुरू में उन्हें अजनबी देश में बहुत मुश्किल हुई. न वह भाषा जानतीं थीं, न संस्कृति. लेकिन हुनर और ललक के आगे ये मुश्किलें ध्वस्त हो गईं. वह कहती हैं कि "मैं हमेशा पहले कहीं पहुंच जाती हूं और फिर समस्याओं को सुलझाने की कोशिश करतीं हूं. डरना नहीं चाहिए" - यह ब्यामबसुरेन का जीवन जीने का सिद्धांत है .

नई फिल्म

जर्मनी में अभी अभी ब्यामबसूरेन की नई फिल्म द टू होर्सस ऑफ जेंगिस खान यानी चंगेज़ खान के दो घोडे रिलीज़ हुई है. इस फिल्म में मुख्य किरदार निभा रहीं हैं मंगोलिया की गयिका उर्ना, जो ब्यामबसूरेन की तरह जर्मनी में रहती हैं. फिल्म का शीर्षक एक बहुत ही पुराने गाने का नाम है जो दोनों मंगोलिया की कहानी बताता है. 1921 में बना स्वतंत्र मोंगोलिया जिसे बाहरी मंगोलिया भी कहा जाता है. भीतरी मंगोलिया चीन का एक हिस्सा है. 1966 और 1976 के बीच हुई चीनी सांस्कृतिक क्रांति के वक्त गाना बजाना और संगीत के बाजे रखना मना था और इसलिए बहुत सारे पारंपरिक गाने खूशबू की तरह उड़ गए. लेकिन तभी उर्ना को अपनी दादी का एक वाईलन मिला था जिसपर इस गाने के बोल लिखे गए थे.

उर्ना भीतरी मंगोलिया यानी चीन में पली बडी हैं और ब्यामबसूरेन स्वतंत्र मंगोलिया में. दूरी और नजदीकी, लोगों का बिछड़ जाना - यह भी ब्यामबसूरेन, उर्ना के ज़रिए अपनी फिल्म में दिखाना चाहतीं थी. कितना मुश्किल था ऐसी फिल्म बनाना, ब्यामबसूरेन बतातीं हैं, "हमारी फिल्म के लिए कोई स्क्रिप्ट नहीं थीं. ज़रूर हमने यह सोचा था कि कौन सी जगह से कहां जाएंगे, इससे ज़्यादा नहीं. 2008 में, जब हमने इस फिल्म को फिलमाया, तब राजधानी उलान बोतोर में चुनावों के बाद राजनैतिक तनाव था और हमको बहुत जल्द ही शहर छोड़ना पढ़ा. शहर से कुछ ही दूर हम कीचड़ में फंस गए. गाड़ी बार बार कीचड़ में फंसती रहीं. फिर हमने एक जगह तंबू लगाया लेकिन तभी खानाबदोश आए और उन्होने बताया की बाढ़ आने वाली है."

सबसे बड़ी खुशी

ब्यामबसूरेन मानती हैं कि फिल्में बनाना उनकी ज़िंदगी की सबसे बड़ी खुशी है. विनम्र स्वभाव वाली ब्यामबसूरेन इस बात पर ज़ोर देतीं हैं कि वह बहुत ही भाग्यशाली हैं कि उन्हें इतना समर्थन मिला. उन्हें इस बात पर संतुष्टि है कि अपने पंसदीदा काम के जरिए वह अपने देश की संपन्न संस्कृति को पूरी दुनिया के सामने ला सकतीं हैं...कष्टों को कोसों पीछे छोड़कर.

सबसे विरल आबादी

मंगोलिया दुनिया का 19वां सबसे बड़ा देश है, लेकिन यह दुनिया का सबसे विरल आबादी वाला देश भी है. वहां सिर्फ तीन करोड लोग रहते हैं. परंपरागत रूप से वहां के लोग खानाबदोश हैं और विशेष तरह के गोल तंबुओं में रहते हैं जिन्हे युर्त कहा जाता है. राजधानी उलान बोतोर में 38 फीसदी आबादी रहती है. मंगोलिया चंगेज खान के नाम से जोड़ा जाता है जिसने 1206 में साम्राज्य स्थापित किया और उसे खूब फैलाया. 16वीं और 17वीं सदी में बौद्ध धर्म वहां पहुंचा और धीरे धीरे मंगोलिया चीनी साम्राज्य के प्रभाव में आया. हालांकि आज भी ओझावाद और प्रकृति पूजा भी पसंद की जाती है.

चीन में भी

1911 में मंगोलिया ने स्वतंत्रता घोषणा की, लेकिन आज भी एक बडा हिस्सा जिसमें मंगोलियाई मूल के लोग रहते हैं वह चीन में है. 1945 में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी मंगोलिया को मान्यता मिली और देश ने पूर्वी सोवियत संघ को आदर्श मानकर साम्यवाद अपना लिया. 1990 में सोवियत संघ के पतन के बाद, मोंगोलिया में भी लोकतांत्रिक क्रांति हुई और एक नया संविधान रचा गया. यहां घुड़सवारी करना यहां बहुत पसंद किया जाता है. इस बीच देश में फुटबॉल भी लोकप्रिय हो गया है. राष्ट्रीय टीम ने 90 के दशक में खेलना शुरू किया लेकिन अब तक वह किसी बड़े टूर्नामेंट के लिए क्वालिफाई नहीं कर पाई है.

महिलाओं का रोल

महिलाओं की हमेशा बड़ी भूमिका रही है. खानाबदोश परंपरा में पुरूषों और महिलाओं को सारे काम मिलकर करने होते हैं. जैसे तंबू लगाना, बच्चों की परवरिश करना. खाना बनाने और अपना सामान बेचने के लिए भी पुरुष महिलाओं के साथ मिलकर काम करते हैं. जब पुरुष कुछ दिन के लिए घर बाहर कहीं दूसरी जगह जाते हैं तब महिलाओं को सभी फैसले लेने की पूरी आज़ादी है. साम्यवादी विचारधारा में भी महिलाओं को बड़ी भूमिका दी गई है. विकास के लिहाज से संयुक्त राष्ट्र की सूची में दुनिया के 182 देशों में से मंगोलिया 115वें स्थान पर हैं. भ्रष्टाचार को लेकर ट्रांसपैरंसी इंटरनैशनल की 180 देशों की सूची में मंगोलिया 120 वें स्थान पर हैं. देश में कुल 300 अखबार, रेडियों और टीवी स्टेशन हैं.

रिपोर्टः प्रिया एसेलबॉर्न

संपादनः आभा मोंढे

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