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दुनिया

हॉन्ग कॉन्ग में लोकतांत्रिक आंदोलन

हॉन्ग कॉन्ग भले ही एक पूर्ण लोकतंत्र न हो लेकिन यहां की सिविल सोसायटी बहुत मजबूत है. लोकतंत्र के लिए हो रहे आंदोलन से यह बात साबित होती है. छात्रों ने तय कर लिया है कि मांग पूरी होने तक वे हटने वाले नहीं.

"ऑक्यूपाई सेंट्रल" कोई बहुत संगठित आंदोलन नहीं है, बल्कि यह अचानक उभरा हुआ आंदोलन है. तीन अलग अलग लोग धीरे धीरे इसके नेतृत्व में आए हैं जिनमें हॉन्ग कॉन्ग यूनिवर्सिटी के 50 वर्षीय प्रोफेसर बेनी टाई भी हैं. उन्होंने 2013 में "नागरिक असहयोगः एक प्रभावी शस्त्र" शीर्षक से लेख लिखा. इसमें उन्होंने लिखा कि हॉन्ग कॉन्ग के लोग निष्पक्ष चुनाव चाहते हैं. उनका कहना था कि वित्तीय और सरकारी इलाकों पर कब्जा जमा कर वे बीजिंग सरकार पर दबाव डाल सकते हैं. उन्हें आबादी में व्यापक समर्थन है. ऑक्यूपाई सेंट्रल अभियान को कम से कम 25 प्रतिशत लोगों का समर्थन मिल रहा है.

निष्पक्ष चुनाव और सुधार

मुख्य तौर पर इस अभियान के दो उद्देश्य हैं - पहला अगस्त में बीजिंग में नेशनल पीपुल्स कांग्रेस के फैसले को वापस करवाना. इस फैसले के तहत हॉन्ग कॉन्ग की जनता नहीं, बल्कि 1200 सदस्यों की एक समिति 2017 में सरकार प्रमुख पद के लिए होने वाले चुनाव के उम्मीदवार तय करेगी. कुल तीन उम्मीदवारों को बहुमत से जनकांग्रेस के लिए चुना जाएगा. इसके अलावा चीन उम्मीदवारों में देशभक्ति की भावना पर बल दे रहा है जिसका मतलब होगा कि लोकतंत्र समर्थकों को सरकार प्रमुख बनने का कोई मौका नहीं मिलेगा. इस तरह चीन हॉन्ग कॉन्ग के सीमित लोकतंत्र पर अपनी पकड़ बनाए रखना चाहता है. लोकतांत्रिक लोग इससे अलग या तो निष्पक्ष चुनाव चाहते हैं या मौजूदा नियम को बनाए रखना चाहते हैं, जिसके तहत हॉन्ग कॉन्ग की एक चुनाव समिति सरकार प्रमुख तय करती है.

ऑक्यूपाई सेंट्रल का दूसरी मांग है कि हॉन्ग कॉन्ग की सरकार राजनीतिक सुधारों में तेजी लाए और लोकतांत्रिक प्रक्रिया को आगे बढ़ाए. उसका कहना है कि हॉन्ग कॉन्ग प्रशासन राजनीतिक सुधारों की रिपोर्ट में संशोधन करे जिसके आधार पर राष्ट्रीय संसद ने फैसला लिया है. मौजूदा सरकार प्रमुख लेओंग चुन यींग ने कहा है कि वे इस मुद्दे पर निवासियों के साथ बात करने को तैयार हैं.

छात्रों का सहयोग

ऑक्यूपाई सेंट्रल के प्रमुख कर्ता धर्ता छात्र ही हैं. वे आधुनिक नेटवर्क और छात्र संगठनों द्वारा अपेक्षाकृत संगठित हैं. 22 सितंबर को उन्होंने हफ्ते भर का आंदोलन शुरू किया जिसमें बाद में स्कूली छात्र भी शामिल हो गए. प्रोफेसर चेउंग को छात्रों की मांगे पता हैं. वे कहते हैं, "उन्हें उनके आदर्शों का मार्गदर्शन मिल रहा है. वे सरकार को बताना चाह रहे हैं कि उसने क्या गलत किया है. वे इसके लिए बलिदान करने को तैयार है और प्रदर्शन के जरिए इसकी कीमत चुका रहे हैं."

बेनी टाई ने 50,000 प्रदर्शनकारी छात्रों के सामने घोषणा की कि अब ऑक्यूपाई सेंट्रल शुरू हो रहा है. इससे पहले बहुत से छात्रों को गिरफ्तार कर लिया गया था. पहले योजना थी कि चीनी गणराज्य की स्थापना की 65वीं सालगिरह पर एक अक्टूबर को वित्तीय और सरकारी इलाकों पर कब्जा किया जाएगा. प्रदर्शनकारियों को तितर बितर करने के लिए पुलिस ने आंसू गैस के गोले छोड़े और मिर्ची पावडर का इस्तेमाल किया. सोमवार तक प्रमुख सड़कें बंद थीं. हालांकि स्टॉक मार्केट काम कर रहा था. लेकिन मुख्य तौर पर वित्तीय काम काज ठप पड़ा रहा.

प्रदर्शनकारी छात्रों ने सरकार के आगे घुटने नहीं टेकने का फैसला किया है. वे अपना विरोध जारी रखना चाहते हैं. इस बीच विशेष बलों को हटा दिया गया है और उनकी जगह सादे कपड़ों में सुरक्षा बल पहुंच चुके हैं.

चीनी शहर नहीं बनने देंगे

ऑक्यूपाई सेंट्रल के दो उद्देश्यों के पूरा होने की संभावना के बारे में हॉन्ग कॉन्ग के पत्रकार चियु जेनहाई का कहना है कि हिंसा की वजह से दोनों पक्षों को नुकसान पहुंचेगा. यह आसान नहीं दिखता कि आंदोलन अपने अंजाम तक पहुंचे और चीन झुक जाए. दूसरी ओर इसका उलटा असर हो सकता है और उसकी कीमत दोनों पक्षों को चुकानी पड़ सकती है. प्रोफेसर चेंग को इस बात की ज्यादा संभावना नहीं दिखती है कि बीजिंग चुनाव से जुड़ा अपना फैसला आने वाले समय में वापस ले ले. हालांकि उनका कहना है कि लोकतांत्रिक अधिकार के लिए संघर्ष बहुत महत्वपूर्ण है और इस वजह से ही छात्र सड़कों पर उतरे हैं. लेकिन अब यह मामला बुनियादी मानवाधिकारों से भी जुड़ गया है, "हम लोग अपने मौलिक मूल्यों का त्याग नहीं करेंगे. हम नहीं चाहते कि हॉन्ग कॉन्ग भी किसी दूसरे चीनी शहर जैसा बन जाए."

रिपोर्टः एर्निंग झू/एजेए

संपादनः महेश झा

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