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दुनिया

हॉन्ग कॉन्ग की चमक में शोषण की सिसकियां

14 साल की बच्ची कुछ ही दिनों में 23 साल की हो गई. वो बड़ी दिखने भी लगी और पासपोर्ट पर भी उसकी उम्र 23 साल दर्ज थी. रही सही कसर झूठ बोलने की ट्रेनिंग ने पूरी कर दी.

इंडोनेशिया के पूर्वी जावा प्रांत के एक निर्धन परिवार से मिलने कुछ लोग गए. उन्होंने 14 साल की बच्ची सिती को देखा और मां बाप से कहा कि उनकी बच्ची को विदेश में घरेलू कामकाज करने के बदले अच्छे पैसे मिलेंगे. मां बाप बेटी को विदेश भेजने के लिए राजी हो गए. लेकिन एक समस्या थी. सिती नाबालिग थी. विदेश जाकर नौकरानी का काम करने के लिए इंडोनेशिया में कानूनन उम्र 21 साल होनी चाहिए.

लेकिन यह कोई बड़ा रोड़ा नहीं था. कानून को गच्चा देने के लिए जॉब्स एजेंसी के तस्करों ने सिती का पासपोर्ट बनाने की तैयारी शुरू की. सिती को बड़ी महिला के रूप में दिखाने के लिए उसका चेहरा मोहरा भी बदला. भौंहों और दूसरे नैन नक्श बदले गए. कोशिश की गई कि सिती 23 साल की दिखे. सिती के मुताबिक, "उन्होंने मुझे उम्र के बारे में झूठ बोलने की ट्रेनिंग भी दी. मैं बार बार खुद से कहती थी कि मैं 23 साल की हूं."

मानवाधिकार संगठनों के मुताबिक इसी तरह कानून की नजर में धूल झोंककर तस्कर हजारों बच्चों को हॉन्ग कॉन्ग, सिंगापुर और दूसरे एशियाई देशों में भेज रहे हैं. दूसरे देश में अगर ये बच्चे फंस भी जाएं तो वे लाचार होते हैं. उन पर फर्जी दस्तावेजों का मुकदमा भी चलता है. ऐसे कई मामले सामने आ चुके हैं.

नौकरी का झांसा देने वाले तस्करों ने पहले सिती को सिंगापुर भेजा. वहां उसने एक स्विस परिवार के घर में नौकरानी का काम किया. मालिक उसे सीधे तनख्वाह नहीं देते थे. वे जॉब एजेंसी को पैसा देते है और जॉब एजेंसी सिती को सैलरी देती थी. 14 महीने तक काम करने के बदले उसे सिर्फ 20 डॉलर मिले. सिती कहती है, "मैं रोज रोती थी." तनख्वाह मांगने जब सिती एजेंसी के पास गई तो उन्होंने उसे सिंगापुर के एक दूसरे परिवार के यहां भेज दिया. काम काज के दौरान उसके हाथ में चोट लगी और मालिक ने इलाज कराने से भी इनकार कर दिया.

विदेश में अच्छे पैसे कमाने का ख्वाब टूट चुका था. परेशान सिती तीन साल बाद इंडोनेशिया लौटी. तब उसकी उम्र 17 साल थी. सिती फिर उसी नौकरी दिलाने वाली एजेंसी के पास गई, इस बार उसे हॉन्ग कॉन्ग भेज दिया गया. सिती कहती है, "कइयों ने मेरा शोषण किया. मैंने अपना बचपन खो दिया. मुझे सिर्फ कड़ी मेहनत के बारे में पता है."

सिर्फ हॉन्ग कॉन्ग में ही 3,40,000 घरेलू सहायक हैं. इनमें से आधे फिलीपींस के हैं. दूसरे नंबर पर इंडोनेशियाई नागरिक हैं. नौकर नौकरानी का काम करने वाले ये लोग हर साल अरबों डॉलर की मुद्रा अपने देश भेजते हैं. यही सब्जबाग दिखाकर तस्कर गरीब परिवारों को गुमराह करते हैं. सिती समेत कई बच्चों को तस्करों और जॉब एजेंसियों से राहत दिलाने वाली मैलिन हार्टविक कहती हैं, "उनके लिये बच्चे सिर्फ कमाई का जरिया हैं. हजारों बच्चे ये काम कर रहे हैं क्योंकि हमेशा ही किसी न किसी को नौकरी की सख्त जरूरत रहती है."

हॉन्ग कॉन्ग में तैनात इंडोनेशिया के कंसुल जनरल त्री थारयट कहते हैं, "एजेंसियां सिर्फ तेजी से पैसा बना रही हैं." ज्यादातर मामलों में बच्चों को पता भी नहीं चलता कि उनके हाथ में फर्जी दस्तावेज हैं, उन्हें इनका पता एयरपोर्ट पर ही चलता है और तब तक वे घर से बहुत दूर आ चुके होते हैं. 2013 से अब तक इंडोनेशिया के कॉन्सुलेट ने दर्जनों फर्जी पासपोर्ट पकड़े हैं.

(भारत में कहां कहां हैं मानव तस्करी के गढ़​​​​​​​)

ओएसजे/एमजे (रॉयटर्स)

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