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मनोरंजन

हैम्बर्ग में हुआ सबसे अच्छा अनुभव

विश्वजित रॉयचौधुरी भारत के शीर्षस्थ सरोदवादकों में गिने जाते हैं. वे संगीतज्ञों के घराने से नहीं हैं, लेकिन अपनी लगन से उन्होंने संगीत की दुनिया में जगह बनाई है.

विश्वजित रॉयचौधुरी एकमात्र ऐसे सरोदवादक हैं जिन्होंने सरोद के दोनों प्रमुख घरानों मैहर घराना और ग्वालियर घराना की शैलियों में प्रशिक्षण प्राप्त करने के बाद जयपुर-अतरौली घराने के दिग्गज गायक पंडित मल्लिकार्जुन मंसूर का गंडाबंद शागिर्द बनकर खयाल गायकी की बारीकियों को सीखा. यही कारण है कि वे सरोद वादन का अपना विशिष्ट बाज (शैली) विकसित करने में सफल हो पाये. 57 वर्षीय विश्वजित रॉयचौधुरी को कई प्रतिष्ठित पुरस्कारों से सम्मानित किया जा चुका है. प्रस्तुत है उनके साथ हुई बातचीत के कुछ अंश

संगीत में आपकी दिलचस्पी कब से शुरू हुई? और आपने सरोद को ही अपना वाद्य क्यों चुना?

मेरे पिता रणजीत रॉयचौधुरी यूं तो कॉलेज में विज्ञान के प्राध्यापक थे, पर उन्होंने उस्ताद हाफिज अली खां का विधिवत शिष्य बनकर सरोद बजाना सीखा था. उन्हें देखकर बचपन में ही मैं भी सरोद की तरफ मुड़ गया हालांकि मैंने प्राणिशास्त्र में प्रथम श्रेणी में बी एससी किया है. पिताजी से सीखने के बाद मैंने उस्ताद अलाउद्दीन खां के वरिष्ठ शिष्य सितारवादक पंडित इंद्रनील भट्टाचार्य से और उनके बाद उस्ताद हाफिज अली खां के सुपुत्र एवं शिष्य उस्ताद अमजद अली खां से सरोदवादन की शिक्षा ली. 1982 से लेकर 1992 तक पंडित मल्लिकार्जुन मंसूर से रागविद्या की तालीम ली. उनके निधन के बाद भी पंडित बालसाहब पूछवाले और विदुषी सुमति मुटाटकर जैसे गुणीजनों ने मुझे टप्पा और तराना आदि की बारीकियां समझाईं. लेकिन सरोद ही मेरा प्रथम प्रेम है.

आपने भारत में तो सभी बड़े संगीत समारोहों में बजाया ही है, विदेशों में भी कार्यक्रम दिये हैं. कैसा अनुभव रहा?

मैंने अमेरिका के अलावा जर्मनी, स्वीडन और फ्रांस समेत लगभग बीस यूरोपीय देशों में प्रस्तुतियां दी हैं और मुझे बहुत अच्छे अनुभव हुए हैं. एक बार डुसेलडॉर्फ में मैंने कार्यक्रम दिया जिसे सुनने आए तो सिर्फ 60-70 लोग ही थे लेकिन उनमें से बहुत-से ऐसे थे जो समझते थे कि मैं क्या करने की कोशिश कर रहा हूं. मैंने बॉन, कोलोन और हैम्बर्ग में भी बजाया पर सबसे अच्छा अनुभव हैम्बर्ग का रहा. भारत में और विदेशों में भी युवावर्ग हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत के प्रति गहरी रुचि रखता है. यह समझना ठीक नहीं कि वह सिर्फ पॉप या जैज ही सुनना चाहता है क्योंकि हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत के कार्यक्रमों में युवा लोग अच्छी-खासी तादाद में आते हैं. भारत में भी और विदेशों में भी. हां, जहां तक विदेशों की बात है, तो मुझे लगता है कि वहां पिछले 70-80 सालों के दौरान हमारे संगीत का तो प्रचार हुआ है, लेकिन अधिक ध्यान संगीतकार के व्यक्तित्व पर केन्द्रित रहा है. यूं भी यूरोपीय कानों को बहुत देर तक केवल एक ही आवाज या एक ही वाद्य सुनते रहने की आदत नहीं है क्योंकि वहां मेलोडी के बजाय हार्मोनी पर जोर है. सोलो प्रस्तुति में भी कई-कई वाद्य इस्तेमाल किए जाते हैं.

आजकल फ्यूजन की काफी चर्चा है. क्या आपने भी कोई प्रयोग किया?

मूलतः संगीत एक है, सिर्फ उसके द्वारा अपने-आप को और अपने अनुभवों को व्यक्त करने की शैलियां और तरीके अलग-अलग हैं. मैंने एक फ्रेंच वाद्यवृंद के साथ इस प्रकार का प्रयोग किया था और उसका ‘मुक्ता' के नाम से एक सीडी भी निकला था. वर्ष 2005 में वार्नर ब्रदर्स का ब्रिटेन में यह सबसे ज्यादा बिकने वाला सीडी था. इस सिलसिले में मुझे एक दिलचस्प अनुभव हुआ. काफी साल पहले रोम में मशहूर वादक एगबैर्तो गिसमोंटी और मैं एक ही संगीत महोत्सव में भाग ले रहे थे और एक ही होटल में ठहरे थे. मैंने उनका कार्यक्रम सुना और उन्होंने मेरा. वे अचानक मेरे कमरे में आए और कहा कि चलो साथ बजाएं. हमने उसी वक्त भैरवी में एक चीज तैयार की और साथ-साथ बजाया. वह अद्भुत अनुभव था. लेकिन मेरे लिए फ्यूजन संगीत कभी-कभी आनंद के लिए है. मैं हमेशा गंभीर राग-संगीत के प्रति समर्पित सरोदवादक ही बने रहना चाहता हूं.

कुछ लोग मानते हैं कि युवाओं को संगीत के प्रति आकर्षित करने के लिए यह एक अच्छा माध्यम हो सकता है.

शायद वे ठीक सोचते हों, लेकिन मेरी राय कुछ अलग है. जैसा मैंने पहले कहा, हमारे युवा शास्त्रीय संगीत से विमुख नहीं हैं. स्पिक-मेके जैसे कई संगठन भी छात्रों के बीच दशकों से सक्रिय हैं और उनमें शास्त्रीय संगीत के प्रति रुचि और जागरूकता पैदा कर रहे हैं. संगीतकार भी उन्हें संगीत के प्रति खींचे रखने के लिए अपने-अपने ढंग से कोशिश कर रहे हैं. आपने गौर किया होगा कि अब राग की प्रस्तुति संक्षिप्त होती जा रही है और तबले की भूमिका बढ़ती जा रही है.

इंटरव्यू: कुलदीप कुमार

संपादन: महेश झा

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