1. Inhalt
  2. Navigation
  3. Weitere Inhalte
  4. Metanavigation
  5. Suche
  6. Choose from 30 Languages

मनोरंजन

हैम्बर्ग में पांचवी बार भारत महोत्सव

जर्मन शहर हैम्बर्ग में पांचवी बार भारत सप्ताह का आयोजन हुआ. "भारत को जानें" नारे के तहत हुए महोत्सव के दौरान पचास से ज्यादा समारोहों में भारत के रहस्य को खोलने की कोशिश की गई.

default

संगीत के साथ उद्घाटन

भारतीय उपमहाद्वीप पूरी सहजता के साथ परंपरा और आधुनिकता को जोड़ता है. खुद ही परंपरा बन गए महोत्सव के आयोजकों ने यही कहकर अपने कार्यक्रमों का प्रचार किया. 7 सितंबर से 15 सितंबर तक हुए महोत्सव के दौरान वर्कशॉप, गोष्ठियां, कंसर्ट, साहित्य पाठ, प्रदर्शनी, नृत्य और फिल्म प्रदर्शनों ने भारतीय परंपराओं में झांकने का मौका दिया. इनमें उन अवसरों और चुनौतियों को भी दिखाया गया जिनका भारत आर्थिक और सामाजिक तौर पर सामना कर रहा है.

हैम्बर्ग के महापौर ओलाफ शॉल्त्स ने समारोहों का उद्घाटन करते हुए कहा कि हैम्बर्ग और भारत सदियों से एक दूसरे के साथ निकट रूप से जुड़े हैं. "400 सालों से ज्यादा से भारत और हैम्बर्ग के बीच जहाजों का आना जाना हो रहा है. बंदरगाह वाले शहर में 3,000 हिंदुस्तानी रहते हैं और पिछले सालों में 7,000 भारतीय सैलानियों ने हैम्बर्ग का दौरा किया है." शॉल्त्स ने कहा कि दुनिया में शायद ही कोई और देश ऐसा है, जहां इतने सारे अलग अलग लोग, संस्कृतियां और धर्म हैं.

India Week in Hamburg

ओलाफ शॉल्त्स और गुनीत चड्ढा

बहुरूपी मुश्किलें

लेकिन भारत में बहुत तरह की समस्याएं भी हैं. 1.2 अरब की आबादी वाले विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र में लोग रुपये के अवमूल्यन से तकलीफ झेल रहे हैं. उसके साथ होने वाली मुद्रास्फीति, पिछले दिनों में धीमी हो गई विकास दर और गरीबों और अमीरों के बीच लगातार बढ़ती खाई भी उन्हें परेशान कर रही है.

जर्मन बैंक डॉयचे बैंक के एशिया प्रशांत क्षेत्र के अधिकारी गुनीत चड्ढा इस समस्या से परिचित हैं. इसकी वजह से पिछले दिनों में निवेशकों का भरोसा टूटा है. इसके बावजूद चड्ढा कहते हैं, "हम इन समस्याओं के समाधान के बाद अगली पीढ़ियों के लिए एक बेहतर भारत देखेंगे. एक भारत, जो अपने आबादी के फायदे, 30 से 50 करोड़ के दुनिया के सबसे बड़े मध्यवर्ग और उनकी आर्थिक क्षमताओं के कारण अगुआ भूमिका निभाएगा." चड्ढा का कहना है कि भारत इसी वजह से एशिया में सिर्फ बड़ी कंपनियों के लिए ही नहीं, बल्कि मझौली कंपनियों के लिए अच्छा बाजार है.

जर्मनी की पूछ

जर्मनी में कुशल कामगारों की कमी का मुद्दा भी कई गोष्ठियों के केंद्र में था. देश के कुछ आर्थिक क्षेत्र तो इसका अभी ही बुरी तरह सामना कर रहे हैं. भारत का आईटी और टेलीकम्युनिकेशन के क्षेत्र के अलावा इंजीनियरों, डॉक्टरों और वैज्ञानिकों के प्रशिक्षण में अच्छा खासा नाम है. 2012 के मध्य से यूरोपीय संघ ने कुशल कामगारों के लिए काम करने को आसान बनाने के लिए ब्लू कार्ड शुरू किया है. यह यूं तो चार साल के लिए है, लेकिन इस अवधि में जर्मन भाषा का पर्याप्त ज्ञान दिखाने पर रहने और काम करने का स्थायी परमिट मिल सकता है.

India Week in Hamburg

मेहमानों में महाकंसुल विधु नायर

ब्लू कार्ड होल्डर को सिर्फ जर्मनी में ही नहीं बल्कि समूचे यूरोपीय संघ में रहने और काम करने का अधिकार है. पिछले साल जर्मनी ने करीब 9,000 लोगों को ब्लू कार्ड दिया, जिनमें ज्यादातर भारत, चीन और रूस के थे. भारत से सिर्फ कुशल कामगारों की ही जरूरत नहीं है, बल्कि जर्मनी वहां से छात्रों को भी लुभाने की कोशिश कर रहा है. मेयर शॉल्त्स कहते हैं, "हैम्बर्ग में 2011-12 में भारत के 182 छात्र थे. उनका प्रदर्शन औसत से ज्यादा अच्छा था." जर्मन विश्वविद्यालयों में इस बीच करीब 7,000 भारतीय पढ़ते हैं.

कामगारों और छात्रों के अलावा पिछले सालों में भारतीय उद्यमी भी जर्मनी आने लगे हैं और यहां निवेश करने लगे हैं. इसलिए जर्मनी आर्थिक केंद्र के रूप में अपना प्रचार तो कर ही रहा है, यहां के शहर भी अब भारतीय कंपनियों को अपने यहां ब्रांच खोलने के लिए मनाने की कोशिश करते हैं. अब तक भारतीय कंपनियां मुख्य रूप से दक्षिणी जर्मनी को प्राथमिकता दे रही हैं, लेकिन हैम्बर्ग का आकर्षण बढ़ा है और वहां इस बीच 40 भारतीय कंपनियों ने अपना दफ्तर खोला है.

रिपोर्ट: प्रिया एसेलबॉर्न/एमजे

संपादन: ओंकार सिंह जनौटी

DW.COM

संबंधित सामग्री